पत्नी की चिता जल चुकने के पश्चात, वह अपनी तेरह दिन की बच्ची को लेकर जल्दी-जल्दी जा रहा था। वह बच्ची को लेकर जिंदा दबाने के लिए ले जा रहा था। बच्ची के दादा ने तो सिर्फ उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करने को ही कहा था!
यह महाराष्ट्र के लातूर जिले की कहानी है। सत्तर वर्षीया सुनीता ने बताया कि उसके पिता ने उसकी माता को तभी छोड़ दिया था जब वे गर्भावस्था में थीं। उसके जन्म के बाद उसकी माता को जल्दी ही घर के कामों में लगना पड़ा। एक दिन घर के फर्श को गोबर से लीपते समय मां की मृत्यु हो गई। उस समय सुनीता केवल तेरह दिन की ही थी। सुनीता के नाना ने बच्ची को सुनीता के दादा के हाथ में सौंपते हुए कहा कि अब यह आपकी जिम्मेदारी है। दादा ने सुनीता के पिता के हाथ में बच्ची को दे दिया।
बच्ची को गोद में लेकर बेटा जल्दी-जल्दी बाहर जाने लगा तो दादा को शक हुआ। वह भी उसके पीछे-पीछे गए। लेकिन जब तक वह उसे पकड़ पाते, तब तक वह बच्ची को अपनी पत्नी के चिता के पास ही मिट्टी में दबा चुका था। बारिश से मिट्टी गीली हो चुकी थी। दादा ने जल्दी-जल्दी वहां की मिट्टी को हटाया। वहीं नन्ही सुनीता लेटी हुई थी। उन्होंने उसे उठाकर उसकी नाक के पास उंगली रखी, तो पाया कि अभी उसकी सांस चल रही है।
घर आकर उन्होंने सुनीता को अपनी बकरियों के साथ एक फटी साड़ी में लपेटकर लिटा दिया और खुद भी वही रात गुजारी। वास्तव में वे चाहते थे कि बच्ची को कुछ गरमाइश मिलती रहे। अगले दिन उन्होंने बकरी का दूध निकाल कर, रूई की बत्ती बनाकर, सुनीता को दूध पिलाया। लेकिन वह कब तक यह काम कर सकते थे? उन्होंने एक उपाय सोचा। वहीं पास में चंद्रभागा ने अपनी पुत्री कावेरा को जन्म दिया था। उन्होंने चंद्रभागा को कहा कि वह सुनीता को भी दूध पिला दे। इससे वह बच जाएगी। वैसे तो चंद्रभागा मानती नहीं; परन्तु दादा के बार-बार कहने पर उसने यह स्वीकार कर लिया।
बड़े होने पर दादा ने सुनीता और कावेरा, दोनों की पढ़ाई का इंतजाम किया। इसके लिए उन्हें कुछ रुपए उधार भी लेने पड़े। लेकिन इसकी उन्होंने परवाह न की। बच्चियां पढ़ाई में अच्छी थीं। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पास के बड़े स्कूल में जाना पड़ा।
वहां सुनीता को अपनी सौतेली मां के साथ रहना पड़ा। पिता तो वहां थे ही बुरे, सौतेली मां का और भी अधिक दुर्व्यवहार था। इतना सब सहते सहते भी उसने वहां पढ़ाई की। उसकी सौतेली मां ने एक दिन उसे खाने में ज़हर देने की कोशिश की। उसके बाद दादा जी ने उसे एक किराए का कमरा दिलवा दिया। वहां सुनीता और कावेरा रहने लगीं।
दसवीं की परीक्षा के बाद लाटूर के एक अस्पताल में उन्हें नर्स की ट्रेनिंग में दाखिला मिल गया। ये वहीं रहने लगीं और कुछ रुपए भी कमाने लगीं। वहीं पर दिलीप नाम का एक लैबोरेट्री का टेक्नीशियन भी अस्पताल में कर्मचारी था। वह भी वहीं रहता था, जहां यह दोनों किराए पर रहती थीं। धीरे-धीरे सुनीता और दिलीप का आपस में प्यार बढ़ गया। कावेरा ने इसकी शिकायत सुनीता के दादाजी से कर दी। दादाजी ने फिर उसके बाद सुनीता के पास आना बंद कर दिया।
पन्द्रह वर्ष की सुनीता गर्भवती हो गई थी। उन्होंने दिलीप के साथ आर्य समाज के अनुसार विवाह कर लिया और वह नांदेड़ चली आई। उनका पहला बच्चा तो कुछ घंटे के बाद ही मर गया था। जब दूसरा बच्चा योगेश पैदा हुआ तो दादा और चंद्रभागा बच्चों से मिलने के लिए आए। सुनीता और दादाजी का रिश्ता फिर से स्थापित हो गया। तीन साल बाद दूसरा बच्चा जमीर पैदा हुआ। योगेश एक इंजीनियर बन गया और छोटा बच्चा जमीर, बच्चों का डॉक्टर बन गया।
सुनीता और दिलीप ने मिलकर लातूर में समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। विशेष तौर पर वे कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में समाज में जागृति फैला रही थीं। उनका कहना था कि समाज में स्त्रियों का पुरुषों जितना ही सम्मान होना चाहिए।
धीरे-धीरे सुनीता ने तो अपनी नौकरी छोड़ दी; जिससे कि वह समाज सेवा भली प्रकार कर सके। वे लाटूर नगर परिषद में चुनी भी गईअं। वास्तव में वह सीट दलितों के लिए आरक्षित थी। शायद इसीलिए उनका चुनाव आसानी से हो गया। लेकिन देश में इमरजेंसी के दौरान में उन्हें जेल जाना पड़ा। तभी उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। जेल से निकलने के बाद भी वे समाज सेवा करती रही। जेल में रहकर सुनीता ने अपनी पुस्तक भी लिखी। उसमें सुनीता की अपनी कहानी है।
सुनीता ने अपने पिता से कभी नहीं पूछा कि उन्होंने उसे जमीन में क्यों गाड़ दिया था? और क्यों वे दादाजी से इस बात पर नाराज थे, कि दादाजी ने उसे मौत के मुंह से बचा लिया था। सुनीता को पता था कि उसके पिता एक बेटी नहीं चाहते थे। ऐसी बेटी तो बिल्कुल भी नहीं जिसकी मां उसे जन्म देने के कुछ दिन बाद ही मर गई थी।
लेकिन वही सत्तर वर्षीया, साहसी सुनीता, आज यह सिद्ध कर चुकी हैं, कि जिंदगी हारने के लिए नहीं होती। जिंदगी तो हमेशा जीत ही जाती है।