Sunday, May 10, 2026

कबाड़ में कनक!

 कुंती का बहुत मन था कि वह भी कुंभ के मेले में जाकर स्नान कर आए। लेकिन उसके पति राम दास को समय ही नहीं मिलता था। वह बिजली का मिस्त्री था और आसपास के सभी लोग उससे ही अपना काम करवाते थे। रामदास इतना कुशल था कि उसके अलावा किसी और से, वे काम करवाना पसंद नहीं करते थे। 

एक दिन कुंती ने अपने मन की बात रामदास के सामने रख दी। रामदास ने कहा, "मन तो मेरा भी बहुत था। लेकिन फुर्सत ही नहीं मिल रही।"

 कुंती के बहुत आग्रह करने पर रामदास ने कहा, "ठीक है। दो-चार दिन का समय निकालकर चलते हैं। बार-बार यह समय थोड़े ही आता है।"

 कुंभ के स्नान पर जाने से पहले उन्होंने सभी तैयारियां कर ली। कुंती के कुछ गहने भी अलमारी में रखे हुए थे। रामदास ने कहा "कहीं ऐसा न हो कि पीछे से कोई चोर घर में घुस आएं और ये गहने चुरा ले जाएं। तुम ऐसा करो कि उन गहनों को कहीं और छिपा दो।"

 कुंती ने कहा, "ऐसी कौन सी जगह हो सकती है जहां इन गहनों को छुपाए और चोरों को पता भी न लगे?"

 रामदास को एक विचार सूझा। उसने अखबारों की रद्दी में गहनों की एक पोटली बनाकर छिपा दी। उसने सोचा कि वापिस आकर, इन गहनों को दोबारा अलमारी में रख देंगे।

अगले दिन वे कुंभ स्नान के लिए चले गए। तीन-चार दिन बाद जब वे वापिस घर लौट कर आए तो अपने कामों में व्यस्त हो गए। उन गहनों की पोटली के बारे में तो वे भूल ही गए।

 दीवाली का समय पास आ रहा था। कुंती और रामदास घर की सफाई में व्यस्त थे। रामदास ने कहा, "घर का व्यर्थ का सामान फेंक देना चाहिए। जो चीज रद्दी में बेची जा सकती है उन्हें मैं कबाड़ में बेच आता हूं।" 

घर का सारा कबाड़ इकट्ठा करके वह रद्दी वाले को बेच आया। उन्हें यह याद ही नहीं रहा कि अखबारों के बीच में उनकी गहनों की पोटली भी रखी है। 

कई महीने बीत गए। एक दिन कुंती को किसी विवाह में सम्मिलित होना था। उसने गहने पहनने के लिए अलमारी खोली और उसमें से गहने निकालने लगी। लेकिन उसमें तो गहने थे ही नहीं। फिर उसे याद आया कि कुंभ जाते समय उन्होंने गहनों की पोटली अखबार की रद्दी में रख दी थी। उसने रामदास को बताया कि गहने तो अखबार की रद्दी के साथ कबाड़ वाले के पास ही चले गए हैं। रामदास तुरंत लपककर कबाड़ वाले के पास दौड़ा। उसने कबाड़ वाले से पूछा, "कहीं मेरे अखबारों की रद्दी में, तुमने मेरे गहनों की पोटली तो नहीं देखी?"

कबाड़ वाले रहमत मियां अपनी दुकान पर कबाड़ तुलवा रहे थे। चश्मे से झांकते हुए उन्होंने रामदास को देखा और पूछा, "कौन से गहने?"

 रामदास ने कहा, "मैंने छः सात महीने पहले आपको अखबारों की रद्दी बेची थी। गलती से उसी में मेरे गहनों की पोटली भी रखी हुई थी। अगर आपको वह गहनों की पोटली मिली हो तो कृपया उसे वापस कर दें। वह मेरे गहनों की पोटली है।"

रामदास को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि इन्हें गहनों की वह पोटली मिली होगी। उसने तो ऐसे ही पूछ लिया था। लेकिन वह हैरान हुआ, जब रहमत मियां बोले, "अच्छा! तो वह पोटली तुम्हारी है।"

 वह सकपका गया और हैरान होकर उसने जवाब दिया, "हां। क्या आपको वह पोटली मिली है? वह मेरी ही है!"

हुआ यह, कि एक दिन, रहमत मियां अपनी कबाड़ की दुकान में मुआयना कर रहे थे कि कौन सा कबाड़ किस तरफ रखना है। अचानक उनकी नजर एक छोटी सी पोटली पर गई। उसके अंदर कुछ रखा हुआ प्रतीत हो रहा था। उन्होंने पोटली खोली तो पाया कि उसमें कुछ गहने थे। उन्होंने सोचा कि शायद कबाड़ में किसी के नकली गहने इस पोटली में आ गए हैं। तभी तो मजदूरों ने भी यह पोटली एक तरफ रख दी है। लेकिन गहनों की तरफ नजर डालते हुए उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद ये गहने नकली नहीं है। ये तो असली सोने के प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा सोचकर उन्होंने वह पोटली अपने कुर्ते की जेब में रख ली।  उन्होंने सोचा कि दुकान बंद करने के बाद वे सुनार के पास जाएंगे और इस पोटली के गहनों की जांच करवा लेंगे।

 दुकान बंद करने के बाद जब वे घर की ओर गए तो रास्ते में एक सुनार की दुकान पर रुक कर उन्होंने उसे गहने दिखाए। और पूछा कि गहने नकली है या असली? 

"ये गहने तो शुद्ध सोने के हैं।" 

"अच्छा तो ये नकली नहीं है?"

 "नहीं। नहीं। असली सोने के गहने हैं!" यह कहते हुए सुनार ने हंसते हुए पूछ ही लिया, "क्या यह भी कबाड़ में बिकने के लिए आए थे?"

 रहमत मियां भी हंसते हुए बोले, "हां। ये कबाड़ के बीच में ही तो मिले हैं। इन्हें संभाल कर रख लूंगा। क्या पता किसी को याद आए और वह अपने गहने मांगने के लिए मेरे पास आए।"

सुनार ने भी कहा, "हां इन्हें संभाल कर रखिएगा यह असली सोना है।"

अब रामदास उन गहनों के बारे में पूछने आया, तो रहमत मियां को वह पोटली याद आ गई। उन्होंने उसे अपने घर में अच्छी तरह संभाल कर रखा हुआ था। 

उन्होंने रामदास को कहा, "तुम बिल्कुल निश्चिंत रहो। वह गहनों की पोटली मेरे पास संभली हुई रखी है।"

 रामदास की तो जान में जान आई। वह हैरान भी था और प्रसन्न भी! वह बार-बार रहमत मियां को धन्यवाद दे रहा था। रहमत मियां तो कह रहे थे, "भाई! मेरा धन्यवाद किस बात का? उस खुदा को धन्यवाद करो। शायद उन्होंने ही मेरी नज़र तुम्हारी गहनों की पोटली पर पड़वा दी और मैंनें तुम्हारे गहने संभाल कर रख लिए।" 

रामदास बहुत शुक्रगुजार था; भगवान का भी, और रहमत मियां का भी! 

आखिर कबाड़ में खोया हुआ कनक जो उसे वापिस मिल गया था!

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