Wednesday, September 23, 2026

नन्हा हाथी

 जलपाईगुड़ी से निकलती हुई तीस्ता नदी अपने पूरे उफान पर थी। सचिन अपनी नाव को खूंटे के सहारे रस्सी से बांध रहा था। तभी उसकी नज़र नदी में से निकलती हुई छोटी सी सूंड पर जा पड़ी ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह किसी नन्हे हाथी की सूंड हो। उसे उत्सुकता हुई कि यह क्या है?

वह नाव खोलकर तुरंत उस सूंड की ओर बढ़ चला।  वहां जाकर उसने देखा कि हाथी का नवजात शिशु तैरने की कोशिश करता हुआ सूंड ऊपर करके सांस लेने का प्रयत्न कर रहा है। सचिन ने तनिक भी देर न लगाई और अपने साथी को भी वही बुला लिया। दोनों मित्रों ने मिलकर नन्हे हाथी को अपनी नावों पर रखा। जैसे तैसे उसे वे किनारे पर ले आए। 

वह इतना नन्हा था कि लग रह रहा था कि एक या दो दिन पहले ही उसका जन्म हुआ है। एक बार तो उन्हें समझ नहीं आया कि वे करें क्या? फिर सचिन ने अपने मित्र को कहा कि हमें वन विभाग के अधिकारियों को सूचित करना चाहिए।  वे ही इस बच्चे की जान बचा सकते हैं। वन अधिकारियों को फोन किया गया। दस-पन्द्रह मिनट बाद ही वन अधिकारी वहां पहुंच गए। 

वन अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पिछले दिन ही पांच हाथियों का झुंड यहां से होता हुआ गुजारा है।  उसके कुछ देर बाद नदी का उफान भी यहां तक आ पहुंचा। उसी समय यह बच्चा उस हाथी के झुंड से बिछुड़ गया होगा। शायद यह उन्हीं हाथियों का ही बच्चा होगा। 

उन अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर इस बच्चे को जल्दी ही उसे झुंड में नहीं छोड़ा गया तो वे इस बच्चे को लावारिस ही छोड़ देंगे। वे इसे अपने झुंड में शामिल नहीं करेंगे। वास्तव में अगर हाथी का नन्हा बच्चा इंसानों के साथ अधिक समय तक रह जाए तो हाथियों का झुंड उसे स्वीकार नहीं करता। इसीलिए बच्चे को हाथियों तक पहुंचाने में शीघ्रता करनी चाहिए। 

सचिन और उसके मित्र ने वन अधिकारियों के साथ मिलकर उस झुंड को ढूंढने का प्रयत्न किया।  सौभाग्यवश झुंड अभी बहुत दूर नहीं गया था। आधे घंटे बाद ही उन्होंने देखा कि हाथियों का झुंड वृक्षों के नीचे खड़ा था। उन्हें लगा कि संभवतः इसी झुंड में इस बच्चे की मां भी अवश्य होगी। 

उन्होंने उस बच्चे को झुंड से थोड़ी दूरी पर छोड़ दिया। उन सभी को आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि बच्चे की मां ने उसे पहचान लिया और वह उसके पास आ गई। बच्चे ने अपनी मां का दूध भी पीना प्रारंभ कर दिया और वह भी वहीं खड़ी उसे दूध पिलाती रही। वन अधिकारी, सचिन और उसके मित्र दूर खड़े यह सब देखते रहे। थोड़ी देर बाद वे सभी वहां से वापिस आ गए। 

वन अधिकारियों ने सचिन का बहुत-बहुत धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि सचिन ने यह बहुत ही उत्कृष्ट कार्य किया है। शायद यह बच्चा जीवित न रह पाता अगर सचिन ने उसकी सहायता न की होती। सचिन ने कहा, "मुझे तो बहुत प्रसन्नता है कि मैं नन्हे हाथी को उसकी मां से मिलवा पाया। मुझे तो आपका धन्यवाद करना है कि आपने मेरा साथ दिया।"

 वन अधिकारियों से हाथ मिलाकर सचिन अपने दोस्त के साथ वापिस आ गया। वह सोच रहा था कि काश वह उस नन्हे हाथी के बच्चे को पाल पाता तो कितना मज़ा आता!

Saturday, September 5, 2026

विजयी वयोवृद्धा

 97 वर्षीया गुण माया बोहरा का सिर थोड़ा हिला, तो उनके रिश्तेदारों को प्रतीत हुआ कि शायद वे अभी जिंदा हैं। उनके पोते रसिक बोहरा ने बताया कि वे कीचड़ में आठ से नौ घंटे तक पड़ी हुई थीं।  ऐसा लग रहा था कि शायद उनकी मौत हो गई है।

नेपाल के त्रिशूली बाजार में भयंकर बाढ़ आने पर नुवाकोट की गुणमाया बोहरा इस बाढ़ मे अपने घर में ही घिर गई। आसपास की सभी सडकें बाढ़ में बह गई और उनका मकान भी ढह गया। बाढ़ की मिट्टी और मकान का मलबा सभी उनके ऊपर आ गिरे। लगभग 8-9 घंटे तक वह गीली मिट्टी और मलबे में दबी रही।

 अचानक उनके थोड़ा हिलने डुलने से किसी की नज़र उन पर पड़ी। उनका सिर हिल रहा था। तुरंत बचाव कार्य कर्मचारी और उनके रिश्तेदार, कीचड़ और मलबे के बीच से उन्हें निकालने का प्रयत्न करने लगे। 

आखिर जब उन्हें निकाला गया तो वे पूरी मिट्टी से लिपटी हुई थीं। उनके कपड़े, बाल और मुंह सब कीचड़ से लथपथ थे। लेकिन वे चुपचाप शांत बैठी रहीं। उन्हें किसी प्रकार काठमांडू के बीर हॉस्पिटल में ले जाया गया।

 उनकी उम्र इतनी बड़ी होने पर भी उनके शरीर पर किसी प्रकार के घाव के निशान नहीं थे। उनके पोते रसिक ने बताया कि वे बिल्कुल ठीक हैं। उसे लग रहा था कि यह तो चमत्कार है, कि इतनी बड़ी उम्र में भी वे इतनी बड़ी आपदा से सुरक्षित बाहर निकल आईं। उनका प्रपौत्र दीपक बोहरा भी बहुत खुश था। वह कह रहा था कि उनकी परदादी एक योद्धा की तरह प्रतीत हो रही हैं। वे बाढ़ से युद्ध में हारी नहीं, बल्कि विजयी होकर बाहर आई हैं।

Tuesday, September 1, 2026

हरि दर्शन

 शरण प्रभु की आओ रे, यही समय है प्यारे।

 आओ प्रभुगुण गाओ रे, यही समय है प्यारे।


 उदय हुआ हरि नाम का भानु, 

आओ दर्शन पाओ रे, यही समय है प्यारे। 


झूठ, कपट और निंदा त्यागो, 

सत्य में चित्त लगाओ रे, यही समय है प्यारे।


 शरण प्रभु की आओ रे, यही समय है प्यारे।

Thursday, August 20, 2026

जीवन की बांसुरी

बांसुरी स्वयं नहीं बजती;

प्रयास अपेक्षित है। 

मधुर सृजन हेतु  वांछित है,

अधरों का कंपन;

सधी हुई वायु का स्पंदन; 

और दक्ष तर्जनी का प्रबन्धन।

तभी निस्सृत होगी सप्तस्वरी सरगम। 

चेष्टा व्यर्थ नहीं जाती।

किन्तु अकर्मण्य रहकर,

आनंद रस की आकांक्षा करना,

दिवास्वप्न की भांति छलावा भर है।

पुरुषार्थ भरता है, 

जीवन में रस और माधुर्य। 

बांसुरी के स्वर को साधती है, 

ऐसी सतत साधना,

जिसमें तल्लीनता का पूर्ण भाव हो।

और स्वयं को खो देने का साहस हो।

पूर्ण रस में निमग्न होकर,

डूबने का चाव हो।

आह्लादित कर दे जो प्राण प्राण को,

सुरों की सरिता में गोते लगा ले।

बांसुरी ऐसी बजे कि स्वयं को भी भुला दे। 

गहन सप्तसुरों में डूबा आनंद, 

जीवन को मदमस्त कर दे। 

शिखर तक पहुंच पाएं प्राण; 

तब विस्मृत हो भाव जग का।

ऐसी बजे बांसुरी कि,

निष्प्राण तन चहक उठे।

बांसुरी के स्वर फूटें,

तो सोए वाद्य हो उठें झंकृत, 

पूर्ण अस्तित्व हो उठे पुलकित। 

एक-एक छिद्र से निस्सृत कंपन,

विलीन कर दे तन-मन का आभास।

और प्राणों में संचरित हो, 

सरलता, स्फूर्ति और विश्वास।

Wednesday, August 19, 2026

ज़िंदगी जीत गई

 पत्नी की चिता जल चुकने के पश्चात, वह अपनी तेरह दिन की बच्ची को लेकर जल्दी-जल्दी जा रहा था। वह बच्ची को लेकर जिंदा दबाने के लिए ले जा रहा था। बच्ची के दादा ने तो सिर्फ उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए ही कहा था!

यह महाराष्ट्र के लातूर जिले की कहानी है। सत्तर वर्षीया सुनीता ने बताया कि उसके पिता ने उसकी माता को तभी छोड़ दिया था जब वे गर्भावस्था में थीं। उसके जन्म के बाद उसकी माता को जल्दी ही घर के कामों में लगना पड़ा। एक दिन घर के फर्श को गोबर से लीपते समय मां की मृत्यु हो गई। उस समय सुनीता केवल तेरह दिन की ही थी। सुनीता के नाना ने बच्ची को सुनीता के दादा के हाथ में सौंपते हुए कहा कि अब यह आपकी जिम्मेदारी है। दादा ने सुनीता के पिता के हाथ में बच्ची को दे दिया।

बच्ची को गोद में लेकर बेटा जल्दी-जल्दी बाहर जाने लगा तो दादा को शक हुआ। वह भी उसके पीछे-पीछे गए। लेकिन जब तक वह उसे पकड़ पाते, तब तक वह बच्ची को अपनी पत्नी के चिता के पास ही मिट्टी में दबा चुका था। बारिश से मिट्टी गीली हो चुकी थी। दादा ने जल्दी-जल्दी वहां की मिट्टी को हटाया। वहीं नन्ही सुनीता लेटी हुई थी। उन्होंने उसे उठाकर उसकी नाक के पास उंगली रखी, तो पाया कि अभी उसकी सांस चल रही है।

घर आकर उन्होंने सुनीता को अपनी बकरियों के साथ एक फटी साड़ी में लपेटकर लिटा दिया और स्वयं भी वही रात गुजारी। वास्तव में वे चाहते थे कि बच्ची को कुछ उष्णता का अनुभव हो। 

अगले दिन उन्होंने बकरी का दूध निकाल कर, रूई की बत्ती बनाकर, सुनीता को दूध पिलाया। लेकिन वह कब तक यह काम कर सकते थे? उन्होंने एक उपाय सोचा। वहीं पास में चंद्रभागा ने अपनी पुत्री कावेरा को जन्म दिया था। उन्होंने चंद्रभागा को कहा कि वह सुनीता को भी दूध पिला दे। इससे वह बच जाएगी। वैसे तो चंद्रभागा मानती नहीं; परन्तु दादा के बार-बार कहने पर उसने यह स्वीकार कर लिया।

बड़े होने पर दादा ने सुनीता और कावेरा, दोनों की पढ़ाई का इंतजाम किया। इसके लिए उन्हें कुछ रुपए उधार भी लेने पड़े। लेकिन इसकी उन्होंने परवाह न की। बच्चियां पढ़ाई में अच्छी थीं। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पास के बड़े स्कूल में जाना पड़ा। 

वहां सुनीता को अपनी सौतेली मां के साथ रहना पड़ा। पिता तो वहां थे ही बुरे, सौतेली मां का और भी अधिक दुर्व्यवहार था। इतना सब सहते सहते भी उसने वहां पढ़ाई की। उसकी सौतेली मां ने एक दिन उसे खाने में ज़हर देने की कोशिश की। उसके बाद दादा जी ने उसे एक किराए का कमरा दिलवा दिया। वहां सुनीता और कावेरा रहने लगीं।

 दसवीं की परीक्षा के बाद लाटूर के एक अस्पताल में उन्हें नर्स की ट्रेनिंग में दाखिला मिल गया।  ये वहीं रहने लगीं और कुछ रुपए भी कमाने लगीं। वहीं पर दिलीप नाम का एक लैबोरेट्री का टैक्नीशियन भी अस्पताल में कर्मचारी था। वह भी वहीं रहता था, जहां यह दोनों किराए पर रहती थीं। धीरे-धीरे सुनीता और दिलीप का आपस में प्यार बढ़ गया। कावेरा ने इसकी शिकायत सुनीता के दादाजी से कर दी। दादाजी ने फिर उसके बाद सुनीता के पास आना बंद कर दिया।

 पन्द्रह वर्ष की सुनीता गर्भवती हो गई थी। उन्होंने दिलीप के साथ आर्य समाज के अनुसार विवाह कर लिया और वह नांदेड़ चली आई। उनका पहला बच्चा तो कुछ घंटे के बाद ही मर गया था। जब दूसरा बच्चा योगेश पैदा हुआ तो दादा और चंद्रभागा बच्चों से मिलने के लिए आए। सुनीता और दादाजी का रिश्ता फिर से स्थापित हो गया। तीन साल बाद एक और बच्चा जमीर पैदा हुआ। योगेश एक इंजीनियर बन गया और छोटा बच्चा जमीर, बच्चों का डॉक्टर बन गया।

सुनीता और दिलीप ने मिलकर लातूर में समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। विशेष तौर पर वे कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में समाज में जागृति फैला रही थीं। उनका कहना था कि समाज में स्त्रियों का पुरुषों जितना ही सम्मान होना चाहिए। 

धीरे-धीरे सुनीता ने तो अपनी नौकरी छोड़ दी; जिससे कि वह समाज सेवा भली प्रकार कर सके। वे लाटूर नगर परिषद में चुनी भी गईअं। वास्तव में वह सीट दलितों के लिए आरक्षित थी। शायद इसीलिए उनका चुनाव आसानी से हो गया। लेकिन देश में इमरजेंसी के दौरान में उन्हें जेल जाना पड़ा। तभी उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। जेल से निकलने के बाद भी वे समाज सेवा करती रही। जेल में रहकर सुनीता ने अपनी पुस्तक भी लिखी। उसमें सुनीता की अपनी कहानी है।

सुनीता ने अपने पिता से कभी नहीं पूछा कि उन्होंने उसे जमीन में क्यों गाड़ दिया था? और क्यों वे दादाजी से इस बात पर नाराज थे, कि दादाजी ने उसे मौत के मुंह से बचा लिया था? सुनीता को पता था कि उसके पिता एक बेटी नहीं चाहते थे। ऐसी बेटी तो बिल्कुल भी नहीं जिसकी मां उसे जन्म देने के कुछ दिन बाद ही मर गई थी।

लेकिन वही सत्तर वर्षीया, साहसी सुनीता, आज यह सिद्ध कर चुकी हैं, कि जिंदगी हारने के लिए नहीं होती। जिंदगी तो हमेशा जीत ही जाती है।

Sunday, August 2, 2026

अनूठी चोरी!

 बेंगलुरु में एक आभूषणों की दुकान में चोरी हो गई थी। लगभग नब्बे ग्राम सोना खो गया था। कोई उसे चुरा ले गया था। सभी खोजबीन कर ली गई थीं। सीसीटीवी कैमरे में अच्छी तरह खंगाल कर देख लिया गया था। पुलिस वालों ने भी पूरी तहकीकात कर ली थी। लेकिन चोर का कोई पता न चल रहा था।

 आखिर नब्बे ग्राम सोने के गहने गए तो कहां गए? कोई चोर नहीं आया। नौकरों ने भी गहने नहीं उठाए। गहने किसी को बेचे भी नहीं गए। तो गहने कहां गए? आभूषणों की दुकान का मालिक बहुत परेशान था। बहुत सोच विचार किया, परन्तु कुछ भी समझ न आया।

 अचानक एक दिन दुकान के एक नौकर को दुकान के फर्श में एक बड़ा सा सुराख़ नज़र आया। उसे सुराख़ को बड़ी सावधानी के साथ धीरे-धीरे खोदा गया। उसके बाद जो नीचे दिखाई दिया, वह दृश्य बहुत हैरान कर देने वाला था। 

वहां एक चुहिया और उसके छः सद्योजात शावक कागजों के मुलायम बिछौने पर बैठे थे। नब्बे ग्राम सोने के गहने वहीं पर रखे हुए थे। सभी को बहुत हैरानी थी कि चुहिया को गहनों का शौक कैसे हो आया? 

लेकिन वास्तविक बात यह नहीं थी।  चुहिया को गहनों से कोई आकर्षण नहीं था। वह तो गहनों पर लिखे वजन वाले कागज मुंह में दबा कर ले जाती थी। जिसके साथ गहने पीछे-पीछे खिंचे आते थे। वह उन कागजों को कुतर-कुतर कर अपने बच्चों के लिए बिछौना बना रही थी। इसी तरह वह कई गहने ले गई। सभी गहनों पर जो वजन लिखा हुआ कागज था; उसे कुतर-कुतर कर उसने नन्हे शावकों का बिछौना बना लिया था।

 सभी खोए हुए गहने वहीं पर पड़े हुए थे।  दुकान का मालिक बहुत हैरान हुआ। उसे हंसी भी आ गई। उसने कहा, "हमने तो सोचा था कि किसी चोर ने यह सब गहने चुराए होंगे। चोरी तो हुई, लेकिन वह किसी व्यक्ति ने नहीं बल्कि एक चुहिया ने की। यह तो अनूठी 'सोना चोर' चुहिया है।"

यह सुनकर दुकान के सभी कर्मचारी भी हंस पड़े।

Monday, July 27, 2026

मौत से साक्षात्कार!

 गुजरात का कालू परमार गडरिया अपने अहाते में खड़ा हुआ था। अचानक उसे पीछे से एक धक्का लगा और किसी ने उसे दबोच लिया।

 जब तक वह देख पाता, कि किसने उसे दबोचा है; उससे पहले ही किसी ने कालू का हाथ अपने मुंह में दबा लिया। तब कालू परमार ने देखा कि एक सिंह ने पीछे से उस पर आक्रमण किया है।

 वह घबरा तो बहुत गया। उसने अपना हाथ छुड़ाने की जैसे ही कोशिश की; सिंह ने बैठे हुए कालू का एक पैर अपने पंजों के नीचे दबोच लिया और उसके ऊपर बैठ गया। 

            कालू को साक्षात मौत नजर आ रही थी। लेकिन उसने थोड़ा धैर्य से काम लिया। वह शांति से उसकी आंखों की तरफ देखता रहा और एक हाथ से उसकी गर्दन सहलाने लगा जैसे कि पालतू जानवरों के साथ किया जाता है। हैरानी की बात यह हुई कि इस पर सिंह ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी। वह कालू को देखता रहा। कालू भी उसकी तरफ देखता हुआ उसकी गर्दन धीरे-धीरे सहलाता रहा।

 ऐसा लग रह रहा था जैसे दोनों मौन भाषा में बातें कर रहे हों। कालू परमार को यही लग रह रहा था कि काल उसके सामने है। और वह किसी भी पल काल का ग्रास बन जाएगा। लेकिन फिर भी बिना हिम्मत हारे हुए वह ऐसे ही बैठा रहा और उसे सहलाता रहा। शायद उसके शांतिपूर्ण व्यवहार के कारण ही सिंह उस पर कोई आक्रमण नहीं कर रहा था। कालू अगर इतना धैर्यवान न होता तो वह सिंह हिंसक हो सकता था।

 गांव वाले पीछे से पत्थर मारे जा रहे थे और शोर भी मचा रहे थे। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि सिंह कालू परमार को देख रहा था और कुछ भी नहीं कर रहा था। कालू परमार भी शान्ति से बैठा था। उसके अंदर का डर धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा था। शायद वह समझ रहा था की मौत आई, तब भी ठीक और बच गए तब भी ठीक। समभाव की अनुभूति के अतिरिक्त और कोई चारा भी तो न था।

 आधे घंटे के बाद, अचानक वह सिंह उठ खड़ा हुआ। वह अहाते से बाहर चला गया। कालू परमार ने राहत की सांस ली। उसे तो वह आधा घंटा एक युग के समान प्रतीत हुआ था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह मौत के मुंह से बच गया है। वह सिंह को जाते हुए देखता रहा। जब वह चला गया, तो गांव वाले उसके पास आए।

 कालू परमार का वह हाथ जो सिंह ने अपने मुंह में लिया था; जख्मी हो गया था और उसमें दांत के निशान भी थे।  लेकिन उसे और कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। वह पूरी तरह सुरक्षित था। गांव वाले खुशियां मनाने लगे। 

लेकिन कालू परमार को अभी तक विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह सिंह के पंजे से सकुशल बच गया है। शायद सिंह को भूख नहीं रही होगी। उसका पेट भरा हुआ होगा। तभी तो उसने कालू परमार को खाने की चेष्टा नहीं की। कालू परमार मन ही मन भगवान का धन्यवाद कर रहा था। उसके जीवन की यह सबसे आश्चर्य जनक घटना थी।

गांव वाले उसे हाथों पर ऊपर उठाकर नाचने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वे मौत से हुए साक्षात्कार की जीत का जश्न मना रहे हों!