Tuesday, May 26, 2026

अद्भुत उपहार

 महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में एक गांव है बहादरपुरा! वहां के लगभग 3465 निवासियों को एक अनोखा तोहफा विवाह के अवसर पर मिला।

 बहादरपुरा गांव में सांपों के काटने से, बिजली के गिरने से और खेतों में कोई दुर्घटना होने से मौत हो जाया करती थी। जिससे कि परिवार बहुत ही दुखी होते थे। उनकी परेशानी को दूर करने के लिए के उनके पास कोई जीवन बीमा योजना भी नहीं थी। ये घटनाएं घटती ही रहती थी और इनका कोई समाधान भी नहीं था। वास्तव में गांव वाले अगर कोई बीमा योजना ले भी लें तो उनकी किश्त कौन भरे? गांव वाले गरीब थे और उनकी अधिक आय भी नहीं थी। 

पेठकर परिवार के विवाह का समय पास आ रहा था। अनूप पेठकर ने कहा, "क्यों न इस विवाह में हम सभी ग्राम वासियों को एक अद्भुत तोहफा दें!" 

परिवार वालों से विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय हुआ कि सभी ग्राम वासियों को दुर्घटना बीमा अगर दे दिया जाए, तो वे कितने सुखी हो सकेंगे। उपहार का उपहार, और ग्रामवासियों के जीवन में जो खुशियां आएंगी सो अलग!

जयमाला, बैंड बाजे और शानदार भोजन के बाद जो कार्यक्रम था; उसकी तो किसी को उम्मीद ही नहीं थी। लगभग 4500 अतिथि इस विवाह में निमंत्रित थे। अतिथियों के सामने ही अनूप पेठकर ने सबको संबोधित किया, "सभी ग्रामवासी भाइयों। आज बेहद प्रसन्नता का अवसर है। इस अवसर पर मैं सबको एक तोहफा देना चाहता हूं। मैंने पूरे गांव का दुर्घटना बीमा करा लिया है। जिसमें दुर्घटना होने पर ₹100000 मिलेगा।"

जब लोगों ने यह सुना तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा वातावरण गूंज उठा। यह दुर्घटना बीमा 33 करोड़ का था। सभी ग्रामवासी ऐसा शानदार विवाह का तोहफा लेकर बहुत प्रसन्न हुए। सरपंच बलिराम पेट करने तो इसे बहुत अद्भुत तोहफा बताया। 

उसने कहा, "यह शायद इस प्रकार का सबसे पहला तोहफा है। ऐसा तोहफा तो कभी हमारे गांव में किसी ने किसी को नहीं दिया। शादी में लोग मिठाइयां बांटते हैं और तरह-तरह के तोहफे भी बांटते हैं।  परन्तु यह तो सबसे अद्भुत तोहफा है। इस परिवार ने तो सबको सुरक्षा का तोहफा दिया है!"

अनूप पेठकर ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "हमें तालियां नहीं चाहिए। हमें तो सबकी दुआएं मिल जाएं, वही बहुत है।"

 गांव वाले विवाह के बाद जब घर जा रहे थे तो उनके पास, एक शानदार विवाह की यादगार के साथ-साथ, भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए मिला, एक विश्वास भी था। यह अद्भुत उपहार पूरे एक वर्ष तक उनका साथ देने वाला था।

Thursday, May 21, 2026

त्वचा की सुंदरता

 त्वचा की सुंदरता कई बातों पर निर्भर करती है। जिसमें सबसे प्रमुख बात है; अनुशासन में रहना। अगर आपका पूरा जीवन अनुशासित है तो आपके शरीर के सब अंगों के साथ आपकी त्वचा भी सुंदर रहेगी। वास्तव में त्वचा को सुंदर रखने के लिए बहुत सी बातें अनिवार्य रूप से करनी होती हैं। कई बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है।

तनाव मुक्त रहना:  त्वचा की सुंदरता बनाए रखने के लिए तनाव मुक्त रहना बहुत आवश्यक है। तनाव मुक्त रहने से हमारे शरीर में अच्छे हारमोंस यानी एंडोर्फिंस बनते हैं जो कि त्वचा को चमकदार और झुर्रियों रहित बनाने में मदद करते हैं। तनाव पूर्ण रहने से हमारे शरीर में कॉर्टिसोल नाम का एक हार्मोन बहुत अधिक मात्रा में बनता है जिससे कि त्वचा के कॉलेजन नष्ट होने शुरू हो जाते हैं। इसीलिए आवश्यक है कि हम प्रसन्न चित्त रहें और कोई तनाव अपने मन मे न आने दें।

पर्याप्त नींद लेना:  त्वचा की सुंदरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम रात को पर्याप्त नींद लें। अगर हम नींद में कमी करते हैं तो हमारा शरीर त्वचा की टूट-फूट की मरम्मत नहीं कर पाता। इससे त्वचा असमय ही ढीली पढ़नी शुरू हो जाती है। उसकी सुंदरता नष्ट हो जाती है। चेहरे पर सूजन और आंखों के पास काले सर्कल भी नींद की कमी से ही आते हैं।

पर्याप्त पानी पीना:  त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए आवश्यक है कि हम दिन भर में खूब पानी पिएं। अगर हम पानी पीने में कमी करते हैं तो उससे हमारे शरीर में टॉक्सिन इकट्ठे हो जाते हैं। शरीर में विषैले पदार्थ न जमा हों; इसके लिए पानी का काफी मात्रा में पीना बहुत आवश्यक है। इससे त्वचा नम रहती है और चमकदार भी रहती है।

कड़ी मेहनत:  अगर कड़ी मेहनत की जाए; तो उससे शरीर में खून का प्रवाह बहुत अच्छे तरीके से बना रहता है। जिससे कि शरीर भी स्वस्थ रहता है और त्वचा भी।  वास्तव में शारीरिक व्यायाम और परिश्रम करने से त्वचा से खूब पसीना निकलता है। इससे शरीर के सारे विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और त्वचा तरो ताजा हो जाती है। व्यायाम से और मेहनत से खून का दौरा बढ़ता है; जिससे कि पूरे शरीर को पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिल जाते हैं और हमारी त्वचा खिली रहती है। इसीलिए आलस को दूर रखकर प्रतिदिन व्यायाम और काम करना चाहिए।

संतुलित भोजन:  भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसमें सारे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में हों। इसके लिए सलाद, कच्ची सब्जियां, सूखे मेवे सभी वस्तुओं का पर्याप्त समावेश होना चाहिए। समय पर खाना चाहिए और बहुत अधिक या बहुत कम नहीं खाना चाहिए। उससे भी शरीर तो स्वस्थ रहता ही है और त्वचा की सुंदरता भी बनी रहती है।

आत्मविश्वास:  अपने ऊपर विश्वास रखकर प्रत्येक कार्य करना और कठिन परिस्थिति में भी मुस्कुराते रहना यह भी त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारक है। वास्तव में परेशानियां और कठिन परिस्थितियां तो जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। लेकिन आत्मविश्वास से इनका सामना करते हुए, अपनी सेहत का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी होता है। इससे हमारी त्वचा भी स्वस्थ बनी रहती है। वास्तव में स्वस्थ त्वचा ही तो सुंदर त्वचा होती है। 



Monday, May 18, 2026

केसर

 केसर एक बहुत सुंदर फूल से प्राप्त होता है। फूलों के मादा भाग के ऊपर के हिस्से यानी 'स्टाइल और स्टिग्मा' को ही सुखाकर केसर के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

एक फूल से तीन केसर के fibre प्राप्त होते हैं। 1 ग्राम केसर को प्राप्त करने के लिए  कम से कम डेढ़ सौ फूलों का प्रयोग किया जाता है। 

  केसर कम कैलोरी वाला और कोलेस्ट्रॉल से रहित होता है। यह फैट फ्री होता है। इसके अंदर ऐसी घटक होते हैं, जो हमारे मस्तिष्क को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुत बढ़िया माने जाते हैं। डिप्रेशन और अल्जाइमर की बीमारी ठीक करने के लिए भी इसके अंदर अद्भुत कंपोनेंट्स पाए जाते हैं।

 अगर इसे वर्ष में एक बार केवल सर्दी में ले लिया जाए तो पूरे साल भर इसका असर रहता है। इसका अगर गर्म वस्तु के साथ सेवन करें तो यह गर्म तासीर का हो जाता है। और अगर इसका ठंडी वस्तु के साथ सेवन किया जाए तो इसकी तासीर ठंडी हो जाती है। अगर इसे गर्म दूध या गर्म पेय के साथ पिया जाए तो यह गर्मी देगा। लेकिन इसे ठंडाई या ठंडे पेय पदार्थ के साथ लिया जाए तो यह ठंडक प्रदान करेगा। अनुपान भेद से यह केसर ठंडा या गर्म हो जाता है।

 केसर के सेवन से नींद की गुणवत्ता बेहतर हो जाती है। अगर किसी को नींद नहीं आती है तो वे केसर का सेवन कर सकते हैं। खाने की बहुत अधिक इच्छा को कम करने के लिए भी केसर बहुत मदद करता है। इसका सेवन करने से भूख ठीक हो जाती है। आंखों की हेल्थ के लिए भी यह बहुत अच्छा है।  महिलाओं के पीएमएस के इलाज के लिए भी यह अद्भुत दवाई है। 

केसर हमारे देश में काफी मात्रा में पैदा होता हैं। इसके अलावा अरब देशों में और अफ्रीका में भी यह इसका उत्पादन होता है। सैफरन के तीन घटक होते हैं : सैफरानल, क्रोसिन और पिक्रो क्रोसिन। केसर के फूल के मादा हिस्से में ही यह तीनों घटक मिलते हैं।

Safranal: यह एक एल्डिहाइड है। यही सैफरन की भीनी महक के लिए जिम्मेदार होता है। इसकी खुशबू इसी घटक की वजह से आती है। यह घटक अनचाही कोशिकाओं की वृद्धि को रोकता है। लेकिन अच्छी कोशिकाओं की वृद्धि के लिए यह बहुत अच्छा है। यह शरीर में सूजन कम करता है। लिवर कैंसर आदि में भी इसके अच्छे प्रभाव देखने को मिले हैं। लिवर की सूजन भी इससे कम होती है।

Crocin नाम का घटक, केसर को केसरिया रंग प्रदान करता है। हृदय रोगियों को भी इससे बहुत लाभ होता है। कैंसर के रोगियों को जो कीमोथेरेपी होती है; उसके बाद उसमें न्यूरोपैथी होने की संभावना रहती है। इसको रोकने में भी केसर के अच्छे प्रभाव देखने को मिलते हैं।

Picrocrocin  नामक घटक के कारण केसर के स्वाद में थोड़ा कड़वापन होता है। यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल को ज्यादा बढ़ने नहीं देता। यह लिपिड का मेटाबॉलिज्म भी ठीक रखता है। यह मूड को अच्छा रखता है; और दिल और दिमाग की अच्छी तंदुरुस्ती के लिए भी बहुत मददगार है। इससे महिलाओं में पीएमएस की समस्या भी ठीक हो सकती है। 

केसर का प्रयोग हमें गर्मियों में ठंडा रखता है और सर्दियों में गर्म रखता है। इसके केवल दो फाइबर प्रतिदिन लेने से ही बहुत लाभ हो जाता है।

  केसर को 'सनशाइन स्पाइस' भी कहते हैं; क्योंकि यह चेहरे को सूरज जैसा चमका देता है।


Monday, May 11, 2026

सजग राही

ज़िदगी का सफ़र करने वाले

अपने मन का दीया तो जला ले 


 रात लंबी है गहरा अंधेरा

 जाने कब हो यहां पर सवेरा

 तू है अनजान मंजिल का राही

 चलते रहना ही है काम तेरा

 रोशनी से डगर जगमगा ले

अपने मन का दीया तो जला ले


लंबी-लंबी ये जीवन की राहें 

चूमना तेरे कदमों को चाहें 

गहन वन में कहीं खो न जाना

भटक जाएं न तेरी निगाहें 

हर कदम सोच कर तू उठा ले 

अपने मन का दीया तो जला ले

उमा महेश की झांकी

झांकी उमा महेश की, आठों पहर किया करूं।

नैनों के पात्र में सुधा, भर भर के मैं पिया करूं।


वाराणसी का वास हो

और न कोई पास हो 

गिरिजापति के नाम का, सुमिरन भजन किया करूं।


 अंबा कहीं श्रमित न हों

 सेवा का भार मुझको दो

 जी भर के तुम पिया करो, घोट के मैं दिया करूं।


 जी में तुम्हारी है लगन

 खींचते हैं उधर व्यसन

 हरदम चलायमान मन, इसका उपाय क्या करूं?


 भिक्षा में नाथ दीजिए

 अपनी शरण में लीजिए

 ऐसा प्रबंध कीजिए, सेवा में मैं रहा करूं।


 तुम तो जगत के नाथ हो

 सब पर दया का हाथ हो

 मैं ही निराश हो प्रभु, द्वार से क्यों फिरा करूं?

Sunday, May 10, 2026

कबाड़ में कनक!

 कुंती का बहुत मन था कि वह भी कुंभ के मेले में जाकर स्नान कर आए। लेकिन उसके पति राम दास को समय ही नहीं मिलता था। वह बिजली का मिस्त्री था और आसपास के सभी लोग उससे ही अपना काम करवाते थे। रामदास इतना कुशल था कि उसके अलावा किसी और से, वे काम करवाना पसंद नहीं करते थे। 

एक दिन कुंती ने अपने मन की बात रामदास के सामने रख दी। रामदास ने कहा, "मन तो मेरा भी बहुत था। लेकिन फुर्सत ही नहीं मिल रही।"

 कुंती के बहुत आग्रह करने पर रामदास ने कहा, "ठीक है। दो-चार दिन का समय निकालकर चलते हैं। बार-बार यह समय थोड़े ही आता है।"

 कुंभ के स्नान पर जाने से पहले उन्होंने सभी तैयारियां कर ली। कुंती के कुछ गहने भी अलमारी में रखे हुए थे। रामदास ने कहा "कहीं ऐसा न हो कि पीछे से कोई चोर घर में घुस आएं और ये गहने चुरा ले जाएं। तुम ऐसा करो कि उन गहनों को कहीं और छिपा दो।"

 कुंती ने कहा, "ऐसी कौन सी जगह हो सकती है जहां इन गहनों को छुपाए और चोरों को पता भी न लगे?"

 रामदास को एक विचार सूझा। उसने अखबारों की रद्दी में गहनों की एक पोटली बनाकर छिपा दी। उसने सोचा कि वापिस आकर, इन गहनों को दोबारा अलमारी में रख देंगे।

अगले दिन वे कुंभ स्नान के लिए चले गए। तीन-चार दिन बाद जब वे वापिस घर लौट कर आए तो अपने कामों में व्यस्त हो गए। उन गहनों की पोटली के बारे में तो वे भूल ही गए।

 दीवाली का समय पास आ रहा था। कुंती और रामदास घर की सफाई में व्यस्त थे। रामदास ने कहा, "घर का व्यर्थ का सामान फेंक देना चाहिए। जो चीज रद्दी में बेची जा सकती है उन्हें मैं कबाड़ में बेच आता हूं।" 

घर का सारा कबाड़ इकट्ठा करके वह रद्दी वाले को बेच आया। उन्हें यह याद ही नहीं रहा कि अखबारों के बीच में उनकी गहनों की पोटली भी रखी है। 

कई महीने बीत गए। एक दिन कुंती को किसी विवाह में सम्मिलित होना था। उसने गहने पहनने के लिए अलमारी खोली और उसमें से गहने निकालने लगी। लेकिन उसमें तो गहने थे ही नहीं। फिर उसे याद आया कि कुंभ जाते समय उन्होंने गहनों की पोटली अखबार की रद्दी में रख दी थी। उसने रामदास को बताया कि गहने तो अखबार की रद्दी के साथ कबाड़ वाले के पास ही चले गए हैं। रामदास तुरंत लपककर कबाड़ वाले के पास दौड़ा। उसने कबाड़ वाले से पूछा, "कहीं मेरे अखबारों की रद्दी में, तुमने मेरे गहनों की पोटली तो नहीं देखी?"

कबाड़ वाले रहमत मियां अपनी दुकान पर कबाड़ तुलवा रहे थे। चश्मे से झांकते हुए उन्होंने रामदास को देखा और पूछा, "कौन से गहने?"

 रामदास ने कहा, "मैंने छः सात महीने पहले आपको अखबारों की रद्दी बेची थी। गलती से उसी में मेरे गहनों की पोटली भी रखी हुई थी। अगर आपको वह गहनों की पोटली मिली हो तो कृपया उसे वापस कर दें। वह मेरे गहनों की पोटली है।"

रामदास को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि इन्हें गहनों की वह पोटली मिली होगी। उसने तो ऐसे ही पूछ लिया था। लेकिन वह हैरान हुआ, जब रहमत मियां बोले, "अच्छा! तो वह पोटली तुम्हारी है।"

 वह सकपका गया और हैरान होकर उसने जवाब दिया, "हां। क्या आपको वह पोटली मिली है? वह मेरी ही है!"

हुआ यह, कि एक दिन, रहमत मियां अपनी कबाड़ की दुकान में मुआयना कर रहे थे कि कौन सा कबाड़ किस तरफ रखना है। अचानक उनकी नजर एक छोटी सी पोटली पर गई। उसके अंदर कुछ रखा हुआ प्रतीत हो रहा था। उन्होंने पोटली खोली तो पाया कि उसमें कुछ गहने थे। उन्होंने सोचा कि शायद कबाड़ में किसी के नकली गहने इस पोटली में आ गए हैं। तभी तो मजदूरों ने भी यह पोटली एक तरफ रख दी है। लेकिन गहनों की तरफ नजर डालते हुए उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद ये गहने नकली नहीं है। ये तो असली सोने के प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा सोचकर उन्होंने वह पोटली अपने कुर्ते की जेब में रख ली।  उन्होंने सोचा कि दुकान बंद करने के बाद वे सुनार के पास जाएंगे और इस पोटली के गहनों की जांच करवा लेंगे।

 दुकान बंद करने के बाद जब वे घर की ओर गए तो रास्ते में एक सुनार की दुकान पर रुक कर उन्होंने उसे गहने दिखाए। और पूछा कि गहने नकली है या असली? 

"ये गहने तो शुद्ध सोने के हैं।" 

"अच्छा तो ये नकली नहीं है?"

 "नहीं। नहीं। असली सोने के गहने हैं!" यह कहते हुए सुनार ने हंसते हुए पूछ ही लिया, "क्या यह भी कबाड़ में बिकने के लिए आए थे?"

 रहमत मियां भी हंसते हुए बोले, "हां। ये कबाड़ के बीच में ही तो मिले हैं। इन्हें संभाल कर रख लूंगा। क्या पता किसी को याद आए और वह अपने गहने मांगने के लिए मेरे पास आए।"

सुनार ने भी कहा, "हां इन्हें संभाल कर रखिएगा यह असली सोना है।"

अब रामदास उन गहनों के बारे में पूछने आया, तो रहमत मियां को वह पोटली याद आ गई। उन्होंने उसे अपने घर में अच्छी तरह संभाल कर रखा हुआ था। 

उन्होंने रामदास को कहा, "तुम बिल्कुल निश्चिंत रहो। वह गहनों की पोटली मेरे पास संभली हुई रखी है।"

 रामदास की तो जान में जान आई। वह हैरान भी था और प्रसन्न भी! वह बार-बार रहमत मियां को धन्यवाद दे रहा था। रहमत मियां तो कह रहे थे, "भाई! मेरा धन्यवाद किस बात का? उस खुदा को धन्यवाद करो। शायद उन्होंने ही मेरी नज़र तुम्हारी गहनों की पोटली पर पड़वा दी और मैंनें तुम्हारे गहने संभाल कर रख लिए।" 

रामदास बहुत शुक्रगुजार था; भगवान का भी, और रहमत मियां का भी! 

आखिर कबाड़ में खोया हुआ कनक जो उसे वापिस मिल गया था!

Thursday, April 9, 2026

मोमो और गहने!

"मेरे सारे गहने कहां चले गए?" सरिता अलमारी के लॉकर को हैरानी से देखते हुए बोल उठी। उसने अपने पति अनिल को बुलाया और लॉकर दिखाते हुए बोली, "मेरे गहने तुमने लिए हैं क्या?"

 "नहीं!" अनिल ने कहा, "मैंने तो कोई गहने नहीं लिए।"

 "तो फिर मेरे गहने कहां चले गए? कहीं मैंने किसी और जगह तो अपने गहने नहीं रख दिए?"

 सरिता ने पूरा घर अच्छी तरह देख लिया। कपड़ों की अलमारी, रसोई घर के सभी शेल्फ, स्टोर हाउस यहां तक की बाथरूम भी लेकिन कहीं पर भी उसके गहने नहीं मिले। अनिल भी बहुत हैरान हुआ।

   "गहने कौन निकाल सकता है? कहीं तुमने ही तो निकाल कर कहीं और नहीं रख दिए गहने? गए तो कहां गए?"

 तभी उनका बेटा संदीप घर वापस आ गया। वह खेलने के लिए बाहर गया हुआ था। सरिता ने संदीप से भी पूछा, "संदीप! मेरे लॉकर में मेरे गहने रखे हुए थे। वह नहीं मिल रहे हैं। क्या तुम्हें उनके बारे में कुछ मालूम है? तुमने घर में कहीं देखे मेरे गहने?"

 संदीप 7-8 वर्ष का एक अबोध बालक था। उसे मोमो खाने का बहुत शौक था। वह रोज ही मोमो खाना चाहता था। लेकिन सरिता उसे रोज मोमो खाने के लिए पैसे नहीं देती थी। वह मोमो की दुकान पर जाता, तो मोमो वाला उसे कभी-कभी मुफ्त में ही मोमो खिला देता था। एक दिन मोमो वाले ने कहा कि तुम्हें अनलिमिटेड लाइफटाइम मोमो मिलेंगे।

 यह सुनकर संदीप बहुत प्रसन्न हो उठा। उसने कहा, "ऐसा कैसे हो सकता है ?"

मोम वाला बड़े प्यार से संदीप से बोला, "बेटा! ऐसा हो सकता है। तुम्हें बस यह करना है कि अपने घर रखे हुए मम्मी के गहने मुझे दे जाओ।"

 संदीप अपने घर आया। उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया। उसने चुपचाप लॉकर से गहने निकाले और मोमो वाले को दे दिए। मोमो वाले ने उसे बहुत सारे मोमो दिए। उसने मन भर कर मोमो खाए और किसी को कुछ भी नहीं बताया। लेकिन अगले दिन जब वह मोमो वाले के पास गया, तो उसने पाया कि वहां मोमो वाला था ही नहीं। फिर वह दो-तीन दिन तक उसके पास जाता रहा। लेकिन मोमो वाला वहां वापस नहीं आया। वह निराश हो गया। लेकिन उसने घर में कुछ भी नहीं बताया।

अब गहनों की तलाश हो रही थी। उसकी मां उसे अपने गहनों के बारे में पूछ रही थी। तब उसे लगा कि उसे गहनों के बारे में सब कुछ सच-सच बता देना चाहिए।  उसने सारी बात अपने माता-पिता को बता दी। अनिल उसके साथ वहां गया, जहां वह रोज मोमो खाता था। वहां पर कोई भी नहीं था। आस-पास पूछने पर पता चला कि वह कई दिन पहले से वहां से गायब है। यह भी पता चला कि वह आसपास की ही किसी झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में रहता है।

 जब अनिल उसके झुग्गी ढूंढते हुए वहां पहुंचा, तो पता चला वह झुग्गी बेचकर कहीं चला गया है। वे दोनों बहुत निराश हुए। पर अब कर ही क्या सकते थे? संदीप बहुत अधिक दुखी हुआ। उसने अपने पिता से कहा कि उसने बहुत गलत काम किया है। आगे से वह ऐसा कभी भी नहीं करेगा। लेकिन अब गहने तो वापिस आ नहीं सकते थे। 

अनिल ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस वाले भी बहुत अधिक हैरान हुए। उन्होंने अनिल को आश्वासन दिया कि वे मोमो वाले को ढूंढने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन वे आश्चर्य चकित थे इस बात पर, कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतनी तुच्छ वस्तु के लालच में आकर, एक अबोध बच्चे ने अपनी मां के सारे गहने, मोमो वाले के हाथ में थमा दिए?


Saturday, March 28, 2026

वासनाएं (desires)

 न जातु काम: कामानाम उपभोगेन शाम्यति

 हविषा कृष्णवर्तमा इव भूय एव अभिवर्धते

विभिन्न प्रकार की इच्छाएं अथवा वासनाएं भोगने से शांत नहीं होतीं; बल्कि और अधिक बढ़ती ही चली जाती हैं। ठीक इसी प्रकार, जिस प्रकार कि अग्नि में घी डालने से आग की लपटें बुझती नहीं, वरन और अधिक तीव्र हो जाती हैं।

 इन्हें नियंत्रित करने के लिए आत्म संयम और विवेक की आवश्यकता है। यद्यपि यह बहुत दुष्कर कार्य है। लेकिन निरंतर अभ्यास करते रहने पर, हम अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

Monday, March 23, 2026

स्वयं की खोज!

 मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया

 जो कुछ अपने पास है, वह धन किसी का है दिया।


 देने वाले ने दिया, वह भी दिया, किस शान से!

 'मेरा है!' यह पाने वाला, कह उठा अभिमान से

 मैं, मेरा, यह कहने वाला, मन किसी का है दिया।


 जो मिला है वह, हमेशा पास रह सकता नहीं

 कब बिछुड़ जाए यह; कोई राज़ कह सकता नहीं

 जिंदगानी का दिया, मधुबन किसी का है दिया।


 जग की सेवा; खोज अपनी; प्रीति उनसे कीजिए

 ज़िंदगी का राज़ है यह, जानकर जी लीजिए

 साधना की राह में, साधन किसी का है दिया।


Wednesday, February 25, 2026

दैवी संपदा!

 अभयम्, सत्त्वसंशुद्धि:, ज्ञानयोगव्यवस्थिति:

 दानम्, दम: च, यज्ञः च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम्


अहिंसा, सत्यम्, अक्रोध:, त्याग:, शांति:, अपैशुनम्

 दया भूतेषु,  अलोलुप्त्वम्, मार्दवम्,  ह्री, अचापलम्


तेज:, क्षमा, धृति:, शौचम्, अद्रोह, न अतिमानिता  

भवन्ति संपदम् दैवीम्, अभिजातस्य भारत!

Monday, January 26, 2026

याचना

इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए 

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए


जीवन की टेढ़ी राहों में, 

चलकर न तुझको जान सका

आशाओं की झोली भर जाए, इक तेरा द्वारा मिल जाए 


मैं दीन हूं, दीन दयाल है तू

अल्पज्ञ हूं मैं, सर्वज्ञ है तू 

अज्ञान का पर्दा हट जाए, तेरा उजियारा मिल जाए


मैं नर हूं, तुम नारायण हो 

इतना तो भेद ज़रूरी है 

यदि शरण तेरी मैं आ न सका, नर तन तो दोबारा मिल जाए 


इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए

Friday, January 23, 2026

कटहल का कमाल!

 देवदत्त एक कॉलेज में प्रोफेसर था। उसका कॉलेज बहुत दूरी पर था। सवेरे जब भी वह अपने कॉलेज के लिए जाता तो रास्ते में उसके प्रिंसिपल अभिषेक भी उसके साथ ही बैठकर कॉलेज तक चले जाते। प्रिंसिपल अभिषेक का घर बीच रास्ते में ही था। इसीलिए वे लगभग प्रतिदिन देवदत्त के साथ ही कॉलेज में जाते थे। देवदत्त को भी इसमें कोई आपत्ति न थी। उसे तो कॉलेज जाना ही होता था।

 देवदत्त का बहुत बड़ा सा घर था। उसमें तरह-तरह के पेड़ भी लगे हुए थे। नारियल के, नींबू के, आम के, केले के और एक बड़ा सा कटहल का पेड़ भी था। कटहल के पेड़ में बहुत कटहल आते थे; जिन्हें देवदत्त की मां कल्पना आस पड़ोस में बांट देती थी। लेकिन कोई कल्पना की मर्ज़ी के बिना कटहल ले जाए, तो उसे बहुत बुरा लगता था।

 एक बार ऐसा हुआ कि देवदत्त के पिता श्यामा प्रसाद बहुत बीमार हो गए। उनका बहुत इलाज़ कराया, लेकिन श्यामा प्रसाद बच न सके। उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए देवदत्त के कॉलेज से भी सभी प्रोफेसर आए। प्रिंसिपल अभिषेक भी साथ ही आए। थोड़ी देर के बाद सभी प्रोफेसर चले गए। 

प्रिंसिपल साहब कुछ अधिक देर तक वहीं बैठे रहे। उन्होंने देवदत्त के घर में सभी पेड़ों को देखा। उन्हें कटहल का पेड़ विशेष रूप से बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद प्रिंसिपल साहब भी अपने घर चले गए।

 एक दिन ऐसे ही कार में साथ-साथ जाते समय प्रिंसिपल साहब ने देवदत्त से पूछा, "इस कटहल के पेड़ में तो बहुत कटहल आते होंगे?"

 देवदूत ने कहा, "हां। जब मौसम होता है तो यह कटहल से भर जाता है।"

 प्रिंसिपल साहब कुछ अलग मिजाज़ के ही व्यक्ति थे। वे कंजूस भी थे और थोड़े लालची भी! तभी तो वे रोज देवदत्त के साथ ही कार में अपने कॉलेज जाया करते थे। अब उन्हें यह पता चल गया था कि देवदत्त के घर कटहल का पेड़ है। उन्हें कटहल पसंद भी बहुत थी।

 उन्होंने कहा, "देवदत्त! जब भी तुम्हारे पेड़ में कटहल आए तो मुझे अवश्य देना।" देवदत्त ने सहर्ष सहमति दे दी। 

 कटहल का मौसम आने पर देवदत्त एक बोरा भरकर कटहल प्रिंसिपल साहब के लिए ले आया। देवदत्त की मां कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे तो प्रिंसिपल साहब वैसे भी बहुत पसंद नहीं थे। इस पर उन्होंने जबरदस्ती ही कटहल भी मांग लिए थे। देवदत्त ने भी पूरा बोरा भरकर उन्हें कटहल दे दिए थे।  वह इस बात से बहुत परेशान थी। 

 कल्पना को यह समझते देर न लगी, कि अब प्रिंसिपल साहब के पास, हर बार ही कटहल का एक बोरा ज़रूर जाया करेगा। कल्पना ने सोचा, कि देवदत्त को अगर मना किया गया, तो भी वह रुकेगा नहीं। वह प्रोफेसर साहब को कटहल अवश्य देगा। वह उनको कटहल न दे, इसके लिए प्रिंसिपल साहब से देवदत्त के मन की दूरी बनाना आवश्यक था। इसीलिए उसने देवदत्त को प्राय: यह कहना शुरू कर दिया, कि ये प्रिंसिपल साहब अपनी गाड़ी में क्यों नहीं जाते? यह रोज़ तुम्हारे साथ ही क्यों कॉलेज जाते हैं? 

पहले तो देवदत्त ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपनी मां की बात प्रतिदिन सुनते-सुनते, धीरे-धीरे उसे स्वयं भी लगने लगा, कि प्रिंसिपल साहब हर रोज़ उसके साथ जबरदस्ती ही जाते हैं। उसे भी यह बात खटकने लगी। अब रोज़-रोज़ प्रिंसिपल साहब को अपने साथ ले जाना उसे भार की तरह लगने लगा। 

अब उनसे पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे? उन्हें मना तो किया नहीं जा सकता था। उसे एक तरकीब सूझी। उसके घर से कॉलेज बहुत दूर पड़ता था। पेट्रोल का भी काफी खर्च आता था। इसीलिए उसने सोचा कि कॉलेज के अंदर ही जो सरकारी क्वार्टर हैं; उसी में वह रहना शुरू कर देगा। इससे पेट्रोल का खर्चा भी बचेगा और प्रिंसिपल से भी छुटकारा मिलेगा। जितना उसका मकान किराया भत्ता कटेगा, उतने का तो पेट्रोल ही खर्च हो जाता था।

 उसने तुरंत सरकारी क्वार्टर के लिए आवेदन कर दिया। उसको मकान मिल भी गया। उसने घर जाकर प्रसन्नता से अपनी मां कल्पना को बताया कि अब हम सरकारी क्वार्टर में रहेंगे। प्रिंसिपल अब मेरे साथ नहीं जाया करेंगे। यह झंझट खत्म हुआ। 

लेकिन मां कल्पना को यह बात सुनकर, तनिक भी खुशी नहीं हुई। उसे तो अपने मकान में ही रहना था। उसे सरकारी मकान में नहीं जाना था। 

उसने कहा,"नहीं। हम अपने मकान में ही रहेंगे। सरकारी मकान में क्या करेंगे जाकर? जब अपना मकान इतना अच्छा है। तो इसे क्यों छोड़ेंगे?"

 लेकिन देवदत्त ने कहा, "मां! एक तो प्रिंसिपल साहब से छुटकारा मिल जाएगा। और दूसरा मकान से कॉलेज की बहुत अधिक दूरी है। तो समय भी बचेगा और पेट्रोल भी। इसीलिए हम सरकारी मकान में ही रहेंगे।"

 घर का सामान शिफ्ट होते समय कल्पना सोच रही थी, "इससे अच्छा तो यह था कि भले ही प्रिंसिपल साहब हर साल एक बोरा कटहल ले लेते, लेकिन कम से कम हम अपने मकान में तो रहते!"

केवल कटहल के कारण कितना बडा कमाल हो जाएगा; यह तो कल्पना की कल्पना में भी नहीं था!