Thursday, August 20, 2026

जीवन की बांसुरी

बांसुरी स्वयं नहीं बजती;

प्रयास अपेक्षित है। 

मधुर सृजन हेतु  वांछित है,

अधरों का कंपन;

सधी हुई वायु का स्पंदन; 

और दक्ष तर्जनी का प्रबन्धन;

तभी निस्सृत होगी सप्तस्वरी सरगम। 

चेष्टा व्यर्थ नहीं जाती।

किन्तु अकर्मण्य रहकर,

आनंद रस की आकांक्षा करना,

दिवास्वप्न की भांति छलावा भर है।

पुरुषार्थ भरता है, 

जीवन में रस और माधुर्य। 

बांसुरी के स्वर को साधती है, 

ऐसी सतत साधना,

जिसमें तल्लीनता का पूर्ण भाव हो।

और स्वयं को खो देने का साहस हो।

पूर्ण रस में निमग्न होकर,

डूबने का चाव हो।

आह्लादित कर दे जो प्राण प्राण को,

सुरों की सरिता में गोते लगा ले।

बांसुरी ऐसी बजे कि स्वयं को भी भुला दे। 

गहन सप्तसुरों में डूबा आनंद, 

जीवन को मदमस्त कर दे। 

शिखर तक पहुंच पाएं प्राण; 

तब विस्मृत हो भाव जग का।

ऐसी बजे बांसुरी कि,

निष्प्राण तन चहक उठे।

बांसुरी के स्वर फूटें,

तो सोए वाद्य हो उठें झंकृत, 

पूर्ण अस्तित्व हो उठे पुलकित। 

एक-एक छिद्र से निस्सृत कंपन,

विलीन कर दे तन-मन का आभास।

और प्राणों में संचरित हो, 

सजगता, स्फूर्ति और विश्वास।

Wednesday, August 19, 2026

ज़िंदगी जीत गई

 पत्नी की चिता जल चुकने के पश्चात, वह अपनी तेरह दिन की बच्ची को लेकर जल्दी-जल्दी जा रहा था। वह बच्ची को लेकर जिंदा दबाने के लिए ले जा रहा था। बच्ची के दादा ने तो सिर्फ उसे अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए ही कहा था!

यह महाराष्ट्र के लातूर जिले की कहानी है। सत्तर वर्षीया सुनीता ने बताया कि उसके पिता ने उसकी माता को तभी छोड़ दिया था जब वे गर्भावस्था में थीं। उसके जन्म के बाद उसकी माता को जल्दी ही घर के कामों में लगना पड़ा। एक दिन घर के फर्श को गोबर से लीपते समय मां की मृत्यु हो गई। उस समय सुनीता केवल तेरह दिन की ही थी। सुनीता के नाना ने बच्ची को सुनीता के दादा के हाथ में सौंपते हुए कहा कि अब यह आपकी जिम्मेदारी है। दादा ने सुनीता के पिता के हाथ में बच्ची को दे दिया।

बच्ची को गोद में लेकर बेटा जल्दी-जल्दी बाहर जाने लगा तो दादा को शक हुआ। वह भी उसके पीछे-पीछे गए। लेकिन जब तक वह उसे पकड़ पाते, तब तक वह बच्ची को अपनी पत्नी के चिता के पास ही मिट्टी में दबा चुका था। बारिश से मिट्टी गीली हो चुकी थी। दादा ने जल्दी-जल्दी वहां की मिट्टी को हटाया। वहीं नन्ही सुनीता लेटी हुई थी। उन्होंने उसे उठाकर उसकी नाक के पास उंगली रखी, तो पाया कि अभी उसकी सांस चल रही है।

घर आकर उन्होंने सुनीता को अपनी बकरियों के साथ एक फटी साड़ी में लपेटकर लिटा दिया और स्वयं भी वही रात गुजारी। वास्तव में वे चाहते थे कि बच्ची को कुछ उष्णता का अनुभव हो। 

अगले दिन उन्होंने बकरी का दूध निकाल कर, रूई की बत्ती बनाकर, सुनीता को दूध पिलाया। लेकिन वह कब तक यह काम कर सकते थे? उन्होंने एक उपाय सोचा। वहीं पास में चंद्रभागा ने अपनी पुत्री कावेरा को जन्म दिया था। उन्होंने चंद्रभागा को कहा कि वह सुनीता को भी दूध पिला दे। इससे वह बच जाएगी। वैसे तो चंद्रभागा मानती नहीं; परन्तु दादा के बार-बार कहने पर उसने यह स्वीकार कर लिया।

बड़े होने पर दादा ने सुनीता और कावेरा, दोनों की पढ़ाई का इंतजाम किया। इसके लिए उन्हें कुछ रुपए उधार भी लेने पड़े। लेकिन इसकी उन्होंने परवाह न की। बच्चियां पढ़ाई में अच्छी थीं। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पास के बड़े स्कूल में जाना पड़ा। 

वहां सुनीता को अपनी सौतेली मां के साथ रहना पड़ा। पिता तो वहां थे ही बुरे, सौतेली मां का और भी अधिक दुर्व्यवहार था। इतना सब सहते सहते भी उसने वहां पढ़ाई की। उसकी सौतेली मां ने एक दिन उसे खाने में ज़हर देने की कोशिश की। उसके बाद दादा जी ने उसे एक किराए का कमरा दिलवा दिया। वहां सुनीता और कावेरा रहने लगीं।

 दसवीं की परीक्षा के बाद लाटूर के एक अस्पताल में उन्हें नर्स की ट्रेनिंग में दाखिला मिल गया।  ये वहीं रहने लगीं और कुछ रुपए भी कमाने लगीं। वहीं पर दिलीप नाम का एक लैबोरेट्री का टेक्नीशियन भी अस्पताल में कर्मचारी था। वह भी वहीं रहता था, जहां यह दोनों किराए पर रहती थीं। धीरे-धीरे सुनीता और दिलीप का आपस में प्यार बढ़ गया। कावेरा ने इसकी शिकायत सुनीता के दादाजी से कर दी। दादाजी ने फिर उसके बाद सुनीता के पास आना बंद कर दिया।

 पन्द्रह वर्ष की सुनीता गर्भवती हो गई थी। उन्होंने दिलीप के साथ आर्य समाज के अनुसार विवाह कर लिया और वह नांदेड़ चली आई। उनका पहला बच्चा तो कुछ घंटे के बाद ही मर गया था। जब दूसरा बच्चा योगेश पैदा हुआ तो दादा और चंद्रभागा बच्चों से मिलने के लिए आए। सुनीता और दादाजी का रिश्ता फिर से स्थापित हो गया। तीन साल बाद दूसरा बच्चा जमीर पैदा हुआ। योगेश एक इंजीनियर बन गया और छोटा बच्चा जमीर, बच्चों का डॉक्टर बन गया।

सुनीता और दिलीप ने मिलकर लातूर में समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। विशेष तौर पर वे कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में समाज में जागृति फैला रही थीं। उनका कहना था कि समाज में स्त्रियों का पुरुषों जितना ही सम्मान होना चाहिए। 

धीरे-धीरे सुनीता ने तो अपनी नौकरी छोड़ दी; जिससे कि वह समाज सेवा भली प्रकार कर सके। वे लाटूर नगर परिषद में चुनी भी गईअं। वास्तव में वह सीट दलितों के लिए आरक्षित थी। शायद इसीलिए उनका चुनाव आसानी से हो गया। लेकिन देश में इमरजेंसी के दौरान में उन्हें जेल जाना पड़ा। तभी उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। जेल से निकलने के बाद भी वे समाज सेवा करती रही। जेल में रहकर सुनीता ने अपनी पुस्तक भी लिखी। उसमें सुनीता की अपनी कहानी है।

सुनीता ने अपने पिता से कभी नहीं पूछा कि उन्होंने उसे जमीन में क्यों गाड़ दिया था? और क्यों वे दादाजी से इस बात पर नाराज थे, कि दादाजी ने उसे मौत के मुंह से बचा लिया था। सुनीता को पता था कि उसके पिता एक बेटी नहीं चाहते थे। ऐसी बेटी तो बिल्कुल भी नहीं जिसकी मां उसे जन्म देने के कुछ दिन बाद ही मर गई थी।

लेकिन वही सत्तर वर्षीया, साहसी सुनीता, आज यह सिद्ध कर चुकी हैं, कि जिंदगी हारने के लिए नहीं होती। जिंदगी तो हमेशा जीत ही जाती है।

Sunday, August 2, 2026

अनूठी चोरी!

 बेंगलुरु में एक आभूषणों की दुकान में चोरी हो गई थी। लगभग नब्बे ग्राम सोना खो गया था। कोई उसे चुरा ले गया था। सभी खोजबीन कर ली गई थीं। सीसीटीवी कैमरे में अच्छी तरह खंगाल कर देख लिया गया था। पुलिस वालों ने भी पूरी तहकीकात कर ली थी। लेकिन चोर का कोई पता न चल रहा था।

 आखिर नब्बे ग्राम सोने के गहने गए तो कहां गए? कोई चोर नहीं आया। नौकरों ने भी गहने नहीं उठाए। गहने किसी को बेचे भी नहीं गए। तो गहने कहां गए? आभूषणों की दुकान का मालिक बहुत परेशान था। बहुत सोच विचार किया, परन्तु कुछ भी समझ न आया।

 अचानक एक दिन दुकान के एक नौकर को दुकान के फर्श में एक बड़ा सा सुराख़ नज़र आया। उसे सुराख़ को बड़ी सावधानी के साथ धीरे-धीरे खोदा गया। उसके बाद जो नीचे दिखाई दिया, वह दृश्य बहुत हैरान कर देने वाला था। 

वहां एक चुहिया और उसके छः सद्योजात शावक कागजों के मुलायम बिछौने पर बैठे थे। नब्बे ग्राम सोने के गहने वहीं पर रखे हुए थे। सभी को बहुत हैरानी थी कि चुहिया को गहनों का शौक कैसे हो आया? 

लेकिन वास्तविक बात यह नहीं थी।  चुहिया को गहनों से कोई आकर्षण नहीं था। वह तो गहनों पर लिखे वजन वाले कागज मुंह में दबा कर ले जाती थी। जिसके साथ गहने पीछे-पीछे खिंचे आते थे। वह उन कागजों को कुतर-कुतर कर अपने बच्चों के लिए बिछौना बना रही थी। इसी तरह वह कई गहने ले गई। सभी गहनों पर जो वजन लिखा हुआ कागज था; उसे कुतर-कुतर कर उसने नन्हे शावकों का बिछौना बना लिया था।

 सभी खोए हुए गहने वहीं पर पड़े हुए थे।  दुकान का मालिक बहुत हैरान हुआ। उसे हंसी भी आ गई। उसने कहा, "हमने तो सोचा था कि किसी चोर ने यह सब गहने चुराए होंगे। चोरी तो हुई, लेकिन वह किसी व्यक्ति ने नहीं बल्कि एक चुहिया ने की। यह तो अनूठी 'सोना चोर' चुहिया है।"

यह सुनकर दुकान के सभी कर्मचारी भी हंस पड़े।

Monday, July 27, 2026

मौत से साक्षात्कार!

 गुजरात का कालू परमार गडरिया अपने अहाते में खड़ा हुआ था। अचानक उसे पीछे से एक धक्का लगा और किसी ने उसे दबोच लिया।

 जब तक वह देख पाता, कि किसने उसे दबोचा है; उससे पहले ही किसी ने कालू का हाथ अपने मुंह में दबा लिया। तब कालू परमार ने देखा कि एक सिंह ने पीछे से उस पर आक्रमण किया है।

 वह घबरा तो बहुत गया। उसने अपना हाथ छुड़ाने की जैसे ही कोशिश की; सिंह ने बैठे हुए कालू का एक पैर अपने पंजों के नीचे दबोच लिया और उसके ऊपर बैठ गया। 

            कालू को साक्षात मौत नजर आ रही थी। लेकिन उसने थोड़ा धैर्य से काम लिया। वह शांति से उसकी आंखों की तरफ देखता रहा और एक हाथ से उसकी गर्दन सहलाने लगा जैसे कि पालतू जानवरों के साथ किया जाता है। हैरानी की बात यह हुई कि इस पर सिंह ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी। वह कालू को देखता रहा। कालू भी उसकी तरफ देखता हुआ उसकी गर्दन धीरे-धीरे सहलाता रहा।

 ऐसा लग रह रहा था जैसे दोनों मौन भाषा में बातें कर रहे हों। कालू परमार को यही लग रह रहा था कि काल उसके सामने है। और वह किसी भी पल काल का ग्रास बन जाएगा। लेकिन फिर भी बिना हिम्मत हारे हुए वह ऐसे ही बैठा रहा और उसे सहलाता रहा। शायद उसके शांतिपूर्ण व्यवहार के कारण ही सिंह उस पर कोई आक्रमण नहीं कर रहा था। कालू अगर इतना धैर्यवान न होता तो वह सिंह हिंसक हो सकता था।

 गांव वाले पीछे से पत्थर मारे जा रहे थे और शोर भी मचा रहे थे। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि सिंह कालू परमार को देख रहा था और कुछ भी नहीं कर रहा था। कालू परमार भी शान्ति से बैठा था। उसके अंदर का डर धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा था। शायद वह समझ रहा था की मौत आई, तब भी ठीक और बच गए तब भी ठीक। समभाव की अनुभूति के अतिरिक्त और कोई चारा भी तो न था।

 आधे घंटे के बाद, अचानक वह सिंह उठ खड़ा हुआ। वह अहाते से बाहर चला गया। कालू परमार ने राहत की सांस ली। उसे तो वह आधा घंटा एक युग के समान प्रतीत हुआ था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह मौत के मुंह से बच गया है। वह सिंह को जाते हुए देखता रहा। जब वह चला गया, तो गांव वाले उसके पास आए।

 कालू परमार का वह हाथ जो सिंह ने अपने मुंह में लिया था; जख्मी हो गया था और उसमें दांत के निशान भी थे।  लेकिन उसे और कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। वह पूरी तरह सुरक्षित था। गांव वाले खुशियां मनाने लगे। 

लेकिन कालू परमार को अभी तक विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह सिंह के पंजे से सकुशल बच गया है। शायद सिंह को भूख नहीं रही होगी। उसका पेट भरा हुआ होगा। तभी तो उसने कालू परमार को खाने की चेष्टा नहीं की। कालू परमार मन ही मन भगवान का धन्यवाद कर रहा था। उसके जीवन की यह सबसे आश्चर्य जनक घटना थी।

गांव वाले उसे हाथों पर ऊपर उठाकर नाचने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वे मौत से हुए साक्षात्कार की जीत का जश्न मना रहे हों!

Wednesday, July 8, 2026

फिर मत कहना कुछ कर न सके

 फिर मत कहना कुछ कर न सके

 नहीं जीवन अब तक संवर सके


 जब नर तन तुम्हें निरोग मिला 

 सत्संगत का भी योग मिला

 फिर प्रभु कृपा अनुभव करके, 

यदि भवसागर तुम तर न सके


तुम सत्य तत्व ज्ञानी होकर 

तुम सत्धर्मी, मानी होकर

यदि सरल, निरभिमानी होकर 

कामना विमुक्त विचर न सके


 जग में जो कुछ भी पाओगे

 सब यही छोड़ कर जाओगे 

पछताओगे, यदि तुम अपना

 पुण्यों से जीवन भर न सके


 जब अंत समय आ जाएगा 

 तब क्या तुमसे बन पाएगा?

 यदि शक्ति समय के रहते ही

 आचार विचार सुधर न सके

Monday, June 8, 2026

"भिक्षाम देहि"

 "भिक्षाम देहि!" दरवाजे पर यह आवाज सुनकर नंदी देवी ने जब दरवाजा खोला तो पाया कि सामने 61 वर्षीय लंबी दाढ़ी वाला साधु खड़ा था। उस साधु ने पुनः कहा,"मां! भिक्षाम देहि।"

लगभग 46 वर्ष पहले पिथौरागढ़ बागेश्वर बॉर्डर से, एक 15 साल का किशोर, गांव छोड़कर चला गया था। उसको ढूंढने के सभी प्रयत्न असफल रहे थे। कुछ वर्षों बाद उसके पिता का भी देहांत हो गया था। उसका कुछ कुछ भी पता न चल पाया था।

 वास्तव में बुद्धि बल्लभ उपाध्याय नाम का एक लड़का अपने घर को छोड़कर चला गया था। उसने कुछ समय ट्रकों और दूसरे वाहनों में कुछ मजदूरी की। बाद में वह एक बीकानेर के एक मंदिर में चला गया। वहां उसने नाथ संप्रदाय को अपना लिया। अब उसका नाम बुद्ध नाथ हो गया। अपने गुरु से दीक्षा ली और वहीं रहने लगा। उसने संन्यास को अपना लिया। 4 वर्ष पहले उसके आध्यात्मिक गुरु की भी मृत्यु हो गई थी। मरने से पहले उन्होंने कहा था कि तुम्हारा संन्यास तभी पूर्ण हो पाएगा जब तुम अपनी माता से भिक्षा लेकर आओगे।

आज बुद्धनाथ अपनी माता के सामने खड़ा था। वह झोली फैला कर भिक्षा मांग रहा था। माता को जब सब कुछ पता चला तो उसकी आंख से टप-टप आंसू बहने लगे। उसने अपने बेटे को गले लगा लिया। बुद्ध नाथ ने माता के पैर छुए और उनको कहा कि वह उन्हें भिक्षा दे दें। जिससे कि उनका संन्यास धर्म पूरा हो सके और वह पूरे संन्यासी  बन सके।  

माता ने बहुत अनुग्रह किया कि वह गांव में ही रुक जाए और अपनी माता के पास रहे। लेकिन बुद्ध नाथ ने कहा कि वह संन्यासी बन चुका है और वह गांव में नहीं रहेगा। वह तो बीकानेर के मंदिर में ही रहेगा। हां, अगर कभी माता उससे मिलना चाहती हैं; तो वह बीकानेर के मंदिर में ही आ सकती हैं।

 मां का रो-रो कर बुरा हाल था। इतने वर्षों के बाद पुत्र आया तो वह भी किसी रूप में! लेकिन बुद्ध नाथ के बार-बार भिक्षा मांगने पर माता ने भंडार गृह से थोड़ा अनाज लाकर बुद्ध नाथ की झोली में डाल दिया। बुद्ध नाथ ने वह अनाज अपनी झोली में लिया। फिर विरक्त भाव से वह मुंह मोड़कर वापस चला गया। 

गांव वाले यह सब दृश्य देख रहे थे। उनकी भी आंखों में आंसू थे। परन्तु वे माता को समझा रहे थे, "देख! तेरा पुत्र कितनी महान आत्मा है! वह संन्यासी बन गया; यह तो अपने गांव के लिए बड़ी गर्व की बात है।" 

माता सब कुछ समझ रही थी। लेकिन वह अपने आंसुओं का क्या करें? वे तो किसी भी तरह थम ही नहीं रहे थे।


Tuesday, May 26, 2026

अनुपम उपहार

 महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में एक गांव है बहादरपुरा! वहां के लगभग 3465 निवासियों को एक अनोखा तोहफा विवाह के अवसर पर मिला।

 बहादरपुरा गांव में सांपों के काटने से, बिजली के गिरने से और खेतों में कोई दुर्घटना होने से मौत हो जाया करती थी। जिससे कि परिवार बहुत ही दुखी होते थे। उनकी परेशानी को दूर करने के लिए के उनके पास कोई जीवन बीमा योजना भी नहीं थी। ये घटनाएं घटती ही रहती थी और इनका कोई समाधान भी नहीं था। वास्तव में गांव वाले अगर कोई बीमा योजना ले भी लें तो उनकी किश्त कौन भरे? गांव वाले गरीब थे और उनकी अधिक आय भी नहीं थी। 

पेठकर परिवार के विवाह का समय पास आ रहा था। अनूप पेठकर ने कहा, "क्यों न इस विवाह में हम सभी ग्राम वासियों को एक अद्भुत तोहफा दें!" 

परिवार वालों से विचार विमर्श करने के बाद यह निर्णय हुआ कि सभी ग्राम वासियों को दुर्घटना बीमा अगर दे दिया जाए, तो वे कितने सुखी हो सकेंगे। उपहार का उपहार, और ग्रामवासियों के जीवन में जो खुशियां आएंगी सो अलग!

जयमाला, बैंड बाजे और शानदार भोजन के बाद जो कार्यक्रम था; उसकी तो किसी को उम्मीद ही नहीं थी। लगभग 4500 अतिथि इस विवाह में निमंत्रित थे। अतिथियों के सामने ही अनूप पेठकर ने सबको संबोधित किया, "सभी ग्रामवासी भाइयों। आज बेहद प्रसन्नता का अवसर है। इस अवसर पर मैं सबको एक तोहफा देना चाहता हूं। मैंने पूरे गांव का दुर्घटना बीमा करा लिया है। जिसमें दुर्घटना होने पर ₹100000 मिलेगा।"

जब लोगों ने यह सुना तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा वातावरण गूंज उठा। यह दुर्घटना बीमा 33 करोड़ का था। सभी ग्रामवासी ऐसा शानदार विवाह का तोहफा लेकर बहुत प्रसन्न हुए। सरपंच बलिराम पेट करने तो इसे बहुत अद्भुत तोहफा बताया। 

उसने कहा, "यह शायद इस प्रकार का सबसे पहला तोहफा है। ऐसा तोहफा तो कभी हमारे गांव में किसी ने किसी को नहीं दिया। शादी में लोग मिठाइयां बांटते हैं और तरह-तरह के तोहफे भी बांटते हैं।  परन्तु यह तो सबसे अद्भुत उपहार है। इस परिवार ने तो सबको सुरक्षा का तोहफा दिया है!"

अनूप पेठकर ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "हमें तालियां नहीं चाहिए। हमें तो सबकी दुआएं मिल जाएं, वही बहुत है।"

 गांव वाले विवाह के बाद जब घर जा रहे थे तो उनके पास, एक शानदार विवाह की यादगार के साथ-साथ, भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए मिला, एक विश्वास भी था। यह अनुपम उपहार, पूरे एक वर्ष तक उनका साथ देने वाला था।