"भिक्षाम देहि!" दरवाजे पर यह आवाज सुनकर नंदी देवी ने जब दरवाजा खोला तो पाया कि सामने 61 वर्षीय लंबी दाढ़ी वाला साधु खड़ा था। उस साधु ने पुनः कहा,"मां! भिक्षाम देहि।"
लगभग 46 वर्ष पहले पिथौरागढ़ बागेश्वर बॉर्डर से, एक 15 साल का किशोर, गांव छोड़कर चला गया था। उसको ढूंढने के सभी प्रयत्न असफल रहे थे। कुछ वर्षों बाद उसके पिता का भी देहांत हो गया था। उसका कुछ कुछ भी पता न चल पाया था।
वास्तव में बुद्धि बल्लभ उपाध्याय नाम का एक लड़का अपने घर को छोड़कर चला गया था। उसने कुछ समय ट्रकों और दूसरे वाहनों में कुछ मजदूरी की। बाद में वह एक बीकानेर के एक मंदिर में चला गया। वहां उसने नाथ संप्रदाय को अपना लिया। अब उसका नाम बुद्ध नाथ हो गया। अपने गुरु से दीक्षा ली और वहीं रहने लगा। उसने संन्यास को अपना लिया। 4 वर्ष पहले उसके आध्यात्मिक गुरु की भी मृत्यु हो गई थी। मरने से पहले उन्होंने कहा था कि तुम्हारा संन्यास तभी पूर्ण हो पाएगा जब तुम अपनी माता से भिक्षा लेकर आओगे।
आज बुद्धनाथ अपनी माता के सामने खड़ा था। वह झोली फैला कर भिक्षा मांग रहा था। माता को जब सब कुछ पता चला तो उसकी आंख से टप-टप आंसू बहने लगे। उसने अपने बेटे को गले लगा लिया। बुद्ध नाथ ने माता के पैर छुए और उनको कहा कि वह उन्हें भिक्षा दे दें। जिससे कि उनका संन्यास धर्म पूरा हो सके और वह पूरे संन्यासी बन सके।
माता ने बहुत अनुग्रह किया कि वह गांव में ही रुक जाए और अपनी माता के पास रहे। लेकिन बुद्ध नाथ ने कहा कि वह संन्यासी बन चुका है और वह गांव में नहीं रहेगा। वह तो बीकानेर के मंदिर में ही रहेगा। हां, अगर कभी माता उससे मिलना चाहती हैं; तो वह बीकानेर के मंदिर में ही आ सकती हैं।
मां का रो-रो कर बुरा हाल था। इतने वर्षों के बाद पुत्र आया तो वह भी किसी रूप में! लेकिन बुद्ध नाथ के बार-बार भिक्षा मांगने पर माता ने भंडार गृह से थोड़ा अनाज लाकर बुद्ध नाथ की झोली में डाल दिया। बुद्ध नाथ ने वह अनाज अपनी झोली में लिया। फिर विरक्त भाव से वह मुंह मोड़कर वापस चला गया।
गांव वाले यह सब दृश्य देख रहे थे। उनकी भी आंखों में आंसू थे। परन्तु वे माता को समझा रहे थे, "देख! तेरा पुत्र कितनी महान आत्मा है! वह संन्यासी बन गया; यह तो अपने गांव के लिए बड़ी गर्व की बात है।"
माता सब कुछ समझ रही थी। लेकिन वह अपने आंसुओं का क्या करें? वे तो किसी भी तरह थम ही नहीं रहे थे।
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