जलपाईगुड़ी से निकलती हुई तीस्ता नदी अपने पूरे उफान पर थी। सचिन अपनी नाव को खूंटे के सहारे रस्सी से बांध रहा था। तभी उसकी नज़र नदी में से निकलती हुई छोटी सी सूंड पर जा पड़ी ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह किसी नन्हे हाथी की सूंड हो। उसे उत्सुकता हुई कि यह क्या है?
वह नाव खोलकर तुरंत उस सूंड की ओर बढ़ चला। वहां जाकर उसने देखा कि हाथी का नवजात शिशु तैरने की कोशिश करता हुआ सूंड ऊपर करके सांस लेने का प्रयत्न कर रहा है। सचिन ने तनिक भी देर न लगाई और अपने साथी को भी वही बुला लिया। दोनों मित्रों ने मिलकर नन्हे हाथी को अपनी नावों पर रखा। जैसे तैसे उसे वे किनारे पर ले आए।
वह इतना नन्हा था कि लग रह रहा था कि एक या दो दिन पहले ही उसका जन्म हुआ है। एक बार तो उन्हें समझ नहीं आया कि वे करें क्या? फिर सचिन ने अपने मित्र को कहा कि हमें वन विभाग के अधिकारियों को सूचित करना चाहिए। वे ही इस बच्चे की जान बचा सकते हैं। वन अधिकारियों को फोन किया गया। दस-पन्द्रह मिनट बाद ही वन अधिकारी वहां पहुंच गए।
वन अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पिछले दिन ही पांच हाथियों का झुंड यहां से होता हुआ गुजारा है। उसके कुछ देर बाद नदी का उफान भी यहां तक आ पहुंचा। उसी समय यह बच्चा उस हाथी के झुंड से बिछुड़ गया होगा। शायद यह उन्हीं हाथियों का ही बच्चा होगा।
उन अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर इस बच्चे को जल्दी ही उसे झुंड में नहीं छोड़ा गया तो वे इस बच्चे को लावारिस ही छोड़ देंगे। वे इसे अपने झुंड में शामिल नहीं करेंगे। वास्तव में अगर हाथी का नन्हा बच्चा इंसानों के साथ अधिक समय तक रह जाए तो हाथियों का झुंड उसे स्वीकार नहीं करता। इसीलिए बच्चे को हाथियों तक पहुंचाने में शीघ्रता करनी चाहिए।
सचिन और उसके मित्र ने वन अधिकारियों के साथ मिलकर उस झुंड को ढूंढने का प्रयत्न किया। सबसे अच्छी बात यह थी कि वह झुंड अभी बहुत दूर नहीं गया था। आधे घंटे बाद ही उन्होंने देखा कि हाथियों का झुंड वृक्षों के नीचे खड़ा था। उन्हें लगा कि इसी झुंड में इस बच्चे की मां भी अवश्य होगी।
उन्होंने उस बच्चे को झुंड से थोड़ी दूरी पर रख दिया। उन सभी को आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि बच्चे की मां ने उसे पहचान लिया और वह उसके पास आ गई। बच्चे ने अपनी मां का दूध भी पीना प्रारंभ कर दिया और वह भी वहीं खड़ी उसे दूध पिलाती रही। वन अधिकारी, सचिन और उसके मित्र दूर खड़े यह सब देखते रहे। थोड़ी देर बाद वे सभी वहां से वापिस आ गए।
वन अधिकारियों ने सचिन का बहुत-बहुत धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि सचिन ने यह बहुत ही अच्छा काम किया है। शायद यह बच्चा जीवित न रह पाता अगर सचिन ने उसकी सहायता न की होती। सचिन ने कहा, "मुझे तो बहुत प्रसन्नता है कि मैं नन्हे हाथी को उसकी मां से मिलवा पाया। मुझे तो आपका धन्यवाद करना है कि आपने मेरा साथ दिया।"
वन अधिकारियों से हाथ मिलाकर सचिन अपने दोस्त के साथ वापिस आ गया। वह सोच रहा था कि काश वह उस नन्हे हाथी के बच्चे को पाल पाता तो कितना मज़ा आता!
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