फिर मत कहना कुछ कर न सके
नहीं जीवन अब तक संवर सके
जब नर तन तुम्हें निरोग मिला
सत्संगत का भी योग मिला
फिर प्रभु कृपा अनुभव करके,
यदि भवसागर तुम तर न सके
तुम सत्य तत्व ज्ञानी होकर
तुम सत्धर्मी, मानी होकर
यदि सरल, निरभिमानी होकर
कामना विमुक्त विचर न सके
जग में जो कुछ भी पाओगे
सब यही छोड़ कर जाओगे
पछताओगे, यदि तुम अपना
पुण्यों से जीवन भर न सके
जब अंत समय आ जाएगा
तब क्या तुमसे बन पाएगा?
यदि शक्ति समय के रहते ही
आचार विचार सुधर न सके