सुबह उठी, तो बहुत थकावट महसूस हो रही थी। लग रहा था कि समय कम है; और काम अनेक! अक्सर एक दिन में एक काम निपटाया जाए; उसी में ही सारा दिन व्यतीत हो जाता है। शरीर की ऊर्जा की भी एक सीमा निश्चित होती है। उससे ज्यादा काम करने पर शरीर प्रतिरोध करता है।
बात यह थी कि मुझे वार्षिक जन्म प्रमाण पत्र बैंक में देना था। वह भी एक बैंक में नहीं, बल्कि दो बैंकों में। दोनों बैंक काफी दूरी पर हैं। यद्यपि बैंकों में पैदल ही जाया जा सकता है; पर मुझे लग रहा कि थकान बहुत अधिक हो जाएगी। मैंने निर्णय किया कि आवश्यक दस्तावेज लेकर, मैं एक बैंक का काम निपटाकर घर वापस आ जाऊंगी।
घर से निकली, तो थके-थके से कदम लग रहे थे। मंदी-मंदी धूप थी और हल्की-हल्की ठंड भी। चलना अच्छा तो लग रह रहा था; लेकिन यही महसूस हो रहा था कि एक बैंक का काम ही निपट पाएगा। उसके बाद में घर आ जाऊंगी।
जैसे-जैसे बैंक की ओर गई थकान का अनुभव कम होने लगा। रास्ते में एक विद्यालय पड़ता है। वहां एक युवा लड़की ने मुझे रोक लिया। उसने पूछा, "क्या आप बीमा करना चाहती हैं?"
मैंने कहा, "अभी मैं बता नहीं सकती। पहले बच्चों से बात करूंगी। तब तुम्हें बता सकती हूं।"
उसने मुझे अपना कार्ड दे दिया और अनुग्रह किया कि मैं उससे ही बीमा कराऊं। मैंने मुस्कुराकर उससे कार्ड ले लिया। अब मैं आगे बढ़ी। मैंने सोचा यह कितना प्रयत्न कर रही है कि इसे कोई ग्राहक मिल जाए और इसका काम आगे बढ़े। प्रयत्नशील तो होना ही चाहिए।
यही सोचती सोचती आगे चलती गई। आगे चलते-चलते रास्ते में कुछ बुजुर्ग व्यक्ति मिले। जो काफी बड़ी उम्र के लग रहे थे। बहुत संभ्रांत परिवार के लग रहे थे। वे कार में भी जा सकते थे। लेकिन वे पैदल ही जा रहे थे। मैंने सोचा यह जब ये बुजुर्ग बड़े मजे में हंसते हुए, बातें करते हुए अपने काम के लिए चलकर जा रहे हैं; तो मैं पैदल क्यों नहीं चल सकती? वास्तव में शारीरिक शक्ति तो आवश्यक है ही। लेकिन यदि मन में भी शक्ति का संचार हो जाए तो तन की शक्ति द्विगुणित हो जाती है। जब मेरे तन में शक्ति संचरित हुई, तो मैं रास्ते के तरह-तरह के नज़ारे का मज़ा लेते हुए, धीरे-धीरे अपने बैंक तक पहुंच गई।अब तक शरीर की थकावट काफ़ूर हो चुकी थी।
मैंने सोचा यह था कि बैंक में काफी भीड़ भड़क्का होगा। घंटा दो घंटा तो बैठना ही पड़ेगा। तब नंबर आएगा। तभी अपना काम निपटा पाऊंगी। लेकिन मैं हैरान हुई देखकर, कि वह बैंक लगभग खाली था। जहां मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना था वह काउंटर तो बिल्कुल ही खाली था। मुस्कुराते हुए वहां के क्लर्क ने मेरा फॉर्म लिया। उसका नंबर अपने कंप्यूटर में डाला। मेरी फोटो अपने फोन से खींची। तुरंत मेरा जीवन प्रमाण पत्र सर्टिफाई हो गया। वाह! क्या स्पीड थी? मज़ा आ गया!
मैं वहां खड़ी हुई अचंभा कर रही थी; कि कितनी फुर्ती से काम हो गया। तभी मेरे सामने एक महाशय आए। बोले, "आप यहां कैसे?"
मैंने भी उन्हें पहचानने की कोशिश की। मैंने कहा, "अरे आप मिस्टर वोहरा है?"
वे बोले, "हां! हां! मैं वही हूं।"
बात यह थी कि उनकी पत्नी संतोष वोहरा मेरे साथ ही अध्यापिका थी। उन्हें देखे मुझे लगभग पंद्रह वर्ष तो हो ही गए होंगे। आज बड़े दिनों बाद उन्हें देखा तो थोड़ा पहचानने में दिक्कत आई। वे बहुत खुश मिजाज व्यक्ति हैं। परन्तु आज कुछ मायूस से लग रहे थे। मैंने पूछा, "सब ठीक-ठाक तो है न?"
उन्होंने बताया कि उन्हें ब्लड कैंसर हो गया है। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। उनकी उम्र करीब लगभग 77 वर्ष की होगी। उनका बेटा और बहू डॉक्टर हैं। उनका इलाज बहुत कामयाब डॉक्टर से चल रहा है। लेकिन फिर भी वह कह रहे थे कि बचने की उम्मीद ज्यादा नहीं है। मैंने उनसे अपनी सहकर्मी संतोष वोहरा के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उसकी पैर की हड्डियों में भी दर्द होता है और कई परेशानी चल रही हैं। यह बात सुनकर मुझे बहुत ही अफसोस हुआ। कहां तो मैं प्रसन्न हो रही थी कि मेरा बैंक का काम चुटकियों में निपट गया था; और कहां मुझे दुःख हो रहा था कि मेरी सहकर्मी और उनके उसके पति इतनी परेशानी में हैं।
खैर! हम वहां बैठ गए। हमने थोड़ी देर बातें की। वे कह रहे थे कि हमारी शादी की पचासवीं सालगिरह है। हमारे पचास साल लड़ाई झगड़े में ही बीते। मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा, "आप बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं। आप तो संतोष को बहुत प्यार करते हैं। उसके गले में हाथ डालकर, आप कहते थे: "मेरी तोशी! मेरी तोशी! मुझे सब याद है।"
वे भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, "आप घर क्यों नहीं आती हो? संतोष आपको बहुत याद करती है। आप घर आओ। मैं पकोड़े बनाकर आपको खिलाऊंगा और साथ में चाय भी पिलाऊंगा।"
मैंने कहा, "हां! मैं जरूर आऊंगी। मुझे संतोष के हाथ के परांठे भी खाने हैं। दिसंबर में तो आप अपनी शादी की पचासवीं वर्षगांठ मना ही रहे हैं। तभी आऊंगी।"
उन्होंने कहा, "नहीं आपको पहले भी आना है। पता नहीं, वर्षगांठ में मना पाऊंगा कि नहीं।"
मैंने सांत्वना देते हुए कहा, "आप ऐसा मत बोलिए। आप कम से कम सौ वर्ष तक जिंदा रहेंगे। आप मेरी सलाह मानिए। एक बार ऋषिकेश में पतंजलि अवश्य हो आइए। आगे भगवान की इच्छा पर छोड़ दीजिए।"
यह बोले, "ठीक है। मैं वहां ज़रूर जाऊंगा।"
उस बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि वर्षों तक हम नहीं मिले। अचानक ही पता चल रहा है कि इनको कितनी बीमारियां हो गई हैं। मिलते-जुलते न रहो तो किसी का पता ही नहीं चलता। मैं सोच रही थी कि ब्लड कैंसर होते हुए भी वे स्वयं बैंक में आए हैं और अपना कार्य करवा रहे हैं। और किसी को अपने साथ लेकर नहीं आए। इनमें तो बहुत दृढ़ इच्छा शक्ति है। इस बात से मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने निर्णय किया कि मैं दूसरे बैंक में भी यहां से पैदल ही जाऊंगी।
चलते-चलते मैं अपने दूसरे बैंक तक भी पहुंचने वाली थी कि रास्ते में भूख लगी। मैंने केले खरीदे। अभी एक केला निकालकर खाने ही वाली थी कि सामने से एक व्यक्ति आ गया उसने कहा, "मैंने आज सवेरे से कुछ नहीं खाया। मैं अपना ठेला लगाने ही वाला था कि मेरे सिलेंडर की गैस खत्म हो गई। लेकिन मुझे भूख बहुत जोर से लगी है और मेरे पास पैसे भी नहीं है। आप कुछ खिला दीजिए।"
मैंने अपने हाथ का केला उसके हाथ में दे दिया। मैं आगे चल दी। मैंने सोच रही थी कि बेचारे को कितनी परेशानी हो रही होगी। परन्तु मैं कर ही क्या सकती थी। मुझे तो दूसरे बैंक भी जाना था। मैंने दूसरे केले को निकाल कर खाया। जिससे कुछ भूख शांत हुई।
तभी चलते-चलते बैंक भी आ गया। मैं अंदर गई। बैंक के अंदर घुसते ही मेरे सामने एक हर्ष मिश्रित विस्मय था। मेरे विद्यालय की एक छात्रा वहां काउंटर पर खड़ी थी। मुझे देखते ही उसने मुझे एकदम पहचान लिया। उसने मेरा अभिवादन किया। मुझे उसकी शक्ल थोड़ी बहुत जानी पहचानी लगी; परन्तु नाम बिल्कुल याद नहीं आया। मैंने कहा, "बेटा! तुम तुम्हारा क्या नाम है?"
उसने कहा, "मैं चंचल हूं। आप मुझे पढ़ाते थे; मुल्तान नगर स्कूल में।"
मैंने कहा, "हां कुछ-कुछ याद तो आया। लेकिन तुम्हारा नाम याद नहीं आ रहा था"
मुझे बड़ी खुशी हुई कि उसकी बैंक में परमानेंट जॉब लग गई थी। उसने पूछा, "मैम! आपके लिए क्या कर सकती हूं?"
मैंने कहा, "मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना है।"
उसने तुरंत मेरे जीवन प्रमाण पत्र के फार्म भरवा कर सबमिट कर दिए। मुझे एक एफडी भी करवानी थी। वह भी काम उसने चटपट कर दिया। मैं तो हैरान ही हो गई कि बैंक में अपनी पढ़ाई हुई छात्रा का कितना अधिक लाभ होता है! उसने पांच मिनट में ही सारा काम निपटा दिया।
एक तो मुझे उससे मिलकर ही बड़ी खुशी हुई थी कि मेरी छात्रा इस बैंक में नौकरी पर लगी हुई है। अब उसने मेरे काम को भी पांच मिनट में ही निपटा डाला तो खुशी द्विगुणित हो गई। मैंने बचे हुए केले उसके बैग में डालते हुए कहा, "बेटा! यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए।"
यह देखकर तो वह बहुत ज्यादा खुश हो गई। उसने कई बार मुझे थैंक यू मैम, थैंक यू मैम, कहा। उसकी प्रसन्नता ने मेरी प्रसन्नता भी बढा दी। उसने यह भी बताया कि उसकी क्लास के अधिकतर बच्चे बहुत बढ़िया जॉब पर लग गए हैं। 10 12 बच्चे तो सरकारी बैंकों में ही हैं। कोई अमेरिका भी चला गया है। कुछ बच्चे दुबई में भी हैं। बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि मेरी पढ़ाई हुई छात्रा की अच्छी जॉब लग गई है। कितनी खुश थी वह! मेरा काम भी उसने गजब की स्फूर्ति से कर दिया। मुझे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि उसकी क्लास के बहुत से बच्चों ने काफी अच्छे मुकाम हासिल कर लिए थे। वास्तव में, सरकारी विद्यालयों में बच्चे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं; उनके लिए ये उपलब्धियां प्राप्त करना सरल नहीं होता।
इस समय मैं दिन की पिछली सब बातें भूल कर प्रसन्नता और गर्व से भर गई। उन बच्चों के बारे में सोचने लगी जो उसकी क्लास में थे। सोचते सोचते आगे बढ़ी तो रास्ते में पतंजलि स्टोर था। मुझे याद आया मुझे हिंग्वाष्टक चूर्ण भी लेना है। पतंजलि स्टोर बेसमेंट में है। मैं नीचे उतरी तो काउंटर वाली लड़की सामने ही खड़ी थी। उसने मुस्कुरा कर मेरा अभिवादन किया और पूछा, "मैम! आप क्या लेना चाहती हैं?" मैंने बताया कि मुझे हिंग्वाष्टक चूर्ण चाहिए, तो फटाफट काउंटर पर चूर्ण ले आई और पेमेंट भी करवा दी। वह यह भी लड़की अपनी आत्मीय बन गई है। मैं गाया बगाया वहां जाती ही रहती हूं। इसीलिए वह मुझे अच्छे से पहचानती थी।
अब मैं बाहर निकली तो मैंने सोचा कि अभी समय बहुत अधिक नहीं हुआ है। क्यों न मधुजी से मिल दिया जाए। वे मेरे साथ ही एक विद्यालय में पढ़ातीं थीं। उनसे मिले भी काफी समय बीत चुका था। फोन पर ही बातचीत होती थी। कुछ दिनों पहले उन्होंने निर्णय लिया था कि वे बड़ा सत्संग करवायेंगी। जिसमें सभी विद्यालय की सहेलियों को बुलाएंगी। इसके लिए उन्होंने मुझे फोन भी किया था। उनका घर रास्ते में ही पड़ता था इसीलिए मैं तुरंत उनके घर पहुंच गई।
वे हैरान हो गईं मुझे देखकर! मैं अकस्मात ही जो उनके घर पहुंच गई थी। आलू बैंगन की सब्जी बनाने के लिए वे अभी बैगन काट ही रही थी। मैंने कहा, "चलो मैं आपके साथ-साथ ही सब्जी भी कटवा देती हूं। साथ साथ बातें भी करते रहेंगे।"
उन्होंने कहा, "नहीं। तू बैठ। सब्जी तो बनती रहेगी। मैं चाय बनाती हूं। तू चाय पी।"
उनकी चाय हमेशा प्यार से भरी हुई होती है। चुस्कियां लेते हुए मैंने नमकीन का आनंद भी उठाया। खूब गपशप हुई। कई पुराने किस्से याद आ गए; कुछ खट्टे कुछ मीठे।
फिर उन्होंने कहा, "तुझे सत्संग में जरूर आना है। सभी सहेलियां मिलेंगी। पहले चाय पकौड़े खाएंगे। फिर खूब सत्संग करेंगे। बाद में जम के खाना खाएंगे। मैंने हलवाई बुला रखा है। जरूर जरूर आना है।" मैंने पक्का वायदा किया कि मैं अवश्य ही आऊंगी।
उनके साथ बीते सभी खट्टे मीठे अनुभव याद करते हुए मैं वापस घर पहुंच रही थी। रास्ते में कबाड़ी वाले की दुकान दिखाई दी। यद्यपि उसकी दुकान में काफी व्यस्तता नज़र आती है। लेकिन आज वह कबाड़ी वाला बिल्कुल खाली बैठा था। मैंने सोचा यह अच्छा मौका है। अखबारों की रद्दी तो इकट्ठी हो ही गई है। अभी निपटा देती हूं।
मैंने उसको कहा, "भैया! जल्दी से मेरे घर रेहडी भेज दो। अखबार की रद्दी देनी है।"
उसने मेरे साथ ही एक रेहडी वाले को भेज दिया। वह रद्दी उठा ले गया और सारी रद्दी बिक गई।
लो, यह काम भी कब से टल रहा था और यह भी आज ही निपट गया। काफी संतुष्टि का अनुभव हुआ। आज मैं कई काम कर पाई थी और मुझे कोई थकावट भी महसूस नहीं हुई।
यकीनन ऐसा कोई दिन कभी-कभी ही आता है; जिसमें इतनी विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों का समावेश एक ही दिन में हो पाता है। इसमें हर्ष, सुख, दुःख, चिंता, गर्व, आश्चर्य, प्रेम, संतुष्टि आदि सभी प्रकार की अनुभूतियाँ शामिल थीं। जीवन की पूर्णता का एहसास कराने वाला, एक अलग ही दिन था यह!
वास्तव में देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन ही विभिन्न प्रकार की सतरंगी अनुभूतियों से परिपूर्ण है। केवल आवश्यकता है, जीवन में उमंग से परिपूर्ण आशावादी दृष्टि अपनाने की। जब हम सजगता से हर पल को निहारते हैं; तो उस पल में घुली हुई प्रत्येक अनुभूति हमें बहुत कुछ प्रदान कर जाती है।
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