Saturday, March 28, 2026

वासनाएं (desires)

 न जातु काम: कामानाम उपभोगेन शाम्यति

 हविषा कृष्णवर्तमा इव भूय एव अभिवर्धते

विभिन्न प्रकार की इच्छाएं अथवा वासनाएं भोगने से शांत नहीं होतीं; बल्कि और अधिक बढ़ती ही चली जाती हैं। ठीक इसी प्रकार, जिस प्रकार कि अग्नि में घी डालने से आग की लपटें बुझती नहीं, वरन और अधिक तीव्र हो जाती हैं।

 इन्हें नियंत्रित करने के लिए आत्म संयम और विवेक की आवश्यकता है। यद्यपि यह बहुत दुष्कर कार्य है। लेकिन निरंतर अभ्यास करते रहने पर, हम अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

Monday, March 23, 2026

स्वयं की खोज!

 मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया

 जो कुछ अपने पास है, वह धन किसी का है दिया।


 देने वाले ने दिया, वह भी दिया, किस शान से!

 'मेरा है!' यह पाने वाला, कह उठा अभिमान से

 मैं, मेरा, यह कहने वाला, मन किसी का है दिया।


 जो मिला है वह, हमेशा पास रह सकता नहीं

 कब बिछुड़ जाए यह; कोई राज़ कह सकता नहीं

 जिंदगानी का दिया, मधुबन किसी का है दिया।


 जग की सेवा; खोज अपनी; प्रीति उनसे कीजिए

 ज़िंदगी का राज़ है यह, जानकर जी लीजिए

 साधना की राह में, साधन किसी का है दिया।