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Friday, October 2, 2026

निराले नन्हे मेहमान

 उड़ीसा के बालासोर जिले में कुछ लोग सवेरे घूमने के लिए निकले, तो उन्होंने देखा, कि वहां पेड़ों पर औरांगुटान लटक रहे थे। ये ओरांगुटान के नन्हे बच्चे थे। यह बच्चे बिल्कुल रोंयेदार, मुलायम खिलौनों की तरह ही लग रहे थे। इन पांच बच्चों को पेड़ों पर लटकता और उछलता-कूदता हुआ देखकर, राह में चलते हुए यात्री बहुत प्रसन्न हो रहे थे। वे वह कुछ देर तक रुककर इनको देखते; फिर अपनी राह चल देते।

 लेकिन कुछ जानकार यात्रियों ने जब इन्हें देखा तो वे हैरान ही हो गए। उन्होंने कहा कि ये साधारण बंदर नहीं हैं। यह तो औरंगुटान के बच्चे हैं। हमारे देश में तो औरांगुटान होते ही नहीं! ये तो उष्णकटिबंधीय देशों में पाए जाते हैं। फिर यह पांच बच्चे कहां से आ गए? लगता है कि कोई रात में ही इन्हें यहां छोड़ गया है। मलेशिया और इंडोनेशिया में रहने वाले औरांगुटान भारत में तो जीवित भी शायद नहीं रह पाएंगे।

 किसी ने वन्य अधिकारियों को उनके बारे में सूचित कर दिया। वन्य अधिकारी थोड़ी देर में वहां पहुंच गए। उन्होंने पांचो नन्हें ओरांगुटान बच्चों को बड़ी सावधानीपूर्वक पकड़ लिया। इनमें तीन नर बच्चे और दो मादा बच्चे थे। वन्य अधिकारियों ने कहा कि लगता है कि इन्हें मलेशिया या इंडोनेशिया जैसे देशों से तस्करी करके यहां लाया गया है। फिर पकड़े जाने के डर से इनको यहीं जंगलों में छोड़ दिया गया। ये बच्चे एक से डेढ़ साल के बीच में हैं। अगर इनकी तुरंत अच्छी देखरेख न की गई तो ये बच्चे शायद जीवित न बचें। 

उन बच्चों को तुरंत भुवनेश्वर के पास नंदनकानन नामक चिड़िया घर में ले जाया गया। वहां उन्हें संबंधित अधिकारियों को सौंप दिया गया। वैसे तो नन्हें औरांगुटान अपनी मां का दूध पीकर प्रसन्न होते हैं।  लेकिन यहां इन्हें बोतल से दूध पिलाने का प्रयत्न किया गया। बच्चे बहुत अच्छे थे। तुरंत वातावरण में ढल गए। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे पहले भी मानव संपर्क में रहकर, बोतल से दूध पीना सीख चुके थे। उन्होंने दूध भी पी लिया और मस्ती में खेलने भी लगे।

 वन अधिकारियों से पूछा गया कि बड़े होकर क्या ये नंदन कानन चिड़ियाघर का ही एक हिस्सा बन जाएंगे? तो उन्होंने बताया कि ये नन्हे मुन्ने अभी हमारे मेहमान हैं। जैसे ही उचित व्यवस्था होगी इन्हें उनके देश में वापिस भेज दिया जाएगा। अगर इनका कोई अता-पता न लगा तो इन्हें इसी चिड़ियाघर में सुरक्षित रख लिया जाएगा।

 अभी तो निराले नन्हे मेहमान खूब खातिरदारी करवा रहे हैं। उन्हें किसी से मिलने भी नहीं दिया जाता। परंतु जब ये बड़े हो जाएंगे तो शायद ये इसी चिड़ियाघर की शोभा बढ़ाएंगे।

Wednesday, September 23, 2026

नन्हा हाथी

 जलपाईगुड़ी से निकलती हुई तीस्ता नदी अपने पूरे उफान पर थी। बबलू दास अपनी नाव को खूंटे के सहारे रस्सी से बांध रहा था। तभी उसकी नज़र नदी में से निकलती हुई छोटी सी सूंड पर जा पड़ी। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह किसी नन्हे हाथी की सूंड हो। उसे उत्सुकता हुई कि यह क्या है?

वह नाव खोलकर तुरंत उस सूंड की ओर बढ़ चला।  वहां जाकर उसने देखा कि वास्तव में हाथी का एक नवजात शिशु, तैरने की कोशिश करता हुआ, सूंड ऊपर करके, सांस लेने का प्रयत्न कर रहा है। बबलू दास ने तनिक भी देर न लगाई और अपने साथियों मिथुन दास, केदार दास, विश्वनाथ और गोपाल को भी वही बुला लिया। सभी मित्रों ने मिलकर नन्हे हाथी को अपनी नावों पर रखा। जैसे तैसे उसे वे किनारे पर ले आए। 

वह इतना नन्हा था कि लग रह रहा था कि एक या दो दिन पहले ही उसका जन्म हुआ है। एक बार तो उन्हें समझ नहीं आया कि वे करें क्या? फिर बबलू दास  ने अपने मित्रों को सुझाया कि हमें वन विभाग के अधिकारियों को सूचित करना चाहिए। वे ही इस बच्चे की जान बचा सकते हैं। मित्र भी सहमत थे। वन अधिकारियों को फोन किया गया। दस-पन्द्रह मिनट बाद ही वन अधिकारी वहां पहुंच गए। 

वन अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पिछले दिन ही पांच हाथियों का झुंड यहां से होता हुआ गुजारा है। सिक्किम में बहुत अधिक बारिश हो रही हैं। इसके कारण तीस्ता नदी का उफान भी यहां तक आ पहुंचा। उसी समय यह बच्चा उस हाथी के झुंड से बिछुड़ गया होगा। शायद यह उन्हीं हाथियों का ही बच्चा होगा। अधिकारियों ने बताया कि यह बच्चा अभी केवल चार-पांच दिन का ही है।

उन अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर इस बच्चे को जल्दी ही उसे झुंड में नहीं छोड़ा गया तो वे इस बच्चे को लावारिस ही छोड़ देंगे। वे इसे अपने झुंड में शामिल नहीं करेंगे। वास्तव में, अगर हाथी का नन्हा बच्चा, इंसानों के साथ अधिक समय तक रह जाए; तो हाथियों का झुंड उसे स्वीकार नहीं करता। इसीलिए बच्चे को हाथियों तक पहुंचाने में शीघ्रता करनी चाहिए। 

 बबलू दास और उसके मित्रों ने वन अधिकारियों के साथ मिलकर उस झुंड को ढूंढने का प्रयत्न किया।  सौभाग्यवश झुंड अभी बहुत दूर नहीं गया था। आधे घंटे बाद ही उन्होंने देखा कि हाथियों का झुंड वृक्षों के नीचे खड़ा था। उन्हें लगा कि संभवतः इसी झुंड में इस बच्चे की मां भी अवश्य होगी। 

उन्होंने उस बच्चे को झुंड से थोड़ी दूरी पर छोड़ दिया। उन सभी को आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि बच्चे की मां ने उसे पहचान लिया और वह तुरंत उसके पास आ गई। बच्चे ने अपनी मां का दूध भी पीना प्रारंभ कर दिया और वह भी वहीं खड़ी उसे दूध पिलाती रही। यह बहुत ही मर्मस्पर्शी दृश्य था। वन अधिकारी, सचिन और उसके मित्र दूर खड़े यह सब देखते रहे। थोड़ी देर बाद वे सभी वहां से वापिस आ गए। 

वन अधिकारियों ने बबलू दास और उसके साथियों का बहुत-बहुत धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उन सब मित्रों बहुत ही उत्कृष्ठ भलाई का कार्य किया है। शायद यह बच्चा जीवित न रह पाता अगर उन सब ने उसकी सहायता न की होती। बबलू दास ने कहा, "हमें तो बहुत प्रसन्नता है कि हम नन्हे हाथी को उसकी मां से मिलवा पाए। हमें तो आपका धन्यवाद करना है कि आपने हमारा साथ दिया।"

 वन अधिकारियों से हाथ मिलाकर बबलू दास अपने दोस्तों के साथ वापिस आ गया। वह सोच रहा था कि काश वह उस नन्हे हाथी के बच्चे को पाल पाता, तो कितना मज़ा आता!

Saturday, September 5, 2026

विजयी वयोवृद्धा

 97 वर्षीया गुण माया बोहरा का सिर थोड़ा हिला, तो उनके रिश्तेदारों को प्रतीत हुआ कि शायद वे अभी जिंदा हैं। उनके पोते रसिक बोहरा ने बताया कि वे कीचड़ में आठ से नौ घंटे तक पड़ी हुई थीं।  ऐसा लग रहा था कि शायद उनकी मौत हो गई है।

नेपाल के त्रिशूली बाजार में भयंकर बाढ़ आने पर नुवाकोट की गुणमाया बोहरा इस बाढ़ मे अपने घर में ही घिर गई। आसपास की सभी सडकें बाढ़ में बह गई और उनका मकान भी ढह गया। बाढ़ की मिट्टी और मकान का मलबा सभी उनके ऊपर आ गिरे। लगभग 8-9 घंटे तक वह गीली मिट्टी और मलबे में दबी रही।

 अचानक उनके थोड़ा हिलने डुलने से किसी की नज़र उन पर पड़ी। उनका सिर हिल रहा था। तुरंत बचाव कार्य कर्मचारी और उनके रिश्तेदार, कीचड़ और मलबे के बीच से उन्हें निकालने का प्रयत्न करने लगे। 

आखिर जब उन्हें निकाला गया तो वे पूरी मिट्टी से लिपटी हुई थीं। उनके कपड़े, बाल और मुंह सब कीचड़ से लथपथ थे। लेकिन वे चुपचाप शांत बैठी रहीं। उन्हें किसी प्रकार काठमांडू के बीर हॉस्पिटल में ले जाया गया।

 उनकी उम्र इतनी बड़ी होने पर भी उनके शरीर पर किसी प्रकार के घाव के निशान नहीं थे। उनके पोते रसिक ने बताया कि वे बिल्कुल ठीक हैं। उसे लग रहा था कि यह तो चमत्कार है, कि इतनी बड़ी उम्र में भी वे इतनी बड़ी आपदा से सुरक्षित बाहर निकल आईं। उनका प्रपौत्र दीपक बोहरा भी बहुत खुश था। वह कह रहा था कि उनकी परदादी एक योद्धा की तरह प्रतीत हो रही हैं। वे बाढ़ से युद्ध में हारी नहीं, बल्कि विजयी होकर बाहर आई हैं।

Wednesday, August 19, 2026

ज़िंदगी जीत गई

 पत्नी की चिता जल चुकने के पश्चात, वह अपनी तेरह दिन की बच्ची को लेकर जल्दी-जल्दी जा रहा था। वह बच्ची को लेकर जिंदा दबाने के लिए ले जा रहा था। बच्ची के दादा ने तो सिर्फ उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए ही कहा था!

यह महाराष्ट्र के लातूर जिले की कहानी है। सत्तर वर्षीया सुनीता ने बताया कि उसके पिता ने उसकी माता को तभी छोड़ दिया था जब वे गर्भावस्था में थीं। उसके जन्म के बाद उसकी माता को जल्दी ही घर के कामों में लगना पड़ा। एक दिन घर के फर्श को गोबर से लीपते समय मां की मृत्यु हो गई। उस समय सुनीता केवल तेरह दिन की ही थी। सुनीता के नाना ने बच्ची को सुनीता के दादा के हाथ में सौंपते हुए कहा कि अब यह आपकी जिम्मेदारी है। दादा ने सुनीता के पिता के हाथ में बच्ची को दे दिया।

बच्ची को गोद में लेकर बेटा जल्दी-जल्दी बाहर जाने लगा तो दादा को शक हुआ। वह भी उसके पीछे-पीछे गए। लेकिन जब तक वह उसे पकड़ पाते, तब तक वह बच्ची को अपनी पत्नी के चिता के पास ही मिट्टी में दबा चुका था। बारिश से मिट्टी गीली हो चुकी थी। दादा ने जल्दी-जल्दी वहां की मिट्टी को हटाया। वहीं नन्ही सुनीता लेटी हुई थी। उन्होंने उसे उठाकर उसकी नाक के पास उंगली रखी, तो पाया कि अभी उसकी सांस चल रही है।

घर आकर उन्होंने सुनीता को अपनी बकरियों के साथ एक फटी साड़ी में लपेटकर लिटा दिया और स्वयं भी वही रात गुजारी। वास्तव में वे चाहते थे कि बच्ची को कुछ उष्णता का अनुभव हो। 

अगले दिन उन्होंने बकरी का दूध निकाल कर, रूई की बत्ती बनाकर, सुनीता को दूध पिलाया। लेकिन वह कब तक यह काम कर सकते थे? उन्होंने एक उपाय सोचा। वहीं पास में चंद्रभागा ने अपनी पुत्री कावेरा को जन्म दिया था। उन्होंने चंद्रभागा को कहा कि वह सुनीता को भी दूध पिला दे। इससे वह बच जाएगी। वैसे तो चंद्रभागा मानती नहीं; परन्तु दादा के बार-बार कहने पर उसने यह स्वीकार कर लिया।

बड़े होने पर दादा ने सुनीता और कावेरा, दोनों की पढ़ाई का इंतजाम किया। इसके लिए उन्हें कुछ रुपए उधार भी लेने पड़े। लेकिन इसकी उन्होंने परवाह न की। बच्चियां पढ़ाई में अच्छी थीं। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पास के बड़े स्कूल में जाना पड़ा। 

वहां सुनीता को अपनी सौतेली मां के साथ रहना पड़ा। पिता तो वहां थे ही बुरे, सौतेली मां का और भी अधिक दुर्व्यवहार था। इतना सब सहते सहते भी उसने वहां पढ़ाई की। उसकी सौतेली मां ने एक दिन उसे खाने में ज़हर देने की कोशिश की। उसके बाद दादा जी ने उसे एक किराए का कमरा दिलवा दिया। वहां सुनीता और कावेरा रहने लगीं।

 दसवीं की परीक्षा के बाद लाटूर के एक अस्पताल में उन्हें नर्स की ट्रेनिंग में दाखिला मिल गया।  ये वहीं रहने लगीं और कुछ रुपए भी कमाने लगीं। वहीं पर दिलीप नाम का एक लैबोरेट्री का टैक्नीशियन भी अस्पताल में कर्मचारी था। वह भी वहीं रहता था, जहां यह दोनों किराए पर रहती थीं। धीरे-धीरे सुनीता और दिलीप का आपस में प्यार बढ़ गया। कावेरा ने इसकी शिकायत सुनीता के दादाजी से कर दी। दादाजी ने फिर उसके बाद सुनीता के पास आना बंद कर दिया।

 पन्द्रह वर्ष की सुनीता गर्भवती हो गई थी। उन्होंने दिलीप के साथ आर्य समाज के अनुसार विवाह कर लिया और वह नांदेड़ चली आई। उनका पहला बच्चा तो कुछ घंटे के बाद ही मर गया था। जब दूसरा बच्चा योगेश पैदा हुआ तो दादा और चंद्रभागा बच्चों से मिलने के लिए आए। सुनीता और दादाजी का रिश्ता फिर से स्थापित हो गया। तीन साल बाद एक और बच्चा जमीर पैदा हुआ। योगेश एक इंजीनियर बन गया और छोटा बच्चा जमीर, बच्चों का डॉक्टर बन गया।

सुनीता और दिलीप ने मिलकर लातूर में समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। विशेष तौर पर वे कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में समाज में जागृति फैला रही थीं। उनका कहना था कि समाज में स्त्रियों का पुरुषों जितना ही सम्मान होना चाहिए। 

धीरे-धीरे सुनीता ने तो अपनी नौकरी छोड़ दी; जिससे कि वह समाज सेवा भली प्रकार कर सके। वे लाटूर नगर परिषद में चुनी भी गईअं। वास्तव में वह सीट दलितों के लिए आरक्षित थी। शायद इसीलिए उनका चुनाव आसानी से हो गया। लेकिन देश में इमरजेंसी के दौरान में उन्हें जेल जाना पड़ा। तभी उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। जेल से निकलने के बाद भी वे समाज सेवा करती रही। जेल में रहकर सुनीता ने अपनी पुस्तक भी लिखी। उसमें सुनीता की अपनी कहानी है।

सुनीता ने अपने पिता से कभी नहीं पूछा कि उन्होंने उसे जमीन में क्यों गाड़ दिया था? और क्यों वे दादाजी से इस बात पर नाराज थे, कि दादाजी ने उसे मौत के मुंह से बचा लिया था? सुनीता को पता था कि उसके पिता एक बेटी नहीं चाहते थे। ऐसी बेटी तो बिल्कुल भी नहीं जिसकी मां उसे जन्म देने के कुछ दिन बाद ही मर गई थी।

लेकिन वही सत्तर वर्षीया, साहसी सुनीता, आज यह सिद्ध कर चुकी हैं, कि जिंदगी हारने के लिए नहीं होती। जिंदगी तो हमेशा जीत ही जाती है।

Sunday, August 2, 2026

अनूठी चोरी!

 बेंगलुरु में एक आभूषणों की दुकान में चोरी हो गई थी। लगभग नब्बे ग्राम सोना खो गया था। कोई उसे चुरा ले गया था। सभी खोजबीन कर ली गई थीं। सीसीटीवी कैमरे में अच्छी तरह खंगाल कर देख लिया गया था। पुलिस वालों ने भी पूरी तहकीकात कर ली थी। लेकिन चोर का कोई पता न चल रहा था।

 आखिर नब्बे ग्राम सोने के गहने गए तो कहां गए? कोई चोर नहीं आया। नौकरों ने भी गहने नहीं उठाए। गहने किसी को बेचे भी नहीं गए। तो गहने कहां गए? आभूषणों की दुकान का मालिक बहुत परेशान था। बहुत सोच विचार किया, परन्तु कुछ भी समझ न आया।

 अचानक एक दिन दुकान के एक नौकर को दुकान के फर्श में एक बड़ा सा सुराख़ नज़र आया। उसे सुराख़ को बड़ी सावधानी के साथ धीरे-धीरे खोदा गया। उसके बाद जो नीचे दिखाई दिया, वह दृश्य बहुत हैरान कर देने वाला था। 

वहां एक चुहिया और उसके छः सद्योजात शावक कागजों के मुलायम बिछौने पर बैठे थे। नब्बे ग्राम सोने के गहने वहीं पर रखे हुए थे। सभी को बहुत हैरानी थी कि चुहिया को गहनों का शौक कैसे हो आया? 

लेकिन वास्तविक बात यह नहीं थी।  चुहिया को गहनों से कोई आकर्षण नहीं था। वह तो गहनों पर लिखे वजन वाले कागज मुंह में दबा कर ले जाती थी। जिसके साथ गहने पीछे-पीछे खिंचे आते थे। वह उन कागजों को कुतर-कुतर कर अपने बच्चों के लिए बिछौना बना रही थी। इसी तरह वह कई गहने ले गई। सभी गहनों पर जो वजन लिखा हुआ कागज था; उसे कुतर-कुतर कर उसने नन्हे शावकों का बिछौना बना लिया था।

 सभी खोए हुए गहने वहीं पर पड़े हुए थे।  दुकान का मालिक बहुत हैरान हुआ। उसे हंसी भी आ गई। उसने कहा, "हमने तो सोचा था कि किसी चोर ने यह सब गहने चुराए होंगे। चोरी तो हुई, लेकिन वह किसी व्यक्ति ने नहीं बल्कि एक चुहिया ने की। यह तो अनूठी 'सोना चोर' चुहिया है।"

यह सुनकर दुकान के सभी कर्मचारी भी हंस पड़े।

Monday, July 27, 2026

मौत से साक्षात्कार!

 गुजरात का कालू परमार गडरिया अपने अहाते में खड़ा हुआ था। अचानक उसे पीछे से एक धक्का लगा और किसी ने उसे दबोच लिया।

 जब तक वह देख पाता, कि किसने उसे दबोचा है; उससे पहले ही किसी ने कालू का हाथ अपने मुंह में दबा लिया। तब कालू परमार ने देखा कि एक सिंह ने पीछे से उस पर आक्रमण किया है।

 वह घबरा तो बहुत गया। उसने अपना हाथ छुड़ाने की जैसे ही कोशिश की; सिंह ने बैठे हुए कालू का एक पैर अपने पंजों के नीचे दबोच लिया और उसके ऊपर बैठ गया। 

            कालू को साक्षात मौत नजर आ रही थी। लेकिन उसने थोड़ा धैर्य से काम लिया। वह शांति से उसकी आंखों की तरफ देखता रहा और एक हाथ से उसकी गर्दन सहलाने लगा जैसे कि पालतू जानवरों के साथ किया जाता है। हैरानी की बात यह हुई कि इस पर सिंह ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी। वह कालू को देखता रहा। कालू भी उसकी तरफ देखता हुआ उसकी गर्दन धीरे-धीरे सहलाता रहा।

 ऐसा लग रह रहा था जैसे दोनों मौन भाषा में बातें कर रहे हों। कालू परमार को यही लग रह रहा था कि काल उसके सामने है। और वह किसी भी पल काल का ग्रास बन जाएगा। लेकिन फिर भी बिना हिम्मत हारे हुए वह ऐसे ही बैठा रहा और उसे सहलाता रहा। शायद उसके शांतिपूर्ण व्यवहार के कारण ही सिंह उस पर कोई आक्रमण नहीं कर रहा था। कालू अगर इतना धैर्यवान न होता तो वह सिंह हिंसक हो सकता था।

 गांव वाले पीछे से पत्थर मारे जा रहे थे और शोर भी मचा रहे थे। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि सिंह कालू परमार को देख रहा था और कुछ भी नहीं कर रहा था। कालू परमार भी शान्ति से बैठा था। उसके अंदर का डर धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा था। शायद वह समझ रहा था की मौत आई, तब भी ठीक और बच गए तब भी ठीक। समभाव की अनुभूति के अतिरिक्त और कोई चारा भी तो न था।

 आधे घंटे के बाद, अचानक वह सिंह उठ खड़ा हुआ। वह अहाते से बाहर चला गया। कालू परमार ने राहत की सांस ली। उसे तो वह आधा घंटा एक युग के समान प्रतीत हुआ था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह मौत के मुंह से बच गया है। वह सिंह को जाते हुए देखता रहा। जब वह चला गया, तो गांव वाले उसके पास आए।

 कालू परमार का वह हाथ जो सिंह ने अपने मुंह में लिया था; जख्मी हो गया था और उसमें दांत के निशान भी थे।  लेकिन उसे और कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। वह पूरी तरह सुरक्षित था। गांव वाले खुशियां मनाने लगे। 

लेकिन कालू परमार को अभी तक विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह सिंह के पंजे से सकुशल बच गया है। शायद सिंह को भूख नहीं रही होगी। उसका पेट भरा हुआ होगा। तभी तो उसने कालू परमार को खाने की चेष्टा नहीं की। कालू परमार मन ही मन भगवान का धन्यवाद कर रहा था। उसके जीवन की यह सबसे आश्चर्य जनक घटना थी।

गांव वाले उसे हाथों पर ऊपर उठाकर नाचने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वे मौत से हुए साक्षात्कार की जीत का जश्न मना रहे हों!

Monday, June 8, 2026

"भिक्षाम देहि"

 "भिक्षाम देहि!" दरवाजे पर यह आवाज सुनकर नंदी देवी ने जब दरवाजा खोला तो पाया कि सामने 61 वर्षीय लंबी दाढ़ी वाला साधु खड़ा था। उस साधु ने पुनः कहा,"मां! भिक्षाम देहि।"

लगभग 46 वर्ष पहले पिथौरागढ़ बागेश्वर बॉर्डर से, एक 15 साल का किशोर, गांव छोड़कर चला गया था। उसको ढूंढने के सभी प्रयत्न असफल रहे थे। कुछ वर्षों बाद उसके पिता का भी देहांत हो गया था। उसका कुछ कुछ भी पता न चल पाया था।

 वास्तव में बुद्धि बल्लभ उपाध्याय नाम का एक लड़का अपने घर को छोड़कर चला गया था। उसने कुछ समय ट्रकों और दूसरे वाहनों में कुछ मजदूरी की। बाद में वह एक बीकानेर के एक मंदिर में चला गया। वहां उसने नाथ संप्रदाय को अपना लिया। अब उसका नाम बुद्ध नाथ हो गया। अपने गुरु से दीक्षा ली और वहीं रहने लगा। उसने संन्यास को अपना लिया। 4 वर्ष पहले उसके आध्यात्मिक गुरु की भी मृत्यु हो गई थी। मरने से पहले उन्होंने कहा था कि तुम्हारा संन्यास तभी पूर्ण हो पाएगा जब तुम अपनी माता से भिक्षा लेकर आओगे।

आज बुद्धनाथ अपनी माता के सामने खड़ा था। वह झोली फैला कर भिक्षा मांग रहा था। माता को जब सब कुछ पता चला तो उसकी आंख से टप-टप आंसू बहने लगे। उसने अपने बेटे को गले लगा लिया। बुद्ध नाथ ने माता के पैर छुए और उनको कहा कि वह उन्हें भिक्षा दे दें। जिससे कि उनका संन्यास धर्म पूरा हो सके और वह पूरे संन्यासी  बन सके।  

माता ने बहुत अनुग्रह किया कि वह गांव में ही रुक जाए और अपनी माता के पास रहे। लेकिन बुद्ध नाथ ने कहा कि वह संन्यासी बन चुका है और वह गांव में नहीं रहेगा। वह तो बीकानेर के मंदिर में ही रहेगा। हां, अगर कभी माता उससे मिलना चाहती हैं; तो वह बीकानेर के मंदिर में ही आ सकती हैं।

 मां का रो-रो कर बुरा हाल था। इतने वर्षों के बाद पुत्र आया तो वह भी किसी रूप में! लेकिन बुद्ध नाथ के बार-बार भिक्षा मांगने पर माता ने भंडार गृह से थोड़ा अनाज लाकर बुद्ध नाथ की झोली में डाल दिया। बुद्ध नाथ ने वह अनाज अपनी झोली में लिया। फिर विरक्त भाव से वह मुंह मोड़कर वापस चला गया। 

गांव वाले यह सब दृश्य देख रहे थे। उनकी भी आंखों में आंसू थे। परन्तु वे माता को समझा रहे थे, "देख! तेरा पुत्र कितनी महान आत्मा है! वह संन्यासी बन गया; यह तो अपने गांव के लिए बड़ी गर्व की बात है।" 

माता सब कुछ समझ रही थी। लेकिन वह अपने आंसुओं का क्या करें? वे तो किसी भी तरह थम ही नहीं रहे थे।


Tuesday, May 26, 2026

अनुपम उपहार

 महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में एक गांव है बहादरपुरा! वहां के लगभग 3465 निवासियों को एक अनोखा तोहफा विवाह के अवसर पर मिला।

 बहादरपुरा गांव में सांपों के काटने से, बिजली के गिरने से और खेतों में कोई दुर्घटना होने से मौत हो जाया करती थी। जिससे कि परिवार बहुत ही दुखी होते थे। उनकी परेशानी को दूर करने के लिए के उनके पास कोई जीवन बीमा योजना भी नहीं थी। ये घटनाएं घटती ही रहती थी और इनका कोई समाधान भी नहीं था। वास्तव में गांव वाले अगर कोई बीमा योजना ले भी लें तो उनकी किश्त कौन भरे? गांव वाले गरीब थे और उनकी अधिक आय भी नहीं थी। 

पेठकर परिवार के विवाह का समय पास आ रहा था। अनूप पेठकर ने कहा, "क्यों न इस विवाह में हम सभी ग्राम वासियों को एक अद्भुत तोहफा दें!" 

परिवार वालों से विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय हुआ कि सभी ग्राम वासियों को दुर्घटना बीमा अगर दे दिया जाए, तो वे कितने सुखी हो सकेंगे। उपहार का उपहार, और ग्रामवासियों के जीवन में जो खुशियां आएंगी सो अलग!

जयमाला, बैंड बाजे और शानदार भोजन के बाद जो कार्यक्रम था; उसकी तो किसी को उम्मीद ही नहीं थी। लगभग 4500 अतिथि इस विवाह में निमंत्रित थे। अतिथियों के सामने ही अनूप पेठकर ने सबको संबोधित किया, "सभी ग्रामवासी भाइयों। आज बेहद प्रसन्नता का अवसर है। इस अवसर पर मैं सबको एक तोहफा देना चाहता हूं। मैंने पूरे गांव का दुर्घटना बीमा करा लिया है। जिसमें दुर्घटना होने पर ₹100000 मिलेगा।"

जब लोगों ने यह सुना तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा वातावरण गूंज उठा। यह दुर्घटना बीमा 33 करोड़ का था। सभी ग्रामवासी ऐसा शानदार विवाह का तोहफा लेकर बहुत प्रसन्न हुए। सरपंच बलिराम पेट करने तो इसे बहुत अद्भुत तोहफा बताया। 

उसने कहा, "यह शायद इस प्रकार का सबसे पहला तोहफा है। ऐसा तोहफा तो कभी हमारे गांव में किसी ने किसी को नहीं दिया। शादी में लोग मिठाइयां बांटते हैं और तरह-तरह के तोहफे भी बांटते हैं।  परन्तु यह तो सबसे अद्भुत उपहार है। इस परिवार ने तो सबको सुरक्षा का तोहफा दिया है!"

अनूप पेठकर ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "हमें तालियां नहीं चाहिए। हमें तो सबकी दुआएं मिल जाएं, वही बहुत है।"

 गांव वाले विवाह के बाद जब घर जा रहे थे तो उनके पास, एक शानदार विवाह की यादगार के साथ-साथ, भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए मिला, एक विश्वास भी था। यह अनुपम उपहार, पूरे एक वर्ष तक उनका साथ देने वाला था।

Thursday, May 21, 2026

त्वचा की सुंदरता

 त्वचा की सुंदरता कई बातों पर निर्भर करती है। जिसमें सबसे प्रमुख बात है; अनुशासन में रहना। अगर आपका पूरा जीवन अनुशासित है तो आपके शरीर के सब अंगों के साथ आपकी त्वचा भी सुंदर रहेगी। वास्तव में त्वचा को सुंदर रखने के लिए बहुत सी बातें अनिवार्य रूप से करनी होती हैं। कई बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है।

तनाव मुक्त रहना:  त्वचा की सुंदरता बनाए रखने के लिए तनाव मुक्त रहना बहुत आवश्यक है। तनाव मुक्त रहने से हमारे शरीर में अच्छे हारमोंस यानी एंडोर्फिंस बनते हैं जो कि त्वचा को चमकदार और झुर्रियों रहित बनाने में मदद करते हैं। तनाव पूर्ण रहने से हमारे शरीर में कॉर्टिसोल नाम का एक हार्मोन बहुत अधिक मात्रा में बनता है जिससे कि त्वचा के कॉलेजन नष्ट होने शुरू हो जाते हैं। इसीलिए आवश्यक है कि हम प्रसन्न चित्त रहें और कोई तनाव अपने मन मे न आने दें।

पर्याप्त नींद लेना:  त्वचा की सुंदरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम रात को पर्याप्त नींद लें। अगर हम नींद में कमी करते हैं तो हमारा शरीर त्वचा की टूट-फूट की मरम्मत नहीं कर पाता। इससे त्वचा असमय ही ढीली पढ़नी शुरू हो जाती है। उसकी सुंदरता नष्ट हो जाती है। चेहरे पर सूजन और आंखों के पास काले सर्कल भी नींद की कमी से ही आते हैं।

पर्याप्त पानी पीना:  त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए आवश्यक है कि हम दिन भर में खूब पानी पिएं। अगर हम पानी पीने में कमी करते हैं तो उससे हमारे शरीर में टॉक्सिन इकट्ठे हो जाते हैं। शरीर में विषैले पदार्थ न जमा हों; इसके लिए पानी का काफी मात्रा में पीना बहुत आवश्यक है। इससे त्वचा नम रहती है और चमकदार भी रहती है।

कड़ी मेहनत:  अगर कड़ी मेहनत की जाए; तो उससे शरीर में खून का प्रवाह बहुत अच्छे तरीके से बना रहता है। जिससे कि शरीर भी स्वस्थ रहता है और त्वचा भी।  वास्तव में शारीरिक व्यायाम और परिश्रम करने से त्वचा से खूब पसीना निकलता है। इससे शरीर के सारे विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और त्वचा तरो ताजा हो जाती है। व्यायाम से और मेहनत से खून का दौरा बढ़ता है; जिससे कि पूरे शरीर को पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिल जाते हैं और हमारी त्वचा खिली रहती है। इसीलिए आलस को दूर रखकर प्रतिदिन व्यायाम और काम करना चाहिए।

संतुलित भोजन:  भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसमें सारे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में हों। इसके लिए सलाद, कच्ची सब्जियां, सूखे मेवे सभी वस्तुओं का पर्याप्त समावेश होना चाहिए। समय पर खाना चाहिए और बहुत अधिक या बहुत कम नहीं खाना चाहिए। उससे भी शरीर तो स्वस्थ रहता ही है और त्वचा की सुंदरता भी बनी रहती है।

आत्मविश्वास:  अपने ऊपर विश्वास रखकर प्रत्येक कार्य करना और कठिन परिस्थिति में भी मुस्कुराते रहना यह भी त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारक है। वास्तव में परेशानियां और कठिन परिस्थितियां तो जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। लेकिन आत्मविश्वास से इनका सामना करते हुए, अपनी सेहत का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी होता है। इससे हमारी त्वचा भी स्वस्थ बनी रहती है। वास्तव में स्वस्थ त्वचा ही तो सुंदर त्वचा होती है। 



Sunday, May 10, 2026

कबाड़ में कनक!

 कुंती का बहुत मन था कि वह भी कुंभ के मेले में जाकर स्नान कर आए। लेकिन उसके पति राम दास को समय ही नहीं मिलता था। वह बिजली का मिस्त्री था और आसपास के सभी लोग उससे ही अपना काम करवाते थे। रामदास इतना कुशल था कि उसके अलावा किसी और से, वे काम करवाना पसंद नहीं करते थे। 

एक दिन कुंती ने अपने मन की बात रामदास के सामने रख दी। रामदास ने कहा, "मन तो मेरा भी बहुत था। लेकिन फुर्सत ही नहीं मिल रही।"

 कुंती के बहुत आग्रह करने पर रामदास ने कहा, "ठीक है। दो-चार दिन का समय निकालकर चलते हैं। बार-बार यह समय थोड़े ही आता है।"

 कुंभ के स्नान पर जाने से पहले उन्होंने सभी तैयारियां कर ली। कुंती के कुछ गहने भी अलमारी में रखे हुए थे। रामदास ने कहा "कहीं ऐसा न हो कि पीछे से कोई चोर घर में घुस आएं और ये गहने चुरा ले जाएं। तुम ऐसा करो कि उन गहनों को कहीं और छिपा दो।"

 कुंती ने कहा, "ऐसी कौन सी जगह हो सकती है जहां इन गहनों को छुपाए और चोरों को पता भी न लगे?"

 रामदास को एक विचार सूझा। उसने अखबारों की रद्दी में गहनों की एक पोटली बनाकर छिपा दी। उसने सोचा कि वापिस आकर, इन गहनों को दोबारा अलमारी में रख देंगे।

अगले दिन वे कुंभ स्नान के लिए चले गए। तीन-चार दिन बाद जब वे वापिस घर लौट कर आए तो अपने कामों में व्यस्त हो गए। उन गहनों की पोटली के बारे में तो वे भूल ही गए।

 दीवाली का समय पास आ रहा था। कुंती और रामदास घर की सफाई में व्यस्त थे। रामदास ने कहा, "घर का व्यर्थ का सामान फेंक देना चाहिए। जो चीज रद्दी में बेची जा सकती है उन्हें मैं कबाड़ में बेच आता हूं।" 

घर का सारा कबाड़ इकट्ठा करके वह रद्दी वाले को बेच आया। उन्हें यह याद ही नहीं रहा कि अखबारों के बीच में उनकी गहनों की पोटली भी रखी है। 

कई महीने बीत गए। एक दिन कुंती को किसी विवाह में सम्मिलित होना था। उसने गहने पहनने के लिए अलमारी खोली और उसमें से गहने निकालने लगी। लेकिन उसमें तो गहने थे ही नहीं। फिर उसे याद आया कि कुंभ जाते समय उन्होंने गहनों की पोटली अखबार की रद्दी में रख दी थी। उसने रामदास को बताया कि गहने तो अखबार की रद्दी के साथ कबाड़ वाले के पास ही चले गए हैं। रामदास तुरंत लपककर कबाड़ वाले के पास दौड़ा। उसने कबाड़ वाले से पूछा, "कहीं मेरे अखबारों की रद्दी में, तुमने मेरे गहनों की पोटली तो नहीं देखी?"

कबाड़ वाले रहमत मियां अपनी दुकान पर कबाड़ तुलवा रहे थे। चश्मे से झांकते हुए उन्होंने रामदास को देखा और पूछा, "कौन से गहने?"

 रामदास ने कहा, "मैंने छः सात महीने पहले आपको अखबारों की रद्दी बेची थी। गलती से उसी में मेरे गहनों की पोटली भी रखी हुई थी। अगर आपको वह गहनों की पोटली मिली हो तो कृपया उसे वापस कर दें। वह मेरे गहनों की पोटली है।"

रामदास को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि इन्हें गहनों की वह पोटली मिली होगी। उसने तो ऐसे ही पूछ लिया था। लेकिन वह हैरान हुआ, जब रहमत मियां बोले, "अच्छा! तो वह पोटली तुम्हारी है।"

 वह सकपका गया और हैरान होकर उसने जवाब दिया, "हां। क्या आपको वह पोटली मिली है? वह मेरी ही है!"

हुआ यह, कि एक दिन, रहमत मियां अपनी कबाड़ की दुकान में मुआयना कर रहे थे कि कौन सा कबाड़ किस तरफ रखना है। अचानक उनकी नजर एक छोटी सी पोटली पर गई। उसके अंदर कुछ रखा हुआ प्रतीत हो रहा था। उन्होंने पोटली खोली तो पाया कि उसमें कुछ गहने थे। उन्होंने सोचा कि शायद कबाड़ में किसी के नकली गहने इस पोटली में आ गए हैं। तभी तो मजदूरों ने भी यह पोटली एक तरफ रख दी है। लेकिन गहनों की तरफ नजर डालते हुए उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद ये गहने नकली नहीं है। ये तो असली सोने के प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा सोचकर उन्होंने वह पोटली अपने कुर्ते की जेब में रख ली।  उन्होंने सोचा कि दुकान बंद करने के बाद वे सुनार के पास जाएंगे और इस पोटली के गहनों की जांच करवा लेंगे।

 दुकान बंद करने के बाद जब वे घर की ओर गए तो रास्ते में एक सुनार की दुकान पर रुक कर उन्होंने उसे गहने दिखाए। और पूछा कि गहने नकली है या असली? 

"ये गहने तो शुद्ध सोने के हैं।" 

"अच्छा तो ये नकली नहीं है?"

 "नहीं। नहीं। असली सोने के गहने हैं!" यह कहते हुए सुनार ने हंसते हुए पूछ ही लिया, "क्या यह भी कबाड़ में बिकने के लिए आए थे?"

 रहमत मियां भी हंसते हुए बोले, "हां। ये कबाड़ के बीच में ही तो मिले हैं। इन्हें संभाल कर रख लूंगा। क्या पता किसी को याद आए और वह अपने गहने मांगने के लिए मेरे पास आए।"

सुनार ने भी कहा, "हां इन्हें संभाल कर रखिएगा यह असली सोना है।"

अब रामदास उन गहनों के बारे में पूछने आया, तो रहमत मियां को वह पोटली याद आ गई। उन्होंने उसे अपने घर में अच्छी तरह संभाल कर रखा हुआ था। 

उन्होंने रामदास को कहा, "तुम बिल्कुल निश्चिंत रहो। वह गहनों की पोटली मेरे पास संभली हुई रखी है।"

 रामदास की तो जान में जान आई। वह हैरान भी था और प्रसन्न भी! वह बार-बार रहमत मियां को धन्यवाद दे रहा था। रहमत मियां तो कह रहे थे, "भाई! मेरा धन्यवाद किस बात का? उस खुदा को धन्यवाद करो। शायद उन्होंने ही मेरी नज़र तुम्हारी गहनों की पोटली पर पड़वा दी और मैंनें तुम्हारे गहने संभाल कर रख लिए।" 

रामदास बहुत शुक्रगुजार था; भगवान का भी, और रहमत मियां का भी! 

आखिर कबाड़ में खोया हुआ कनक जो उसे वापिस मिल गया था!

Thursday, April 9, 2026

मोमो और गहने!

"मेरे सारे गहने कहां चले गए?" सरिता अलमारी के लॉकर को हैरानी से देखते हुए बोल उठी। उसने अपने पति अनिल को बुलाया और लॉकर दिखाते हुए बोली, "मेरे गहने तुमने लिए हैं क्या?"

 "नहीं!" अनिल ने कहा, "मैंने तो कोई गहने नहीं लिए।"

 "तो फिर मेरे गहने कहां चले गए? कहीं मैंने किसी और जगह तो अपने गहने नहीं रख दिए?"

 सरिता ने पूरा घर अच्छी तरह देख लिया। कपड़ों की अलमारी, रसोई घर के सभी शेल्फ, स्टोर हाउस यहां तक की बाथरूम भी लेकिन कहीं पर भी उसके गहने नहीं मिले। अनिल भी बहुत हैरान हुआ।

   "गहने कौन निकाल सकता है? कहीं तुमने ही तो निकाल कर कहीं और नहीं रख दिए गहने? गए तो कहां गए?"

 तभी उनका बेटा संदीप घर वापस आ गया। वह खेलने के लिए बाहर गया हुआ था। सरिता ने संदीप से भी पूछा, "संदीप! मेरे लॉकर में मेरे गहने रखे हुए थे। वह नहीं मिल रहे हैं। क्या तुम्हें उनके बारे में कुछ मालूम है? तुमने घर में कहीं देखे मेरे गहने?"

 संदीप 7-8 वर्ष का एक अबोध बालक था। उसे मोमो खाने का बहुत शौक था। वह रोज ही मोमो खाना चाहता था। लेकिन सरिता उसे रोज मोमो खाने के लिए पैसे नहीं देती थी। वह मोमो की दुकान पर जाता, तो मोमो वाला उसे कभी-कभी मुफ्त में ही मोमो खिला देता था। एक दिन मोमो वाले ने कहा कि तुम्हें अनलिमिटेड लाइफटाइम मोमो मिलेंगे।

 यह सुनकर संदीप बहुत प्रसन्न हो उठा। उसने कहा, "ऐसा कैसे हो सकता है ?"

मोम वाला बड़े प्यार से संदीप से बोला, "बेटा! ऐसा हो सकता है। तुम्हें बस यह करना है कि अपने घर रखे हुए मम्मी के गहने मुझे दे जाओ।"

 संदीप अपने घर आया। उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया। उसने चुपचाप लॉकर से गहने निकाले और मोमो वाले को दे दिए। मोमो वाले ने उसे बहुत सारे मोमो दिए। उसने मन भर कर मोमो खाए और किसी को कुछ भी नहीं बताया। लेकिन अगले दिन जब वह मोमो वाले के पास गया, तो उसने पाया कि वहां मोमो वाला था ही नहीं। फिर वह दो-तीन दिन तक उसके पास जाता रहा। लेकिन मोमो वाला वहां वापस नहीं आया। वह निराश हो गया। लेकिन उसने घर में कुछ भी नहीं बताया।

अब गहनों की तलाश हो रही थी। उसकी मां उसे अपने गहनों के बारे में पूछ रही थी। तब उसे लगा कि उसे गहनों के बारे में सब कुछ सच-सच बता देना चाहिए।  उसने सारी बात अपने माता-पिता को बता दी। अनिल उसके साथ वहां गया, जहां वह रोज मोमो खाता था। वहां पर कोई भी नहीं था। आस-पास पूछने पर पता चला कि वह कई दिन पहले से वहां से गायब है। यह भी पता चला कि वह आसपास की ही किसी झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में रहता है।

 जब अनिल उसके झुग्गी ढूंढते हुए वहां पहुंचा, तो पता चला वह झुग्गी बेचकर कहीं चला गया है। वे दोनों बहुत निराश हुए। पर अब कर ही क्या सकते थे? संदीप बहुत अधिक दुखी हुआ। उसने अपने पिता से कहा कि उसने बहुत गलत काम किया है। आगे से वह ऐसा कभी भी नहीं करेगा। लेकिन अब गहने तो वापिस आ नहीं सकते थे। 

अनिल ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस वाले भी बहुत अधिक हैरान हुए। उन्होंने अनिल को आश्वासन दिया कि वे मोमो वाले को ढूंढने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन वे आश्चर्य चकित थे इस बात पर, कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतनी तुच्छ वस्तु के लालच में आकर, एक अबोध बच्चे ने अपनी मां के सारे गहने, मोमो वाले के हाथ में थमा दिए?


Friday, January 23, 2026

कटहल का कमाल!

 देवदत्त एक कॉलेज में प्रोफेसर था। उसका कॉलेज बहुत दूरी पर था। सवेरे जब भी वह अपने कॉलेज के लिए जाता तो रास्ते में उसके प्रिंसिपल अभिषेक भी उसके साथ ही बैठकर कॉलेज तक चले जाते। प्रिंसिपल अभिषेक का घर बीच रास्ते में ही था। इसीलिए वे लगभग प्रतिदिन देवदत्त के साथ ही कॉलेज में जाते थे। देवदत्त को भी इसमें कोई आपत्ति न थी। उसे तो कॉलेज जाना ही होता था।

 देवदत्त का बहुत बड़ा सा घर था। उसमें तरह-तरह के पेड़ भी लगे हुए थे। नारियल के, नींबू के, आम के, केले के और एक बड़ा सा कटहल का पेड़ भी था। कटहल के पेड़ में बहुत कटहल आते थे; जिन्हें देवदत्त की मां कल्पना आस पड़ोस में बांट देती थी। लेकिन कोई कल्पना की मर्ज़ी के बिना कटहल ले जाए, तो उसे बहुत बुरा लगता था।

 एक बार ऐसा हुआ कि देवदत्त के पिता श्यामा प्रसाद बहुत बीमार हो गए। उनका बहुत इलाज़ कराया, लेकिन श्यामा प्रसाद बच न सके। उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए देवदत्त के कॉलेज से भी सभी प्रोफेसर आए। प्रिंसिपल अभिषेक भी साथ ही आए। थोड़ी देर के बाद सभी प्रोफेसर चले गए। 

प्रिंसिपल साहब कुछ अधिक देर तक वहीं बैठे रहे। उन्होंने देवदत्त के घर में सभी पेड़ों को देखा। उन्हें कटहल का पेड़ विशेष रूप से बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद प्रिंसिपल साहब भी अपने घर चले गए।

 एक दिन ऐसे ही कार में साथ-साथ जाते समय प्रिंसिपल साहब ने देवदत्त से पूछा, "इस कटहल के पेड़ में तो बहुत कटहल आते होंगे?"

 देवदूत ने कहा, "हां। जब मौसम होता है तो यह कटहल से भर जाता है।"

 प्रिंसिपल साहब कुछ अलग मिजाज़ के ही व्यक्ति थे। वे कंजूस भी थे और थोड़े लालची भी! तभी तो वे रोज देवदत्त के साथ ही कार में अपने कॉलेज जाया करते थे। अब उन्हें यह पता चल गया था कि देवदत्त के घर कटहल का पेड़ है। उन्हें कटहल पसंद भी बहुत थी।

 उन्होंने कहा, "देवदत्त! जब भी तुम्हारे पेड़ में कटहल आए तो मुझे अवश्य देना।" देवदत्त ने सहर्ष सहमति दे दी। 

 कटहल का मौसम आने पर देवदत्त एक बोरा भरकर कटहल प्रिंसिपल साहब के लिए ले आया। देवदत्त की मां कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे तो प्रिंसिपल साहब वैसे भी बहुत पसंद नहीं थे। इस पर उन्होंने जबरदस्ती ही कटहल भी मांग लिए थे। देवदत्त ने भी पूरा बोरा भरकर उन्हें कटहल दे दिए थे।  वह इस बात से बहुत परेशान थी। 

 कल्पना को यह समझते देर न लगी, कि अब प्रिंसिपल साहब के पास, हर बार ही कटहल का एक बोरा ज़रूर जाया करेगा। कल्पना ने सोचा, कि देवदत्त को अगर मना किया गया, तो भी वह रुकेगा नहीं। वह प्रोफेसर साहब को कटहल अवश्य देगा। वह उनको कटहल न दे, इसके लिए प्रिंसिपल साहब से देवदत्त के मन की दूरी बनाना आवश्यक था। इसीलिए उसने देवदत्त को प्राय: यह कहना शुरू कर दिया, कि ये प्रिंसिपल साहब अपनी गाड़ी में क्यों नहीं जाते? यह रोज़ तुम्हारे साथ ही क्यों कॉलेज जाते हैं? 

पहले तो देवदत्त ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपनी मां की बात प्रतिदिन सुनते-सुनते, धीरे-धीरे उसे स्वयं भी लगने लगा, कि प्रिंसिपल साहब हर रोज़ उसके साथ जबरदस्ती ही जाते हैं। उसे भी यह बात खटकने लगी। अब रोज़-रोज़ प्रिंसिपल साहब को अपने साथ ले जाना उसे भार की तरह लगने लगा। 

अब उनसे पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे? उन्हें मना तो किया नहीं जा सकता था। उसे एक तरकीब सूझी। उसके घर से कॉलेज बहुत दूर पड़ता था। पेट्रोल का भी काफी खर्च आता था। इसीलिए उसने सोचा कि कॉलेज के अंदर ही जो सरकारी क्वार्टर हैं; उसी में वह रहना शुरू कर देगा। इससे पेट्रोल का खर्चा भी बचेगा और प्रिंसिपल से भी छुटकारा मिलेगा। जितना उसका मकान किराया भत्ता कटेगा, उतने का तो पेट्रोल ही खर्च हो जाता था।

 उसने तुरंत सरकारी क्वार्टर के लिए आवेदन कर दिया। उसको मकान मिल भी गया। उसने घर जाकर प्रसन्नता से अपनी मां कल्पना को बताया कि अब हम सरकारी क्वार्टर में रहेंगे। प्रिंसिपल अब मेरे साथ नहीं जाया करेंगे। यह झंझट खत्म हुआ। 

लेकिन मां कल्पना को यह बात सुनकर, तनिक भी खुशी नहीं हुई। उसे तो अपने मकान में ही रहना था। उसे सरकारी मकान में नहीं जाना था। 

उसने कहा,"नहीं। हम अपने मकान में ही रहेंगे। सरकारी मकान में क्या करेंगे जाकर? जब अपना मकान इतना अच्छा है। तो इसे क्यों छोड़ेंगे?"

 लेकिन देवदत्त ने कहा, "मां! एक तो प्रिंसिपल साहब से छुटकारा मिल जाएगा। और दूसरा मकान से कॉलेज की बहुत अधिक दूरी है। तो समय भी बचेगा और पेट्रोल भी। इसीलिए हम सरकारी मकान में ही रहेंगे।"

 घर का सामान शिफ्ट होते समय कल्पना सोच रही थी, "इससे अच्छा तो यह था कि भले ही प्रिंसिपल साहब हर साल एक बोरा कटहल ले लेते, लेकिन कम से कम हम अपने मकान में तो रहते!"

केवल कटहल के कारण कितना बडा कमाल हो जाएगा; यह तो कल्पना की कल्पना में भी नहीं था!

Tuesday, December 2, 2025

श्वान संरक्षण

 बंगाल के नवद्वीप शहर में एक सार्वजनिक शौचालय के बाहर नवजात शिशु पडा हुआ था। उसके चारों तरफ एक सुरक्षा चक्र था। जानते हैं किसका? सड़क के कुत्तों का। जी हां! उन कुत्तों ने उस नवजात शिशु के चारों ओर घेरा बनाकर उसे सुरक्षा प्रदान की हुई थी। ऐसा लग रहा था, मानो वह उन्हीं का अपना बच्चा हो! पूरी रात वे ऐसे ही खड़े रहे; जब तक कि वहां कोई व्यक्ति नहीं आ गया।

रात भर लोगों को किसी नन्हे शिशु के क्रंदन की आवाज आती रही। लेकिन सभी ने सोचा कि किसी घर के अंदर ही कोई बच्चा रो रहा है।

 भोर होने से पहले ही राधा भौमिक, सार्वजनिक शौचालय में निवृत्त होने के लिए गई। वह हैरान हुई यह देखकर, कि वहां कुत्तों का घेरा था। जब उसने घेरे के बीच में से झांका; तो एक नन्हा शिशु वहां लेटा हुआ था। उसने आगे बढ़कर वह बच्चा अपनी गोद में उठा लिया। कुत्तों ने भी उसे वह बच्चा उठाने दिया। जब वह बच्चा उठा चुकी और कुत्तों ने देखा कि वह सुरक्षित है तो वे वहां से चले गए। 

राधा ने अपनी बहू प्रीति को बुलाया और उसे वह बच्चा पकड़ा दिया। प्रीति तुरंत उसे पास के महेश गंज अस्पताल में ले गई। वहां के डॉक्टरों ने उस शिशु को कृष्णा नगर सदर अस्पताल में पहुंचा दिया। बच्चे के माथे पर थोड़ा खून था। परंतु डॉक्टर ने कहा कि वह जन्म के समय ही रहा होगा। बच्चे को जन्म के एक-दो घंटे के अंदर ही बेसहारा छोड़ दिया गया था। पुलिस वालों ने आसपास पूछताछ भी की। लेकिन कुछ पता न चला। उन्होंने उस बच्चे को बाल कल्याण समिति की सुरक्षा में भेज दिया।

वहां के लोग इस घटना से बहुत हैरान थे। लेकिन तभी उन्हें नौ वर्ष पहले कोलकाता में हुआ एक और किस्सा याद आ गया।  तब भी गली के कुत्तों ने एक नवजात कन्या शिशु को कौवों से बचाया था। उन्होंने तब तक उस शिशु को बचाए रखा, जब तक कि लोग उस कन्या को अपनी सुरक्षा में लेने के लिए नहीं आ गए।

ये घटनाएं वास्तव में बहुत विस्मय और उत्सुकता से भरी हुई हैं। 

गली के आवारा कुत्तों को हम परेशानी का कारण मानते हैं। हम यही मानकर चलते हैं कि यह कुत्ते अचानक काट सकते हैं। यह तो हम कल्पना ही नहीं कर सकते कि वे किसी नवजात मानव शिशु को ऐसे ही छोड़ देंगे। ऐसा लगता है कि सद्योजात मानव शिशु को तो शायद वे खा ही जाएंगे। यह बहुत अधिक आश्चर्य का विषय है कि उन मूक प्राणियों में सामूहिक रूप से, इतनी अधिक दया, करुणा और ममता एक इंसान के बच्चे के लिए विद्यमान थी। प्रकृति में जीव-जंतुओं का व्यवहार कभी-कभी तर्क और बुद्धि के परे होता है।

Sunday, November 30, 2025

सतरंगी अनुभूतियां

 सुबह उठी, तो बहुत थकावट महसूस हो रही थी। लग रहा था कि समय कम है; और काम अनेक! अक्सर एक दिन में एक काम निपटाया जाए; उसी में ही सारा दिन व्यतीत हो जाता है। शरीर की ऊर्जा की भी एक सीमा निश्चित होती है। उससे ज्यादा काम करने पर शरीर प्रतिरोध करता है।

 बात यह थी कि मुझे वार्षिक जीवन प्रमाण पत्र बैंक में देना था। वह भी एक बैंक में नहीं, बल्कि दो बैंकों में। दोनों बैंक काफी दूरी पर हैं। यद्यपि बैंकों में पैदल ही जाया जा सकता है; पर मुझे लग रहा कि थकान बहुत अधिक हो जाएगी। मैंने निर्णय किया कि आवश्यक दस्तावेज लेकर, मैं एक बैंक का काम निपटाकर घर वापस आ जाऊंगी।

 घर से निकली, तो थके-थके से कदम लग रहे थे। मंदी-मंदी धूप थी और हल्की-हल्की ठंड भी। चलना अच्छा तो लग रह रहा था; लेकिन यही महसूस हो रहा था कि एक बैंक का काम ही निपट पाएगा। उसके बाद में घर आ जाऊंगी। 

 जैसे-जैसे बैंक की ओर गई थकान का अनुभव कम होने लगा। रास्ते में एक विद्यालय पड़ता है। वहां विद्यालय के द्वार पर खडी एक युवा लड़की ने मुझे रोक लिया। उसने पूछा, "क्या आप बीमा करना चाहती हैं?"

 मैंने कहा, "अभी मैं बता नहीं सकती। पहले बच्चों से बात करूंगी। तब तुम्हें बता सकती हूं।"

 उसने मुझे अपना कार्ड दे दिया और अनुग्रह किया कि मैं उससे ही बीमा कराऊं। मैंने मुस्कुराकर उससे कार्ड ले लिया। अब मैं आगे बढ़ी। मैंने सोचा यह कितना प्रयत्न कर रही है कि इसे कोई ग्राहक मिल जाए और इसका काम आगे बढ़े। प्रयत्नशील तो होना ही चाहिए।

 यही सोचती हुई आगे चलती गई। आगे चलते-चलते रास्ते में कुछ बुजुर्ग व्यक्ति मिले। जो काफी बड़ी उम्र के लग रहे थे। बहुत  संभ्रांत परिवार के लग रहे थे। वे कार में भी जा सकते थे। लेकिन वे पैदल ही जा रहे थे। मैंने सोचा यह जब ये बुजुर्ग बड़े मजे में हंसते हुए, बातें करते हुए अपने काम के लिए चलकर जा रहे हैं; तो मैं पैदल क्यों नहीं चल सकती? वास्तव में शारीरिक शक्ति तो आवश्यक है ही। लेकिन यदि मन में भी शक्ति का संचार हो जाए तो तन की शक्ति द्विगुणित हो जाती है। जब मेरे तन में शक्ति संचरित हुई, तो मैं रास्ते के तरह-तरह के नज़ारों का मज़ा लेते हुए, धीरे-धीरे अपने बैंक तक पहुंच गई। अब तक शरीर की थकावट काफ़ूर हो चुकी थी।

 मैंने सोचा यह था कि बैंक में काफी भीड़ भड़क्का होगा। घंटा दो घंटा तो बैठना ही पड़ेगा। तब नंबर आएगा। तभी अपना काम निपटा पाऊंगी। लेकिन मैं हैरान हुई देखकर, कि वह बैंक लगभग खाली था। जहां मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना था वह काउंटर तो बिल्कुल ही खाली था। मुस्कुराते हुए वहां के क्लर्क ने मेरा फॉर्म लिया। उसका नंबर अपने कंप्यूटर में डाला। मेरी फोटो अपने फोन से खींची। तुरंत मेरा जीवन प्रमाण पत्र सर्टिफाई हो गया। वाह! क्या स्पीड थी? मज़ा आ गया!

 मैं वहां खड़ी हुई अचंभा कर रही थी; कि कितनी फुर्ती से काम हो गया। तभी मेरे सामने एक महाशय आए। बोले, "आप यहां कैसे?"

 मैंने भी उन्हें पहचानने की कोशिश की। मैंने कहा, "अरे आप मिस्टर वोहरा है?"

वे बोले, "हां! हां! मैं वही हूं।"

 बात यह थी कि उनकी पत्नी संतोष वोहरा मेरे साथ ही अध्यापिका थी। उन्हें देखे मुझे लगभग पंद्रह वर्ष तो हो ही गए होंगे।  आज बड़े दिनों बाद उन्हें देखा तो थोड़ा पहचानने में दिक्कत आई। वे बहुत खुश मिजाज व्यक्ति हैं। परन्तु आज कुछ मायूस से लग रहे थे। मैंने पूछा, "सब ठीक-ठाक तो है न?"

 उन्होंने बताया कि उन्हें ब्लड कैंसर हो गया है। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। उनकी उम्र करीब लगभग 77 वर्ष की होगी। उनका बेटा और बहू डॉक्टर हैं। उनका इलाज बहुत कामयाब डॉक्टर से चल रहा है। लेकिन फिर भी वह कह रहे थे कि बचने की उम्मीद ज्यादा नहीं है। मैंने उनसे अपनी सहकर्मी संतोष वोहरा के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उसकी पैर की हड्डियों में भी दर्द होता है और भी कई परेशानी चल रही हैं। यह बात सुनकर मुझे बहुत ही अफसोस हुआ। कहां तो मैं प्रसन्न हो रही थी कि मेरा बैंक का काम चुटकियों में निपट गया था; और कहां मुझे दुःख हो रहा था कि मेरी सहकर्मी और उनके उसके पति इतनी परेशानी में हैं। 

खैर! हम वहां बैठ गए। हमने थोड़ी देर बातें की। वे कह रहे थे कि हमारी शादी की पचासवीं सालगिरह है। हमारे पचास साल लड़ाई झगड़े में ही बीते। मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा, "आप बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं। आप तो संतोष को बहुत प्यार करते हैं।  उसके गले में हाथ डालकर, आप कहते थे: मेरी तोशी! मेरी तोशी! मुझे सब याद है।"

 वे भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, "आप घर क्यों नहीं आती हो? संतोष आपको बहुत याद करती है। आप घर आओ। मैं पकोड़े अपने हाथ से बनाकर आपको खिलाऊंगा और साथ में चाय भी पिलाऊंगा।"

 मैंने कहा, "हां! मैं जरूर आऊंगी। मुझे संतोष के हाथ के परांठे भी खाने हैं। दिसंबर में तो आप अपनी शादी की पचासवीं वर्षगांठ मना ही रहे हैं। तभी आऊंगी।"

 उन्होंने कहा,"नहीं आपको पहले भी आना है। पता नहीं, वर्षगांठ में मना पाऊंगा कि नहीं।" 

मैंने सांत्वना देते हुए कहा, "आप ऐसा मत बोलिए। आप कम से कम सौ वर्ष तक जिंदा रहेंगे। आप मेरी सलाह मानिए। एक बार ऋषिकेश में पतंजलि अवश्य हो आइए। आगे भगवान की इच्छा पर छोड़ दीजिए।"

  यह बोले,"ठीक है। मैं वहां ज़रूर जाऊंगा।" 

उस बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि वर्षों तक हम नहीं मिले। अचानक ही पता चल रहा है कि इनको कितनी बीमारियां हो गई हैं। मिलते-जुलते न रहो तो किसी का पता ही नहीं चलता। मैं सोच रही थी कि ब्लड कैंसर होते हुए भी वे स्वयं बैंक में आए हैं और अपना कार्य करवा रहे हैं। और किसी को अपने साथ लेकर नहीं आए। इनमें तो बहुत अधिक दृढ़ इच्छा शक्ति है। इस बात से मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने निर्णय किया कि मैं दूसरे बैंक में भी यहां से पैदल ही जाऊंगी। 

चलते-चलते मैं अपने दूसरे बैंक तक भी पहुंचने वाली थी कि रास्ते में भूख लगी। मैंने केले खरीदे। अभी एक केला निकालकर खाने ही वाली थी कि सामने से एक व्यक्ति आ गया उसने कहा, "मैंने आज सवेरे से कुछ नहीं खाया। मैं अपना ठेला लगाने ही वाला था कि मेरे सिलेंडर की गैस खत्म हो गई। लेकिन मुझे भूख बहुत जोर से लगी है और मेरे पास पैसे भी नहीं है। आप कुछ खिला दीजिए।"

 मैंने अपने हाथ का केला उसके हाथ में दे दिया। मैं आगे चल दी। मैंने सोच रही थी कि बेचारे को कितनी परेशानी हो रही होगी। परन्तु मैं कर ही क्या सकती थी। मुझे तो दूसरे बैंक भी जाना था। मैंने दूसरे केले को निकाल कर खाया। जिससे कुछ भूख शांत हुई। 

तभी चलते-चलते बैंक भी आ गया। मैं अंदर गई। बैंक के अंदर घुसते ही मेरे सामने एक हर्ष मिश्रित विस्मय था। मेरे विद्यालय की एक छात्रा वहां काउंटर पर खड़ी थी। मुझे देखते ही उसने मुझे एकदम पहचान लिया। उसने मेरा अभिवादन किया। मुझे उसकी शक्ल थोड़ी बहुत जानी पहचानी लगी; परन्तु नाम बिल्कुल याद नहीं आया। मैंने कहा, "बेटा! तुम तुम्हारा क्या नाम है?"

 उसने कहा, "मैं चंचल हूं। आप मुझे पढ़ाते थे; मुल्तान नगर स्कूल में।"

 मैंने कहा, "हां कुछ-कुछ याद तो आया। लेकिन तुम्हारा नाम याद नहीं आ रहा था"

 मुझे बड़ी खुशी हुई कि उसकी बैंक में परमानेंट जॉब लग गई थी। उसने पूछा, "मैम! आपके लिए क्या कर सकती हूं?" 

मैंने कहा, "मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना है।" 

उसने तुरंत मेरे जीवन प्रमाण पत्र के फार्म भरवा कर सबमिट कर दिए। मुझे एक एफ डी भी करवानी थी। वह भी काम उसने चटपट कर दिया। मैं तो हैरान ही हो गई कि बैंक में कार्यरत, मेरे द्वारा पढ़ाई गई छात्रा का मुझको कितना अधिक लाभ हुआ! उसने पांच मिनट में ही सारा काम निपटा दिया। 

एक तो मुझे उससे मिलकर ही बड़ी खुशी हुई थी कि मेरी छात्रा इस बैंक में नौकरी पर लगी हुई है। अब उसने मेरे काम को भी पांच मिनट में ही निपटा डाला तो खुशी द्विगुणित हो गई। मैंने बचे हुए केले उसके बैग में डालते हुए कहा, "बेटा! यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए।"

 यह देखकर तो वह बहुत ज्यादा खुश हो गई।  उसने कई बार मुझे थैंक यू मैम, थैंक यू मैम, कहा। उसकी प्रसन्नता ने मेरी प्रसन्नता भी बढा दी। उसने यह भी बताया कि उसकी क्लास के अधिकतर बच्चे बहुत बढ़िया जॉब पर लग गए हैं। दस बारह बच्चे तो सरकारी बैंकों में ही कार्यरत हैं। कोई विद्यार्थी अमेरिका भी चला गया है। कुछ बच्चे दुबई में भी हैं।

 बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि मेरी पढ़ाई हुई छात्रा की अच्छी जॉब लग गई है। कितनी खुश थी वह! मेरा काम भी उसने गजब की स्फूर्ति से कर दिया। मुझे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि उसकी क्लास के बहुत से बच्चों ने काफी अच्छे मुकाम हासिल कर लिए थे। वास्तव में, सरकारी विद्यालयों में, बच्चे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं; उनके लिए ये उपलब्धियां प्राप्त करना सरल नहीं होता।

इस समय मैं दिन की पिछली सब बातें भूल कर प्रसन्नता और गर्व से भर गई। उन बच्चों के बारे में सोचने लगी जो उसकी क्लास में थे। सोचते सोचते आगे बढ़ी तो रास्ते में पतंजलि स्टोर था। मुझे याद आया मुझे हिंग्वाष्टक चूर्ण भी लेना है। पतंजलि स्टोर बेसमैंट में है। मैं नीचे उतरी तो काउंटर वाली लड़की सामने ही खड़ी थी। उसने मुस्कुरा कर मेरा अभिवादन किया और पूछा, "मैम! आप क्या लेना चाहती हैं?" 

मैंने बताया कि मुझे  हिंग्वाष्टक चूर्ण चाहिए। वह चुस्ती के साथ चूर्ण लेने गई और काउंटर पर ले आई। उसने तुरंत पेमेंट भी करवा दिया। वह लड़की भी अपनी आत्मीय बन गई है। मैं गाया बगाया वहां जाती ही रहती हूं। इसीलिए वह मुझे अच्छे से पहचानती है।

 अब मैं बाहर निकली तो मैंने सोचा कि अभी समय बहुत अधिक नहीं हुआ है। क्यों न मधुजी से मिल दिया जाए। वे मेरे साथ ही एक विद्यालय में पढ़ातीं थीं। उनसे मिले भी काफी समय बीत चुका था। फोन पर ही बातचीत होती थी। कुछ दिनों पहले उन्होंने निर्णय लिया था कि वे एक बड़ा सत्संग करवायेंगी। जिसमें सभी विद्यालय की सहेलियों को बुलाएंगी। इसके लिए उन्होंने मुझे फोन भी किया था। उनका घर रास्ते में ही पड़ता था। इसीलिए मैं तुरंत उनके घर भी पहुंच गई।

 वे हैरान हो गईं मुझे देखकर! मैं अकस्मात ही जो उनके घर पहुंच गई थी। आलू बैंगन की सब्जी बनाने के लिए वे अभी बैगन काट ही रही थी। मैंने कहा, "चलो मैं आपके साथ-साथ ही सब्जी कटवा देती हूं। बीच-बीच में बातें भी करते रहेंगे।" 

 उन्होंने कहा, "नहीं। तू बैठ। सब्जी तो बनती रहेगी। मैं चाय बनाती हूं। तू चाय पी।"

 उनकी चाय हमेशा प्यार से भरी हुई होती है।  चुस्कियां लेते हुए मैंने नमकीन का आनंद भी उठाया। खूब गपशप हुई। कई पुराने किस्से याद आ गए; कुछ खट्टे कुछ मीठे। 

फिर उन्होंने कहा, "तुझे सत्संग में जरूर आना है। सभी सहेलियां मिलेंगी। पहले चाय पकौड़े खाएंगे। फिर खूब सत्संग करेंगे। बाद में जम के खाना खाएंगे। मैंने हलवाई बुला रखा है। जरूर जरूर आना है।" मैंने पक्का वायदा किया कि मैं अवश्य ही आऊंगी। 

उनके साथ बीते सभी खट्टे मीठे अनुभव याद करते हुए मैं वापस घर पहुंच रही थी। रास्ते में कबाड़ी वाले की दुकान दिखाई दी। यद्यपि अक्सर उसकी दुकान में काफी व्यस्तता नज़र आती है।  लेकिन आज वह कबाड़ी वाला बिल्कुल ही खाली बैठा था। मैंने सोचा यह अच्छा मौका है। अखबारों की रद्दी तो इकट्ठी हो ही गई है। अभी निपटा देती हूं। 

मैंने उसको कहा,"भैया! जल्दी से मेरे घर रेहडी भेज दो। अखबार की रद्दी देनी है।" 

उसने मेरे साथ ही एक रेहडी वाले को भेज दिया। वह रद्दी उठा ले गया और सारी रद्दी बिक गई। 

 लो, यह काम भी कब से टल रहा था और यह भी आज ही निपट गया। काफी संतुष्टि का अनुभव हुआ। आज मैं आधे दिन में ही कई काम कर पाई थी, और मुझे कोई थकावट भी महसूस नहीं हुई। 

 यकीनन ऐसा कोई दिन कभी-कभी ही आता है; जिसमें इतनी विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों का समावेश एक ही दिन में हो जाए। इसमें हर्ष, सुख, दुःख, चिंता, करुणा, गर्व, आश्चर्य, प्रेम, संतुष्टि आदि सभी प्रकार की अनुभूतियाँ शामिल थीं। जीवन की पूर्णता का एहसास कराने वाला, एक अलग ही दिन था यह!

वास्तव में देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन ही विभिन्न प्रकार की सतरंगी अनुभूतियों के रस में आप्लावित है। केवल आवश्यकता है, जीवन में उमंग से परिपूर्ण आशावादी दृष्टिकोण अपनाने की। जब हम सजगता से हर पल को निहारते हैं; तो उस पल में घुली हुई प्रत्येक अनुभूति हमें बहुत कुछ प्रदान कर जाती है।

Sunday, November 23, 2025

लौट आईं स्मृतियां!

 रिखीराम अंबाला जा रहा था। रास्ते में सड़क पर उसका एक्सीडेंट हो गया। वह बच गया। लेकिन उसकी याददाश्त जाती रही। उसके परिवार वालों ने उसको ढूंढने की बहुत कोशिश की। पर उसका कुछ पता न लगा। 

वास्तव में वह जिंदा था। लेकिन अपने परिवार से 1600 किलोमीटर दूर था। वहां किसी ने उसको बचा लिया था। उसे अपनी पिछली जिंदगी की सभी बातें विस्मृत हो गई थी। वह अपना नाम तक नहीं बता पा रहा था। इसीलिए उसे बचाने वाले ने उसका नाम रवि चौधरी रख दिया था। उसने नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू की। वह मुंबई  चला गया वहां उसने कुछ दिनों कुछ काम किया।

 फिर वह नांदेड़ काम के लिए चला गया।उसे एक कॉलेज में  नौकरी मिल गई। उसने एक लड़की संतोषी से विवाह भी कर लिया। उसके तीन बच्चे हुए। उसे अपने पिछले जीवन का कुछ भी याद नहीं था। लेकिन कुछ ही महीने पहले की बात है कि उसका एक और एक्सीडेंट हो गया। उसका सिर टकराया। ज्यादा चोट नहीं आई। लेकिन अचानक उसकी पिछली स्मृतियां वापस आ गई। उसे पिछले समय के बचपन के चित्र देखने लगे। उसे अपने शहर 'सातों' के पहाड़ दिखने लगे। वह बड़ा हैरान और परेशान हुआ। 

 उसने इन चित्रों की स्मृतियों को अपनी पत्नी को बताया। उसकी पत्नी ने सलाह दी कि अपनी कॉलेज के छात्रों से यह बात पूछे। वे शायद खोज कर कुछ बता पाएं। उसने अपने कॉलेज के एक विद्यार्थी को ऑनलाइन 'सातों' गांव को ढूंढने के लिए कहा। जब उस विद्यार्थी ने 'सातों' गांव ढूंढ कर, उसके एक कैफे में फोन घुमाया, तो पता चला कि वह वहां सचमुच ही रहता था। वहां पर उसका नाम रिखी राम था। 

इसके बाद रिखीराम हिमाचल प्रदेश के उसी गांव में वापस आया। वह अपने बच्चों और पत्नी को साथ लेकर आया। उसके माता-पिता की तो मृत्यु हो चुकी थी। लेकिन उसके भाई-बहन उसे पहचान गए। वे अवाक् थे, लेकिन प्रसन्न भी! उनकी आंखों में हर्ष मिश्रित आंसू आ गए। गांव वालों ने माला पहनाकर उसका स्वागत किया। यह बहुत ही भावुक मिलन था। 

यह अद्भुत बात है, कि जो घटनाएं हम फिल्मों में पर्दे पर देखकर काल्पनिक समझते हैं; वह जीवन में प्रत्यक्ष रूप से घटित हुई।

Saturday, November 22, 2025

सरल जीवन; सरल शरीर!

 स्वस्थ रहना है तो सरल जीवन की और चलना होगा। जिस सरलता से हमारे पूर्वज जीवन व्यतीत करते थे; हमें उसी राह पर चलना होगा। उनके खान-पान में बहुत सरलता थी। वह क्षेत्रीय स्तर पर उगे हुए खाद्य पदार्थ ही खाते थे। हमें भी अपने ही क्षेत्र में उगे हुए खाद्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए। हम उन्हें सरलता से पचा पाते हैं। दूसरे अपरिचित क्षेत्र के खाद्य पदार्थ पचाने में हमारे शरीर को असुविधा होती है। साथ ही हमें मौसमी फल सब्जियां ही खानी चाहिएं। मौसम के अनुकूल फल सब्जियां, हमारा शरीर आराम से पचा पाता है। हमारे पूर्वज हर समय खाते नहीं रहते थे। खूब शारीरिक परिश्रम किया करते थे। सोने से काफी देर पहले, वे दिन का आखिरी भोजन कर लेते थे। हमें भी ऐसा ही करना होगा।

  सवेरे का प्रथम भोजन थोड़ा बहुत शारीरिक परिश्रम करने के बाद ही खाना चाहिए; फिर चाहे वह थोड़ा बहुत व्यायाम हो या फिर शारीरिक काम। दिन का आखिरी भोजन सोने के लगभग तीन-चार घंटे पहले हो जाना चाहिए। खाने के बीच में अंतराल भी होना चाहिए। ऐसा नहीं की हर दो घंटे में कुछ भी खा रहे हैं। हमें सब्जियां और सलाद ज्यादा खानी चाहिए। वास्तव में हमें सजग रहकर भोजन करना चाहिए। भोजन करते समय यह अवश्य सोचना चाहिए कि यह भोजन मेरे शरीर को बीमारियां देगा; या फिर यह भोजन मेरे शरीर की बीमारियों से लड़ेगा।

हमारी आंतों में लगभग 30 से 70 ट्रिलियन बैक्टीरिया होते हैं। इनका मुख्य भोजन वही है जो कि हम सलाद और सब्जियों के रूप में खाते है। यदि हम इन बैक्टीरिया का भोजन नहीं खाते तो यह बैक्टीरिया भूखे होने पर पहले आंत की अंदर की  चिकनी परत को खाते हैं। बाद में आंतों को भी अंदर से खाना शुरू कर देते हैं। इससे आंतों में घाव होने शुरू हो जाते हैं। और बुरे टॉक्सिंस हमारे खून में पहुंचने शुरू हो जाते हैं। इस तरह बीमारियों की शुरुआत हो जाती है। यदि हम इन बैक्टीरिया को उचित भोजन देते रहेंगे तो ये  स्वयं भी संतुष्ट रहेंगे और हमारे लिए उचित विटामिनों का निर्माण करते रहेंगे। जिससे हम भी स्वस्थ रहेंगे। है न दोनों के ही फायदे की बात!

 हमें सबसे अधिक सब्जियां और फल खाने चाहिएं, उससे कम दाल और सबसे कम कार्बोहाइड्रेटस्। हमारे शरीर का लीवर अगर ठीक रहेगा तो हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। लीवर को सभी पाचक तंत्र के अवयवों की मां कहा गया है। कारण यह है कि मां सभी को आराम से सुलाकर, बाद में सभी काम निपटाकर, स्वयं आराम करती है। पहले सभी ऑर्गन्स अपना काम कर लेते हैं; और आराम करते हैं। सबसे बाद में लिवर आराम करता है। लिवर को भी कम से कम चार पांच घंटे का आराम अवश्य ही चाहिए। इसीलिए हमें बीच-बीच में नमकीन इत्यादि भी नहीं खाने चाहिए।

 जितना हम घर का बना सादा खाना खाएंगे उतना ही हमारा स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। हमें प्रयत्न करना चाहिए कि बाहर से बना हुआ खाना कम से कम खाएं। बाहर से बने भोजन की विश्वसनीयता इतनी अधिक नहीं हो सकती जितनी कि स्वयं बनाए हुए भोजन की। प्रोसैस्ड फूड तो कतई नहीं खाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त प्रयत्न करना चाहिए कि हर घंटे शारीरिक गतिशीलता भी बनी रहे।  ऐसा न हो कि हम बहुत देर तक आराम से बैठे ही रहे।

 जब हम दो खानों के बीच में अंतराल रखते हैं; तो उससे हमारे शरीर में पहले से संचित खाना भी काम में आता है। जिससे कि दो प्रक्रियाएं बड़ी अच्छी होती हैं। एक का नाम है ऑटो फैजी और दूसरे का नाम है माइटो फैजी। इन प्रक्रियाओं से ऐसी कोशिकाएं  खत्म हो जाती हैं; जो कि अनियंत्रित रूप से बढ़ती है। यदि यह प्रक्रियाएं न हो, तो ये कोशिकाएं नियंत्रण से बाहर चली जाती हैं। इसी से कैंसर होने की भी संभावना भी हो सकती है।

खाने पर नियंत्रण रखने से व स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि रुक जाती है। और कैंसर की संभावना भी न के बराबर होती है। इसीलिए स्वस्थ रहना है तो समय से खाएं। दो आहारों के बीच में उचित अंतराल रखें। सरल आहार ही करें। और हां शरीर को क्रियाशील अवश्य रखें। सरल जीवन शैली अपनाने से शरीर में भी सरलता रहती है। कोई जटिलता नहीं आती।

Wednesday, November 19, 2025

तेंदुआ और बिल्ली

 ख़बर थी कि किसी स्थान विशेष में, अब तेंदुआ शिकार करने के लायक नहीं रह गया है। उसका पेट मोटा हो गया है। नाखून कुंद हो गए हैं। दांत भी बहुत तीखे नहीं रह गए हैं। वास्तव में इन तेंदुओं को आराम से शिकार मिल जाता है। वह भी गांव के आसपास ही! वहां ये मंडराते रहते हैं। उन्हें कभी कभार मनुष्य या उनके बच्चों का मांस, बिना मेहनत किए आराम से मिल जाता है। इसीलिए वे शिकार करने में ज्यादा मेहनत नहीं डालते। इसके कारण उनकी शारीरिक संरचना में भी परिवर्तन आ रहा है। 

यह बात मुझे बहुत रुचिकर लगी। क्योंकि तेंदुओं की मौसी जो हमारे आसपास घूमती रहती हैं; उनमें भी मैं परिवर्तन देखती हूं। बिल्लियां मोटी होती जा रही जा रही है। मुझे लगता है उनके दांतों और पंजे में भी परिवर्तन आ चुका होगा; क्योंकि अक्सर वे धूप में बैठी सुस्ताती हुई नजर आती हैं। अपने आगे के पंजों पर मुंह दुबचाए, पूंछ लपेटे हुए वे आराम से सोती रहती हैं। और चूहा मज़े में उनके सामने से नृत्य करता हुआ गुज़र जाता है। वे उसे कुछ नहीं कहती। 

इसका भी कारण यही है कि उन्हें बड़े आराम से बिना मेहनत के अपना खाना मिल जाता है। कुछ लोग उन्हें कटोरियों में मीठा दूध देते हैं।  कुछ दूसरे लोग 'कैट फूड' खरीद कर लाते हैं और उनके लिए जगह-जगह बिखेर देते हैं। बिल्लियां मज़े कर रही हैं। तेंदुए के शिकार जंगल में खुश हैं। इन बिल्लियों के शिकार चूहे भी शहरों में खूब मज़े कर रहे हैं। उन्हें अब कोई भी परेशानी या डर नहीं है। वास्तव में इंसान की वजह से, जंगल में तेंदुए; और शहरों में उनकी मौसियां; खूब मौज में रह रहे हैं।

Saturday, November 15, 2025

सफाई भी! कमाई भी!

केन्द्रीय मंत्रालय के सभी विभागों में ढेर सी फाइलें इकट्ठी हो गई थीं। डिजिटलाइजेशन होने के कारण उनका अब कोई उपयोग भी नहीं रह गया था। निर्णय लिया गया कि इन सभी फाइलों को विभिन्न मंत्रालयों से हटाकर रद्दी के भाव बेच दिया जाए। इससे सभी मंत्रालयों में साफ सफाई भी होगी और इन बेकार फाइलों से कुछ थोड़ी बहुत आय भी हो जाएगी। 

जब सारा सामान निकाल कर बेचा गया और उससे जो आमदनी हुई; उसे देखकर सभी चकित रह गए। यह आमदनी थी 4100 करोड रुपए! इससे भी अच्छी यह बात थी कि उन फाइलों के हटने के कारण बहुत सी जगह खाली हो गई थी। यह आंकड़ा भी हैरान करने वाला है। लगभग 923 लाख फुट जगह घेरे हुए थीं ये फाइलें! फाइलों को बेचने से जो 4100 करोड रुपए की कमाई हुई; उससे भारत अपना एक बड़ा स्पेस सेंटर अंतरिक्ष में स्थापित कर सकता है।

हुआ न फायदे का सौदा! मंत्रालयों की सफाई तो हुई ही; साथ में इतनी बड़ी कमाई भी हो गई!

Thursday, November 13, 2025

अमृत का सरोवर!

 बहुत दिनों से मन में अमित से मिलने की बहुत इच्छा थी। अमित धवन मुझे बेंगलुरु में मिला था। वह वहां रहकर दंत शल्य चिकित्सा में स्नातकोत्तर पढ़ाई कर रहा था। मैं जब छुट्टियों में ऋचा के पास रहने गई, तब वह भी वहां हॉस्टल में रह रहा था। वह ऋचा के बैच से एक वर्ष सीनियर था। उसका हँसमुख स्वभाव सबको बहुत पसंद था।  वह सबको हंसाता तो रहता ही था; साथ ही बहुत सुरीला गाना भी गाता था। कभी अगर वह गाना गा रहा होता, तो दूर से ऐसा लगता था, मानो मोहम्मद रफी ही गाना गा रहे हैं।

 जब भी वह कॉलेज से हॉस्टल की तरफ आता तो उसकी सीटी की आवाज से ही पता चल जाता था कि अमित धवन आ रहा है। हमेशा वह खूब बातें करता था। जब खाने के बाद हम सभी इकट्ठे हो जाते; तो वह खूब मज़ाक करता और फिल्मी गाने सुनाता। सभी अपनी दिन भर की थकान भूल जाते थे। कभी-कभी वह किचन में मेरे साथ खाना बनवाने में भी मदद करता था। और आलू के परांठे की फरमाइश तो वह अक्सर ही करता था। वह ठहरा पंजाब का! और पंजाबी तो परांठे के शौकीन होते ही है। बहुत अच्छा समय गुजरा उसके साथ! इसीलिए उसकी बहुत याद आती थी।

अमित अमृतसर का रहने वाला लड़का था। मेरा बहुत मन था कि अमित से मिलूं। उससे मिले हुए वर्षों बीत चुके थे। अमृतसर जाने का एक और भी आकर्षण था। मैंने स्वर्ण मंदिर के दर्शन नहीं किए थे। मेरी इच्छा थी कि एक बार स्वर्ण मंदिर के भी दर्शन अवश्य ही करूं। लेकिन व्यस्तता के कारण कभी भी ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं बन पाया। बस यह मन मे ही यह अभिलाषा बनी ही रही।

एक दिन शिखा का ऋचा के पास फोन आया। वह भी ऋचा के साथ  चिकित्सा में स्नातकोत्तर की पढ़ाई इस हॉस्टल में रहकर कर रही थी। ऋचा और शिखा एक ही कमरे में रहती थीं। अब इतने वर्ष बाद उसका फोन आया तो पता चला कि वह सोनीपत में रहती है। वही उसका नर्सिंग होम भी है। उसके पति और ससुर भी डॉक्टर थे। शिखा की भी वहां अच्छी प्रैक्टिस चल रही थी। ऋचा को यह सुनकर बहुत अच्छा लगा।

 दोनों सहेलियों ने बहुत गप्पें मारी। आखिर में शिखा ने पूछा, "ऋचा! अमित की कोई खबर है क्या? वह कैसा है?"

  ऋचा ने कहा, "वह अमृतसर में ही प्रेक्टिस कर रहा है।"

शिखा ने कहा, "एक दिन प्रोग्राम बनाते हैं उससे मिलने का।"

 ऋचा बोली, "मन तो मेरा भी बहुत है। पर समय ही नहीं मिल पा रहा।" 

शिखा का कहना था, "समय तो निकालने से निकल ही जाएगा। चलो प्रोग्राम बनाते हैं। हम  अपने-अपने परिवारों के साथ चलते हैं।"

 दस-पन्द्रह दिन बीतते बीतते शिखा ने प्रोग्राम बना ही लिया। उसने जो समय बताया उससे ऋचा भी सहमत हो गई। बच्चों की उसे समय छुट्टियां भी पड़ रही थी। आखिर अमृतसर जाने का प्रोग्राम बन ही गया। 

तय हुआ कि हम शताब्दी में अमृतसर जाएंगे। होटल की बुकिंग पहले ही कर ली थी। एक कमरा शिखा ने अपने लिए बुक कराया और दो कमरे हमारे लिए बुक करा दिए। सब प्रोग्राम निश्चित होने पर हमने जाने की तैयारी शुरू कर दी। 

एक दिन पहले सभी सामान पैक कर लिया। अब मैं बहुत उत्साहित थी कि वह जो मैंने सोचा था अब वह होने जा रहा है। भोर में ही उठकर हम सब स्टेशन जाने के लिए के लिए टैक्सी में बैठे। बिल्कुल ठीक समय पर टैक्सी ने हमें रेलवे स्टेशन पहुंचा दिया। दस मिनट के बाद शताब्दी एक्सप्रेस धीरे-धीरे स्टेशन पर आती दिखाई दी।

 डिब्बे के अंदर चढ़ते ही देखा तो शिखा हमारे स्वागत के लिए खड़ी थी। उसने पतली सी शॉल ओढ़ रखी थी। रेलगाड़ी का डिब्बा वातानुकूलित होने के कारण उसमें में अच्छी खासी ठंडक थी। उसने अपने पति और बच्चों से हमारा परिचय कराया। उसके बाद हम अपने अपने स्थान पर बैठ गए। 

शिखा के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा नवीं कक्षा का छात्र है और छोटा बेटा प्रथम कक्षा में पड़ता है। अपने-अपने स्थान पर बैठने के बाद शिखा और ऋचा तो एक ही सीट पर आ बैठीं और गपशप करने लगीं। शिखा का बेटा एक ड्राइंग की बुक पर पेंसिल से बहुत सुंदर ड्राइंग बना रहा था। मैं भी अपनी सीट पर बैठकर बाहर खिड़की से बाहर दृश्य देखने लगी। मुझे रेलगाड़ी में बैठकर खिड़की से बाहर देखने में बहुत आनंद आता है। बाहर खेत और विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां मेरे दिल को बहुत आकर्षित करती हैं। रेलगाड़ी चलते-चलते कब मुझे झपकी आ गई; मुझे पता ही नहीं चला।

 अचानक नींद खुली तो देखा कि चाय और नाश्ता दिया जा रहा है। मैंने भी चाय के साथ बिस्कुट का आनंद लिया। उधर देखा तो शिखा का बेटा बड़ी सुंदर कलाकृति बना रहा था। ध्यान से देखा तो पता चला वह हिटलर का चित्र बना रहा है। मैं बहुत प्रभावित हुई। छोटा सा बच्चा और इतना सुंदर चित्र! वह बहुत ही सजीव चित्र लग रहा था। शिखा ने मुझे बताया कि यह पेंसिल से चित्र बनाने में बहुत रुचि लेता है और तरह-तरह के चित्र बनाता रहता है।

शिखा आकर मेरे पास बैठ गई और मुझसे बातें करने लगी। उसे पिछली बातें बहुत याद आ रही थी। उसने कहा, "आंटी आपके हाथ के परांठे तो मुझे भूलते नहीं है। मैं कभी आऊंगी आपके पास परांठे खाने के लिए।"

 उसने शिकायत भी की कि आपको कभी मेरी याद नहीं आई।  कभी आप मेरे घर भी नहीं आई हो। मैंने कहा, "जरूर आऊंगी ऋचा के साथ मैं सोनीपत अवश्य आऊंगी।"

 उसके पति भी बड़े सरल स्वभाव के लग रहे थे। थोड़ी देर में ही रेलगाड़ी में लंच दिया गया। बहुत अच्छा खाना था। आलू के परांठे मैंने दही के साथ खाए। मज़ा आ गया। यद्यपि घर जैसे परांठे तो नहीं थे; परंतु फिर भी बहुत स्वादिष्ट थे। धीरे-धीरे आखिरकार हमारी रेलगाड़ी अमृतसर पहुंच ही गई।

उत्कल को अमित ने पहले ही फोन कर दिया था। वह कह रह कह रहा था कि तुम सब होटल पहुंचो। मैं भी अपनी कार लेकर वहीं आ रहा हूं। हमारा होटल रेलवे स्टेशन के बिल्कुल पास था। हम थोड़ी देर में ही अपने होटल पहुंच गए। अपने कमरों में सामान आदि रखने के बाद हम फ्रेश हो गए।

तभी अमित अपनी पत्नी के साथ आता हुआ दिखाई दिया। कितने ही दिनों के बाद देखा था अमित को। बिल्कुल ही वैसा का वैसा लग रहा था जैसा मैंने उसे बेंगलुरु में देखा था। उसने आदरपूर्वक मेरे पैर छुए। वह बोला, "आंटी! आप कमजोर हो गई हो।" 

मैंने कहा, "बेटा! यह उम्र का तकाजा है। यह सब तो चलता ही रहेगा। अपनी पत्नी से तो परिचय करवाओ।"

 अपनी पत्नी को मिलवाते हुए उसने कहा, "मेरी वाइफ है डिंपी और यह मेरा बेटा है।"

 उन दोनों ने भी मेरे पैर छुए और प्यार से गले भी मिले। उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी लग रही थी। उसका बेटा आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था। शिखा, उसके पति, ऋचा और  उत्कल भी बहुत दिनों बाद अमित से मिले थे। बेंगलुरु में अमित, शिखा की बहुत खिंचाई किया करता था। यहां भी वह शुरू हो गया। शिखा भी उसकी बातों से चिढ़ती नहीं, बल्कि मज़े लेती है।

 ऋचा ने हंसते हुए कहा, "तेरी पुरानी आदतें गई नहीं!"

अमित हंस पड़ा। फिर वह बोला, "तुम सब रेडी हो जाओ। मेरे घर चलना है।"

 लेकिन ऋचा ने कहा कि हमें तो बड़ी जोर की भूख लगी हुई है।

 "कोई बात नहीं।" अमित बोला, "मैं तुम्हें बहुत बढ़िया ढाबे में खाना खिलाऊंगा। चलो! मेरी कार और वाइफ की कार बाहर ही खड़ी हैं।"

वह हमें एक ढाबे में ले गया। मैंने ढाबे का नाम देखा, 'केसर दा ढाबा'। मुझे याद आ गया कि एक बार मैंने इस ढाबे का प्रोग्राम टेलीविजन में देखा था। इसमें विनोद दुआ ने वहां के खाने की बहुत तारीफ की थी। मैं अमित से कहा, "यह तो बड़ा मशहूर ढाबा है।"

 अमित ने कहा, "हां आंटी! एक बार विनोद दुआ ने भी यहां खाना खाया था।" 

मैंने कहा, "हां! वही मुझे भी याद आ गया। उसका प्रोग्राम 'ज़ायका इंडिया का'। जिसमें वह कहता था हम अपने लिए नहीं देश के लिए खाते हैं।"

  अमित बोला, "हां आंटी! इस ढाबे के बारे में मशहूर है कि इसकी वही दाल तब से चलती आ रही है जब से ढाबा शुरू हुआ था।"

 मैंने कहा, "मुझे भी वह प्रोग्राम याद आ गया।"

 अमित बोला, "चलो आंटी! आपको यहां की वही दाल खिलाते हैं।"

 हम अंदर गए, तो वहां बड़ी अच्छी व्यवस्था थी। यद्यपि वहां और बहुत से लोग थे लेकिन फिर भी हमारे लिए एक टेबल खाली मिल ही गई। हम सब मेज के चारों तरफ बैठ गए और अपनी पसंद मिलकर व्यंजन मंगवाने प्रारंभ किया। अब जब मेज पर खाना आया तो वह इतना स्वादिष्ट था कि रुका ही नहीं जा रहा था। सभी चटपट खाने के मजे लेने लगे। एक के बाद एक व्यंजन आते गए और सभी व्यंजनों पर हाथ साफ करते गए। 

सबसे आखिर में अमित ने कहा, "अब मीठे में क्या खाना है?"

 सब ने अपनी अपनी पसंद बताई। बच्चों को तो आइसक्रीम ही अच्छी लगती है। अमित ने कहा कि यहां की फिरनी भी बहुत मशहूर है। मुझे याद आ गया। मैंने कभी बचपन में फिरनी खाई थी। मैंने कहा, "भई मुझे तो फिरनी ही खिलाओ।"

 अमित ने फिरनी मंगवाई। छोटे से मिट्टी के सकोरे में फिरनी जमी हुई थी; जिसके ऊपर चांदी का वर्क भी लगा हुआ था। लकड़ी की चम्मच से जब पहले स्कूप मुंह में डाला तो वह मुंह में जाते ही पिघल गया। कितना अनुपम अनुभव था! बहुत ही स्वादिष्ट खिरनी थी। मैंने तो अमित से कहा कि मेरे लिए एक खिरनी का सकोरा और मंगवाओ।

 हम मन भर कर खा पी चुके तो अमित ने कहा चलो अब होटल के बाहर एक ग्रुप फोटोशूट हो जाए। "केसर दा ढाबा" पर हम सभी ने एक फोटो शूट करवाया। एक क्या; कई फोटो ली गई। आखिर, रोज-रोज तो मिलना होता नहीं! अब ये फोटो ही हमारी स्मृतियों में रहने वाली थीं।

 "अब सीधा मेरे घर ही चलना है। चाय वही जाकर ही पियेंगे।" अमित ने अनुग्रह किया। हम सब भी तैयार हो गए। क्योंकि सभी बच्चे अमित की मम्मी से भी मिलना चाहते थे और उसका घर भी देखना चाहते थे। अमित की मम्मी भी इन बच्चों के पास बेंगलुरु में आई थीं। उन्होंने भी बच्चों को बहुत स्वादिष्ट खाने बनाकर खिलाए थे। उनके साथ अमित की चाची भी बेंगलुरु में आई थीं।तो बच्चों का मन था कि उन सभी से मिलें।

 अमित के घर पहुंचने पर उसकी मम्मी और चाची ने हमारा बहुत स्वागत किया।  वह मुझे गले मिली। सभी बच्चों को उन्होंने बहुत प्यार किया वे हमें घर के अंदर ले गई अमित का घर बहुत सुंदर बना हुआ था। वह हमें ड्राइंग रूम में ले गए। बहुत शालीनता के साथ ड्राइंग रूम की साज सज्जा की गई थी। वहां सब आराम से बैठ गए और गपशप करने लगे। तभी अमित की पत्नी डिंपी सबके लिए चाय और नाश्ता ले आई।

 अमित की पत्नी भी बहुत हंसमुख है। वह एक विद्यालय में अध्यापिका है लेकिन उस दिन उसने हमारे लिए छुट्टी ली हुई थी। अमित के पिता की और चाचा की बैंक में अधिकारी पद पर कार्यरत थे। पर अब वे रिटायर हो चुके थे। अमित के पिताजी बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे। और गाते थे। शायद अमित उनसे ही गाना सीखा होगा। हमने अमित के पिता से अनुरोध किया कि वह हारमोनियम पर कुछ सुनाएं। अमित के पिता ने बहुत अच्छा एक भजन हारमोनियम पर सुनाया।

अमित को याद आया कि रुद्रांश भी तो हारमोनियम अच्छा बजाता है। उसने रुद्रांश को हारमोनियम पर कुछ बजाने के लिए कहा।  रुद्रांश ने हारमोनियम पर एक बहुत अच्छा भजन सुनाया। उसे सुनकर अमित सबसे ज्यादा खुश हुआ। उसने कहा, "भाई! मैं तो सिर्फ गाता ही हूं। तुम तो हारमोनियम भी बजाते हो। वाह भई वाह! मजा आ गया!" 

 अमित का गाना सुनने के लिए तो हम सब बेचैन थे ही। अमित भी पूरी तरह तैयार था। उसने  karaoke लगाकर मोहम्मद रफी का एक बेहतरीन गाना हमें सुनाया; 'एहसान तेरा होगा मुझ पर........।' 

वाह! क्या समां बंध गया था! हम सब मंत्र मुग्ध होकर उसका गाना सुनते रहे। उसके बाद उसकी मां ने भी एक बहुत अच्छा गाना सुनाया। वे भी बहुत ही अच्छा गाती है।अमित की चाची ने भी एक सुंदर गीत सुनाया। यानि उनके यहां सबके सब गाने के शौकीन हैं। अमित के बेटा की अगले दिन परीक्षा थी। वह ऊपर पढ़ने के लिए चला गया था। लेकिन डिंपी उसे बुला लाई और उसने भी एक बहुत खूबसूरत गाना सुनाया। बहुत मज़ा आया। वहां पर तो गाने बजाने की महफिल ही लग गई थी। उसके बाद अमित ने सभी को अपना पूरा घर अंदर से दिखाया।

जलपान के  बाद अमित की मां ने पूछा, "आप आपका यहां पर क्या-क्या प्रोग्राम है? 

मैंने कहा, "एक तो मैं अमृतसर में अमित से मिलने आई थी। और दूसरा मुझे स्वर्ण मंदिर देखना है।" 

उन्होंने बताया कि स्वर्ण मंदिर  में अंदर दर्शन करने तो बहुत मुश्किल होते हैं।

 मैंने कहा, "कोई बात नहीं। बाहर की परिक्रमा ही कर लेंगे।" उन्होंने कहा, "यह ठीक रहेगा। तभी अमित का बेटा बोल उठा, "हमने तो अभी तक दर्शन नहीं किया जबकि हम तो यहीं रहते हैं। वहां दर्शन करने बहुत मुश्किल है।"

 मैं हंस पड़ी। मैंने कहा, "ठीक है। हम तो बाहर से ही परिक्रमा करके आ जाएंगे।"

 अमित ने बताया, "यहां पर शाम को बाघा बॉर्डर पर बहुत अच्छा प्रोग्राम होता है। वह तो आपको जरुर देखना चाहिए। बुकिंग में कुछ दिक्कत जरूर होती है; लेकिन वह मैं अरेंज करवा दूंगा।"

  हम वहां पर जलियांवाला बाग भी देखना चाहते थे। अमित ने की मां ने भी सहमति जताई। वे बोलीं,  "हां! यह सब दर्शनीय स्थल तो आपको देखने ही चाहिए। उसके बाद उन्होंने बड़े प्यार से सबको विदा किया। अमित की पत्नी डिंपी ने शिखा और ऋचा को बहुत सुंदर फुलकारी वाले दुपट्टे भी भेंट किए। फुलकारी पंजाब की मशहूर कढ़ाई की एक शैली है। ऋचा तो डिंपी को अपना गिफ्ट पहले ही दे चुकी थी। 

हम होटल वापस आ गए। हमने प्रोग्राम बनाया कि हम सवेरे सवेरे ही स्वर्ण मंदिर के दर्शन के लिए चल देंगे। शायद हमें दर्शन हो ही जाएं।  शिखा इस बात के लिए तैयार नहीं थी। वह कह रही थी कि वह सवेरे सवेरे नहीं उठ पाएगी। वह देर रात को स्वर्ण मंदिर के दर्शन करने के लिए गई।

इसीलिए केवल हम चारों का ही सवेरे जाने का प्रोग्राम बना। हम सुबह 3:00 बजे ही उठ गए।  जल्दी नहा धोकर हम स्वर्ण मंदिर की ओर गए।  वहां पहले ही बहुत लोग आ चुके थे। हम भी लाइन में लग गए। लाइन बहुत धीरे-धीरे आगे खिसक रही थी। हमें उम्मीद थी कि हम दर्शन कर पाएंगे। शायद 1 घंटे के बाद या 2 घंटे के बाद नंबर आ ही जाएगा। धीरे-धीरे हम भी खिसकते खिसकते आगे बढ़ने लगे। 

लेकिन मंदिर के पास आते-आते तक एक और साइडलाइन से लोग अंदर आने लगे। वे हमारी लाइन में नहीं थे। लेकिन अलग ही कोई रास्ता था। जिससे कि वह अंदर चलते जा रहे थे। हमारी लाइन तो आगे खिसकनी ही बंद हो गई ऐसा लगा कि हम तो शायद खड़े ही रहेंगे । लाइन बिल्कुल रुक सी गई थी। थोड़ी देर के बाद रुद्रांश के पेट में दर्द होने लगा। अब हम परेशान हो गए। हम बीच में से ही लाइन से निकलकर बाहर की तरफ आ गए और सरोवर के पास जाकर बैठ गए। हमें लगा कि अंदर जाकर दर्शन करना तो बहुत मुश्किल है। इसीलिए बाहर से ही हमने गुरुद्वारे के दर्शन किए।

 बहुत सुंदर गुरुद्वारा था और उसकी ऊपर का गुम्बद सोने से मढा हुआ था। वह सूरज की रोशनी में जगमगा रहा था। पास ही सरोवर था। सरोवर में स्वर्ण मंदिर के शिखर का प्रतिबिंब बहुत ही दिव्य प्रतीत हो रहा था। शब्द कीर्तन तो लगातार चल ही रहे थे। हम थोड़ी देर उसी भक्तिमय वातावरण का आनंद लेते हुए वहीं बैठे रहे। फिर मैंने ऋचा से कहा कि यहां का प्रसाद तो लेना ही चाहिए। 

ऋचा ने कहा, "अभी उत्कल और रुद्रांश कड़ा प्रसाद ले आएंगे।

 वे दोनों प्रसाद लाने गए। लेकिन तभी एक महिला और उसकी बेटी हमारे पास आए। उन्होंने अपने हाथ से हमें गुरुद्वारे का प्रसाद दिया। उन्होंने कहा कि हमने प्रसाद ज्यादा ले लिया था। उसमें से थोड़ा आप भी ले लो।

 मुझे बहुत खुशी हुई कि प्रसाद मुझे अपने आप ही मिल गया। हमने थोड़ा प्रसाद खाया और थोड़ा शिखा उसके पति और बच्चों के लिए रख दिया। वहां लंगर की भी बहुत सुंदर व्यवस्था थी। लेकिन भीड़ बहुत थी और हमारे पास समय अधिक नहीं था। इसीलिए हमने सोचा कि होटल में जाकर ही नाश्ता कर लेंगे।

 हम जब होटल वापस आए तो ब्रेकफास्ट का समय हो चुका था। शिखा उसके पति और बच्चे वहां पहले ही बैठे हुए थे। होटल में बफे सिस्टम था। बहुत सा ब्रेकफास्ट का सामान रखा था। नॉर्थ इंडियन, साउथ इंडियन, पंजाबी छोले भटूरे आदि सब व्यंजन थे। हमने मन भर के ब्रेकफास्ट किया। उसके बाद मैं देखने गई कि कौन-कौन से पेय पदार्थ वहां उपलब्ध हैं।

वहां ठंडे पेय पदार्थ भी थे और गर्म भी। मुझे नाश्ते में ठंडे पेय पदार्थ ज्यादा पसंद नहीं हैं। मैं एक प्याला चाय लेकर वापस आ रही थी। इधर शिखा का छोटा बेटा गोल-गोल घूम रहा था। मेरी नजर सीधी अपने प्याले पर थी। मैंने उसे देखा ही नहीं और वह मुझे टकरा गया। यह तो अच्छा हुआ कि बच्चे पर चाय नहीं गिरी। चाय मेरी साड़ी पर गिरी। इसके बाद में अपने रूम में साड़ी बदलने के लिए चली गई। ऋचा ने चाय कमरे में ही भिजवा दी। उसके बाद हमने थोड़ा आराम किया।

 तभी अमित का फोन आया कि वह हमारे होटल पर आ रहा है। वह  एक और मशहूर ढाबे का खाना खिलाना चाहता था। हमने उसे मना भी किया।  हम होटल में खा लेंगे पर वह बहुत जोर दे रहा था। थोड़ी देर बाद उसकी पत्नी और अमित कार लेकर आ गए। 

अब वह जिस होटल में ले गया था वह भी बहुत शानदार होटल था। बहुत मजेदार खाना था। खाना खाने के बाद उसने कहा कि अब तुम लोग रेडी हो जाओ। हम वाघा बॉर्डर देखने जाएंगे। वह होटल में हमारे साथ आया। मैंने तो बाघा बॉर्डर जाने से मना कर दिया क्योंकि मुझे थोड़ी थकान महसूस हो रही थी। ये सभी वाघा बॉर्डर चले गए। मैंने कमरे में ही आराम किया।

 वाघा बॉर्डर का कार्यक्रम देखने के बाद जब सभी वापिस आए तो मेरा रात का सोने का टाइम हो गया था। मैं तो सो गई लेकिन इन सब ने एक कमरे में बैठकर पूरी महफिल जमाई। गाने गाए खाने खाए और मजे किए। अमित ने भी उन सबको एक बहुत सुंदर गीत सुनाया; चिट्ठीए चिट्ठीए चिट्ठीए.......। उस गाने को रिकॉर्ड भी गया किया गया। मैंने भीअगले दिन वह रिकॉर्डिड गाना सुना। अमित की तो आवाज में ही जादू है। उसका गाना सुनते समय कोई भी स्वयं को भूल जाता है; और उसके गाने में ही खो सा जाता है। 

बच्चों ने भी रातभर महफिल का पूरा लुत्फ उठाया और मनपसंद खाने मंगवाए और खाए। उसके बाद ये लोग बड़ी देर से सोए। अगले दिन हमें जलियांवाला बाग देखने के लिए जाना था। अमित की पत्नी को छुट्टी नहीं मिली थी। उसे स्कूल जाना था। इसीलिए अमित और उसकी पत्नी अगले दिन नहीं आए। 

अगले दिन सुबह ही नाश्ते के बाद हम जलियांवाला बाग देखने के लिए निकल गए। जलियांवाला बाग देख कर मन सिहर उठता है। वहां अभी भी गोलियों के निशान हैं। उसे देखकर लगता है कि उस समय लोगों की कितनी दुर्दशा हुई होगी! किस प्रकार बेरहमी से उन्हें सभी दरवाजे बंद करके अंदर ही अंदर  गोलियों से भून दिया गया था। वहां एक बड़ा कुआं भी था। जिसके अंदर लोग बचने के लिए जा गिरे थे। हर देशवासी को जलियांवाला बाग तो देखना ही चाहिए। उसे देखकर पता चलता है कि हमारी आजादी के लिए आम लोगों ने भी कितनी मुश्किलें उठाईं। 

इसके बाद हम म्यूजियम देखने गए लेकिन म्यूजियम तो उस दिन बंद था। इसीलिए हम म्यूजियम नहीं देख पाए। वहीं बैठकर हमने आइसक्रीम का मजा लिया और इधर-उधर शॉपिंग करने के लिए चले गए। बाजार में हमने सामान तो कुछ ज्यादा नहीं खरीदा लेकिन इधर-उधर घूमते घूमाते शाम हो चली थी। इसलिए हम वापिस होटल में आ गए और वहीं हमने रात को डिनर किया। खाना बहुत स्वादिष्ट था। अमृतसर के छोले भटूरे बहुत मशहूर हैं।  मैंने तो मन भर कर छोले भटूर खाए। 

हमारी ट्रेन सुबह जल्दी ही दिल्ली के लिए रवाना होनी थी। इसीलिए हम रात को जल्दी ही सो गए। सवेरे उठकर होटल में ही ब्रेकफास्ट किया और जल्दी यह स्टेशन की ओर चल दिए। वहां पर हमारी शताब्दी एक्सप्रेस पहले से ही खड़ी हुई थी। हम ट्रेन में चढ़कर बैठ गए दस मिनट बाद रेल गाड़ी चलना शुरू हुई। धीरे-धीरे गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी। अब हम वापिस दिल्ली की ओर जा रहे थे। थकावट भी थी और रात की नींद भी पूरी नहीं हुई थी। बड़ी जोरों से झपकियां आ रही थीं। 

अभी एक छोटी सी झपकी ली ही थी कि ट्रेन में सवेरे का ब्रेकफास्ट आ गया। ब्रेकफास्ट खत्म हुआ तो शिखा का बड़ा बेटा मेरे पास आकर बैठ गया। उससे बातें करके मुझे बहुत अच्छा लगा। वह बडा ही समझदार और प्रतिभाशाली बच्चा है। थोड़ी देर बाद जब बह गया तो मुझे नींद आ गई और मैं सो गई। जब आंख खुली तो खिड़की से बाहर धान के खेत नजर आ रहे थे। धान पकने को तैयार थी। उसका रंग सुनहरी भूरा हो चला था।

रेलगाड़ी में दोपहर का लंच खाने के बाद मेरे पास शिखा आकर बैठ गई थी। दिल्ली पहुंचने का समय होने वाला था। गाड़ी धीरे-धीरे चलती जा रही थी। शिखा काफी अनुग्रह कर रही थी कि मैं उसके घर अवश्य ही आऊं। मैंने भी उसे अपने घर आने का निमंत्रण दिया। दिल्ली के स्टेशन पर उतरते ही शिखा की कार और ड्राइवर तो पहले ही तैयार खड़े थे। उसके ससुर ने सोनीपत से ही उनके लिए कर भिजवा दी थी। हमने भी बाहर निकल कर टैक्सी ली और घर आ गए। भूख नहीं थी; लेकिन थकान थी।चटपट चाय बनाकर पीयी गई। फिर हम ने बिस्तर में आराम किया।

अमित ने जो गाने गाए, उसकी हमने वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली थी। बार-बार सुनने का मन कर रहा था। स्वर्ण मंदिर की छटा भी हमने फोन के कमरे में कैद कर ली थी। वास्तव में बहुत ही सुंदर और अद्भुत है स्वर्ण मंदिर; और उसका परिसर! अकस्मात् किसी ने आकर स्वर्ण मंदिर का जो प्रसाद हमें अमृत सरोवर के पास दिया था; वह वास्तव में अमृत तुल्य स्वादिष्ट था। अमृतसर का पूरा अनुभव मन को भा गया। हो भी क्यों न? आखिर अमृतसर की ये सभी सुखद स्मृतियां मेरे लिए बहुमूल्य सौगातें हैं!

Wednesday, October 15, 2025

कितने कदम?

 ऐसा माना जाता है कि यदि 8000 या 10000 कदम प्रतिदिन चला जाए तो स्वास्थ्य ठीक रहता है। लेकिन यह बात पूरी तरह ठीक नहीं है। दिन में यदि एक बार इतने सारे कदम चलकर, बाकी दिन यदि हम एक जगह ही बैठे रहें तो स्वास्थ्य शायद इतना अच्छा नहीं रह सकता।

 लेकिन यदि हम हर घंटे लगभग 250 कदम चलने का उद्देश्य रखें, तो इससे हमारे स्वास्थ्य पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसीलिए हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि हम हर घंटे, लगभग 250 कदम चलें। फिर चाहे इकट्ठे 8000 या 10000 कदम न भी चले, तब भी हमारा स्वास्थ्य ठीक रह सकता है।