दशहरे की छुट्टियों में मैं माँ के साथ नानी के घर जाती थी . बात यह थी की नाना नानी छह महीने तो रानीगंज में रहते थे , और बाकी छह महीने झज्झर में. रानी गंज में नानाजी कमीशन एजेंट थे . वहीँ पर घर में जमीन पर बड़ा सा गद्दा बिछा रहता और साथ में लगा होता था मोटा गोल तकिया . और वहीँ पास में फ़ोन रखा रहता था . उसी पर बैठे बैठे वो व्यापार करते थे . और नानी व्यस्त रहती थी कभी आम का खट्टा मीठा अचार डालने में , तो कभी पापड़ बेलने बिलवाने में . वहां आस पास के सभी घरो में मिलजुल कर पापड़ बनाते थे .ऊपर छत पर चटाई डालकर कभी कभी आमपापड़ भी बनाते थे . खाली समय में नानी सूती साड़ियों पर सुंदर सुंदर बूटे भी काढती थी
नानी को पढने का भी बहुत शौक था . उन्हें तीन भाषाएं आती थी , हिंदी उर्दू और कामचलाऊ अंग्रेजी . ये बातें शायद 1964-1965 के आस पास की हैं . नानी से आस पास वाले उर्दू की चिट्ठी पढवाने भी आते थे . रोज़ शाम को सब औरतें छत पर बैठती और खूब बातचीत करती और वे बहुत सारे भजन भी गाती थी . एक तो मुझे अब तक याद है ,"कहो न सीता राम राम ,पिंजरे वाली मैना ; कहो न राधेश्याम श्याम पिंजरे वाली मैना ." उसके बाद सभी अपने अपने चूल्हे चौके में लग जाती थी . वहां पड़ोस की सभी बहुएं मेरी मामी लगती थी . उनमे से एक मामी मुझे बहुत पसंद थी .मैं कभी कभी उनके पास जाकर बैठती तो वे मुझे आमपापड़ खाने को देती . मझे बहुत मज़ा आता था .
मेरे मामाजी आसनसोल में रहते थे . माँ की बाल विधवा बुआ भी उन्हीं के साथ रहती थी. एक बार मेरे मामाजी मामीजी और माँ की बुआजी रानीगंज आए. उस दिन मामाजी का अचानक प्रोग्राम बना कि रानीगंज में जो पेपर मिल है वह सबको दिखाना चाहिए . लेकिन वहां छोटे बच्चों को जाने की अनुमति नहीं होती थी .
इसलिए मुझे और मुझसे छ: साल छोटी बहन को माँ की बुआजी के संरक्षण में छोड़ दिया गया . बाकी सभी लोग पेपर मिल देखने चले गए . मेरी छोटी बहन तो सो रही थी , लेकिन थोड़ी देर के बाद मुझे भूख लगी . माँ की बुआजी ने मुझे दो आने दिए और कहा इनकी मूडी ले आओ . मुरमुरों को बंगाली लोग मूडी बोलते हैं . मैं पिछवाड़े गई जहाँ कि बड़ी सी खिड़की थी . मैंने वहां खड़ी बूढी बंगाली स्त्री से दो आने कि मूडी मांगी . वह तुरंत अन्दर गई और ढेर साड़ी गरम गरम नमकीन मूडी लाई . मूडी इतनी अधिक थी कि मेरा और माँ की बुआ का पेट भर गया
थोड़ी देर बाद छोटी बहन नींद से उठी और रोने लगी . बुआजी ने दूध गरम करके बोतल में डाला और मेरी बहन को पिलाने लगी . पर वह थी दूध पीने का नाम ही नहीं ले रही थी . वह तो लगातार रोए जा रही थी . बुआ ने उसे बहुत प्यार किया . धीरे धीरे झूले भी झुलाए; पर वह तो चुप ही नहीं हो रही थी . बुआ बहुत परेशान थी . इतने छोटे बच्चे को कैसे चुप कराया जाए? मैं भी रुआंसी हो रही थी . तभी नानाजी आते दिखाई दिए . पीछे पीछे सभी आ रहे थे . माँ ने फटाफट मेरी छोटी बहन को गोदी में उठाया ;बहुत प्यार किया ;दूध पिलाने की कोशिश की . पर उसका रोना थम ही नहीं रहा था . फिर तो नानाजी उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गए . माँ भी साथ में गई. जब वह वापिस आई तो उसका रोना बंद था और वह सो गयी थी . सबने राहत की सांस ली .
रात को नानी ने दूध से आटा गूंधा .उससे गोल मुलायम परांठे बनाए और उन्होंने आलू मंगोड़ी की सब्जी बनाई. फिर आम के खट्टे मीठे अचार के साथ सबको खाना परोसा . बाद में मुझे मेरा मनपसंद बंगाली रसगुल्ला भी खाने को मिला . सारा काम निपटाने के बाद नानी ने गर्म पानी किया ..सभी ने बारी बारी से बड़ी परात में पैर रखकर गरम पानी से धोये . और अपने अपने बिस्तर पर बैठ गए . फिर नानी ने भजनों की किताब में से सबको भजन सुनाए. उसके बाद हम सभी सो गए .
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