Thursday, April 9, 2026

मोमो और गहने!

"मेरे सारे गहने कहां चले गए?" सरिता अलमारी के लॉकर को हैरानी से देखते हुए बोल उठी। उसने अपने पति अनिल को बुलाया और लॉकर दिखाते हुए बोली, "मेरे गहने तुमने लिए हैं क्या?"

 "नहीं!" अनिल ने कहा, "मैंने तो कोई गहने नहीं लिए।"

 "तो फिर मेरे गहने कहां चले गए? कहीं मैंने किसी और जगह तो अपने गहने नहीं रख दिए?"

 सरिता ने पूरा घर अच्छी तरह देख लिया। कपड़ों की अलमारी, रसोई घर के सभी शेल्फ, स्टोर हाउस यहां तक की बाथरूम भी लेकिन कहीं पर भी उसके गहने नहीं मिले। अनिल भी बहुत हैरान हुआ।

   "गहने कौन निकल सकता है? कहीं तुमने ही तो निकाल कर कहीं और नहीं रख दिए गहने? गए तो कहां गए?"

 तभी उनका बेटा संदीप घर वापस आ गया। वह खेलने के लिए बाहर गया हुआ था। सरिता ने संदीप से भी पूछा, "संदीप! मेरे लॉकर में मेरे गहने रखे हुए थे। वह नहीं मिल रहे हैं। क्या तुम्हें उनके बारे में कुछ मालूम है? तुमने घर में कहीं देख मेर मेरे गहने?"

 संदीप 5-6 वर्ष का एक अबोध बालक था। उसे मोमो खाने का बहुत शौक था। वह रोज ही मोमो खाना चाहता था। लेकिन सरिता उसे रोज मोमो खाने के लिए पैसे नहीं देती थी। वह मोमो की दुकान पर जाता, तो मोमो वाला उसे कभी-कभी मुफ्त में ही मोमो खिला देता था। एक दिन मोमो वाले ने कहा कि तुम्हें अनलिमिटेड लाइफटाइम मोमो मिलेंगे।

 यह सुनकर संदीप बहुत प्रसन्न हो उठा। उसने कहा, "ऐसा कैसे हो सकता है ?"

मोम वाला बड़े प्यार से संदीप से बोला, "बेटा! ऐसा हो सकता है। तुम्हें बस यह करना है कि अपने घर रखे हुए मम्मी के गहने मुझे दे जाओ।"

 संदीप अपने घर आया। उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया। उसने चुपचाप लॉकर से गहने निकाले और मोमो वाले को दे दिए। मोमो वाले ने उसे बहुत सारे मोमो दिए। उसने मन भर कर मोमो खाए और किसी को कुछ भी नहीं बताया। लेकिन अगले दिन जब वह मोमो वाले के पास गया, तो उसने पाया कि वहां मोमो वाला था ही नहीं। फिर वह दो-तीन दिन तक उसके पास जाता रहा। लेकिन मोमो वाला वहां वापस नहीं आया। वह निराश हो गया। लेकिन उसने घर में कुछ भी नहीं बताया।

अब गहनों की तलाश हो रही थी। उसकी मां उसे अपने गहनों के बारे में पूछ रही थी। तब उसे लगा कि उसे गहनों के बारे में सब कुछ सच-सच बता देना चाहिए।  उसने सारी बात अपने माता-पिता को बता दी। अनिल उसके साथ वहां गया, जहां वह रोज मोमो खाता था। वहां पर कोई भी नहीं था। आस-पास पूछने पर पता चला कि वह कई दिन पहले से वहां से गायब है। यह भी पता चला कि वह आसपास की ही किसी झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में रहता है।

 जब अनिल उसके झुग्गी ढूंढते हुए वहां पहुंचा, तो पता चला वह झुग्गी बेचकर कहीं चला गया है। वे दोनों बहुत निराश हुए। पर अब कर ही क्या सकते थे? संदीप बहुत अधिक दुखी हुआ। उसने अपने पिता से कहा कि उसने बहुत गलत काम किया है। आगे से वह ऐसा कभी भी नहीं करेगा। लेकिन अब गहने तो वापस नहीं आ सकते थे। 

अनिल ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस वाले भी बहुत अधिक हैरान हुए। उन्होंने अनिल को आश्वासन दिया कि वे मोमो वाले को ढूंढने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन वे आश्चर्य चकित थे, कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतनी तुच्छ वस्तु के लालच में आकर, एक अबोध बच्चे ने अपनी मां के सारे गहने मोमो वाले के हाथ में थमा दिए!


Saturday, March 28, 2026

वासनाएं (desires)

 न जातु काम: कामानाम उपभोगेन शाम्यति

 हविषा कृष्णवर्तमा इव भूय एव अभिवर्धते

विभिन्न प्रकार की इच्छाएं अथवा वासनाएं भोगने से शांत नहीं होतीं; बल्कि और अधिक बढ़ती ही चली जाती हैं। ठीक इसी प्रकार, जिस प्रकार कि अग्नि में घी डालने से आग की लपटें बुझती नहीं, वरन और अधिक तीव्र हो जाती हैं।

 इन्हें नियंत्रित करने के लिए आत्म संयम और विवेक की आवश्यकता है। यद्यपि यह बहुत दुष्कर कार्य है। लेकिन निरंतर अभ्यास करते रहने पर, हम अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

Monday, March 23, 2026

स्वयं की खोज!

 मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया

 जो कुछ अपने पास है, वह धन किसी का है दिया।


 देने वाले ने दिया, वह भी दिया, किस शान से!

 'मेरा है!' यह पाने वाला, कह उठा अभिमान से

 मैं, मेरा, यह कहने वाला, मन किसी का है दिया।


 जो मिला है वह, हमेशा पास रह सकता नहीं

 कब बिछुड़ जाए यह; कोई राज कह सकता नहीं

 जिंदगानी का दिया, मधुबन किसी का है दिया।


 जग की सेवा; खोज अपनी; प्रीति उनसे कीजिए

 ज़िंदगी का राज़ है यह, जानकर जी लीजिए

 साधना की राह में, साधन किसी का है दिया।


Wednesday, February 25, 2026

दैवी संपदा!

 अभयम्, सत्त्वसंशुद्धि:, ज्ञानयोगव्यवस्थिति:

 दानम्, दम: च, यज्ञः च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम्


अहिंसा, सत्यम्, अक्रोध:, त्याग:, शांति:, अपैशुनम्

 दया भूतेषु,  अलोलुप्त्वम्, मार्दवम्,  ह्री, अचापलम्


तेज:, क्षमा, धृति:, शौचम्, अद्रोह, न अतिमानिता  

भवन्ति संपदम् दैवीम्, अभिजातस्य भारत!

Monday, January 26, 2026

याचना

इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए 

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए


जीवन की टेढ़ी राहों में, 

चलकर न तुझको जान सका

आशाओं की झोली भर जाए, इक तेरा द्वारा मिल जाए 


मैं दीन हूं, दीन दयाल है तू

अल्पज्ञ हूं मैं, सर्वज्ञ है तू 

अज्ञान का पर्दा हट जाए, तेरा उजियारा मिल जाए


मैं नर हूं, तुम नारायण हो 

इतना तो भेद ज़रूरी है 

यदि शरण तेरी मैं आ न सका, नर तन तो दोबारा मिल जाए 


इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए

Friday, January 23, 2026

कटहल का कमाल!

 देवदत्त एक कॉलेज में प्रोफेसर था। उसका कॉलेज बहुत दूरी पर था। सवेरे जब भी वह अपने कॉलेज के लिए जाता तो रास्ते में उसके प्रिंसिपल अभिषेक भी उसके साथ ही बैठकर कॉलेज तक चले जाते। प्रिंसिपल अभिषेक का घर बीच रास्ते में ही था। इसीलिए वे लगभग प्रतिदिन देवदत्त के साथ ही कॉलेज में जाते थे। देवदत्त को भी इसमें कोई आपत्ति न थी। उसे तो कॉलेज जाना ही होता था।

 देवदत्त का बहुत बड़ा सा घर था। उसमें तरह-तरह के पेड़ भी लगे हुए थे। नारियल के, नींबू के, आम के, केले के और एक बड़ा सा कटहल का पेड़ भी था। कटहल के पेड़ में बहुत कटहल आते थे; जिन्हें देवदत्त की मां कल्पना आस पड़ोस में बांट देती थी। लेकिन कोई कल्पना की मर्ज़ी के बिना कटहल ले जाए, तो उसे बहुत बुरा लगता था।

 एक बार ऐसा हुआ कि देवदत्त के पिता श्यामा प्रसाद बहुत बीमार हो गए। उनका बहुत इलाज़ कराया, लेकिन श्यामा प्रसाद बच न सके। उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए देवदत्त के कॉलेज से भी सभी प्रोफेसर आए। प्रिंसिपल अभिषेक भी साथ ही आए। थोड़ी देर के बाद सभी प्रोफेसर चले गए। 

प्रिंसिपल साहब कुछ अधिक देर तक वहीं बैठे रहे। उन्होंने देवदत्त के घर में सभी पेड़ों को देखा। उन्हें कटहल का पेड़ विशेष रूप से बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद प्रिंसिपल साहब भी अपने घर चले गए।

 एक दिन ऐसे ही कार में साथ-साथ जाते समय प्रिंसिपल साहब ने देवदत्त से पूछा, "इस कटहल के पेड़ में तो बहुत कटहल आते होंगे?"

 देवदूत ने कहा, "हां। जब मौसम होता है तो यह कटहल से भर जाता है।"

 प्रिंसिपल साहब कुछ अलग मिजाज़ के ही व्यक्ति थे। वे कंजूस भी थे और थोड़े लालची भी! तभी तो वे रोज देवदत्त के साथ ही कार में अपने कॉलेज जाया करते थे। अब उन्हें यह पता चल गया था कि देवदत्त के घर कटहल का पेड़ है। उन्हें कटहल पसंद भी बहुत थी।

 उन्होंने कहा, "देवदत्त! जब भी तुम्हारे पेड़ में कटहल आए तो मुझे अवश्य देना।" देवदत्त ने सहर्ष सहमति दे दी। 

 कटहल का मौसम आने पर देवदत्त एक बोरा भरकर कटहल प्रिंसिपल साहब के लिए ले आया। देवदत्त की मां कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे तो प्रिंसिपल साहब वैसे भी बहुत पसंद नहीं थे। इस पर उन्होंने जबरदस्ती ही कटहल भी मांग लिए थे। देवदत्त ने भी पूरा बोरा भरकर उन्हें कटहल दे दिए थे।  वह इस बात से बहुत परेशान थी। 

 कल्पना को यह समझते देर न लगी, कि अब प्रिंसिपल साहब के पास, हर बार ही कटहल का एक बोरा ज़रूर जाया करेगा। कल्पना ने सोचा, कि देवदत्त को अगर मना किया गया, तो भी वह रुकेगा नहीं। वह प्रोफेसर साहब को कटहल अवश्य देगा। वह उनको कटहल न दे, इसके लिए प्रिंसिपल साहब से देवदत्त के मन की दूरी बनाना आवश्यक था। इसीलिए उसने देवदत्त को प्राय: यह कहना शुरू कर दिया, कि ये प्रिंसिपल साहब अपनी गाड़ी में क्यों नहीं जाते? यह रोज़ तुम्हारे साथ ही क्यों कॉलेज जाते हैं? 

पहले तो देवदत्त ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपनी मां की बात प्रतिदिन सुनते-सुनते, धीरे-धीरे उसे स्वयं भी लगने लगा, कि प्रोफेसर साहब हर रोज़ उसके साथ जबरदस्ती ही जाते हैं। उसे भी यह बात खटकने लगी। अब रोज़-रोज़ प्रोफेसर साहब को अपने साथ ले जाना उसे भार की तरह लगने लगा। 

अब उनसे पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे? उन्हें मना तो किया नहीं जा सकता था। उसे एक तरकीब सूझी। उसके घर से कॉलेज बहुत दूर पड़ता था। पेट्रोल का भी काफी खर्च आता था। इसीलिए उसने सोचा कि कॉलेज के अंदर ही जो सरकारी क्वार्टर हैं; उसी में वह रहना शुरू कर देगा। इससे पेट्रोल का खर्चा भी बचेगा और प्रिंसिपल से भी छुटकारा मिलेगा। जितना उसका मकान किराया भत्ता कटेगा, उतने का तो पेट्रोल ही खर्च हो जाता था।

 उसने तुरंत सरकारी क्वार्टर के लिए आवेदन कर दिया। उसको मकान मिल भी गया। उसने घर जाकर प्रसन्नता से अपनी मां कल्पना को बताया कि अब हम सरकारी क्वार्टर में रहेंगे। प्रिंसिपल अब मेरे साथ नहीं जाया करेंगे। यह झंझट खत्म हुआ। 

लेकिन मां कल्पना को यह बात सुनकर, तनिक भी खुशी नहीं हुई। उसे तो अपने मकान में ही रहना था। उसे सरकारी मकान में नहीं जाना था। 

उसने कहा,"नहीं। हम अपने मकान में ही रहेंगे। सरकारी मकान में क्या करेंगे जाकर? जब अपना मकान इतना अच्छा है। तो इसे क्यों छोड़ेंगे?"

 लेकिन देवदत्त ने कहा, "मां! एक तो प्रिंसिपल साहब से छुटकारा मिल जाएगा। और दूसरा मकान से कॉलेज की बहुत अधिक दूरी है। तो समय भी बचेगा और पेट्रोल भी। इसीलिए हम सरकारी मकान में ही रहेंगे।"

 घर का सामान शिफ्ट होते समय कल्पना सोच रही थी, "इससे अच्छा तो यह था कि भले ही प्रोफेसर साहब हर साल एक बोरा कटहल ले लेते, लेकिन कम से कम हम अपने मकान में तो रहते!"

केवल कटहल के कारण कितना बडा कमाल हो जाएगा; यह तो कल्पना की कल्पना में भी नहीं था!

Saturday, December 27, 2025

सिर की खुश्की

 सर्दियों के मौसम में प्रायः सिर में खुश्की हो जाती है। इसके कारण सिर में खुजली भी होती रहती है। सिर की खुश्की को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय है, एलोवेरा का जैल! एलोवेरा का जैल सिर में लगाने से सिर की खुश्की पूरी तरह से दूर हो जाती है।

 एलोवेरा जेल में एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टी होती है। यह सिर की त्वचा के संक्रमण को पूरी तरह नष्ट कर देता है और साथ ही यह सिर में नमी भी बनाए रखता है। 

एलोवेरा जैल को सिर में मलकर पन्द्रह मिनट तक रहने दें। इसके बाद सादे पानी से सिर को अच्छी तरह से धो लें। इससे सिर की खुश्की दूर हो जाएगी और बाल भी मुलायम रहेंगे।