Sunday, July 31, 2011

स्वागतम ! स्वागतम!



पुष्प गुच्छ में नव कलिका ने,   
शोभावृद्धि अपार बढाई .
सुख सौरभमय कर कुल अपना , 
हर्ष लहर अनुपम पहुंचाई .
दृग युगल उद्दीप्त हो उठे ,
छायाचित्र छवि जब निरखी.
नन्हे से ओ हीरे तुमसे ,
बढे प्रतिष्ठा पूरे कुल की !  

Saturday, July 30, 2011

नरेले के वो दिन(6)





 माँ ने नानी के घर भी चक्की पर घर में गेहूँ पीसकर आटा इस्तेमाल किया था और दादी के यहाँ भी वे चक्की चलाती ही रही थी . उन्हें नरेले में भी लगा कि घर में पिसा आटा ही खाना चाहिए . इसीलिए बाउजी के साथ जाकर वे खादी ग्रामोद्योग से हाथ की चक्की ले आईं . मुझे अब तक याद है कि चक्की सत्रह रूपये की थी . माँ और बाउजी कह रहे थे कि ज्यादा महंगी नहीं है . माँ को वह गाँव की चक्की से अधिक  पसंद आई थी . तो रोज़ सवेरे माँ उस पर गेहूँ पीसती थी . घर का पिसा आटा थोडा मोटा होता है . रोटी बनाने के आधे घंटे पहले गूंधकर रख देना होता है. परन्तु रोटी बहुत स्वादिष्ट बनती हैं . माँ हमेशा साथ में चने का आटा भी पीसती थी . हमारे घर हमेशा मिस्सी रोटी ही बनती थी. साल में अगर दो क्विटल गेहूँ आए तो कम से कम बीस किलो चने भी आते थे . 
                      दिल्ली के मकान में आने के बाद भी माँ कुछ वर्षों तक हाथ की चक्की का पिसा आटा ही खिलाती रही . चनों को चक्की पर दलकर दाल बना लेती थी . गेहूँ  को मोटा पीसकर दलिया बना लेती थी . पहले तो बाज़ार में नमक की भी डलियाँ मिलती थी . तो माँ नमक भी चक्की से ही पीसकर रख देती थी . तरी वाली सब्जी में नमक की डलियाँ डालते और सूखी सब्जी में पिसा हुआ नमक . जब कोई व्रत का त्यौहार होता तो माँ कुट्टू भी चक्की से पीसती और फिर उसका आटा इस्तेमाल करती . मुझे याद है झज्झर में माँ और नानी मिलकर चक्की पीसती और साथ में भजन भी गाती रहती थी . पर यहाँ तो वे अकेली ही पीसती थी . कभी कभार मैं भी माँ के साथ लग जाती . कभी कभी तो मैंने स्वयं चक्की चलाने का प्रयत्न किया . बड़ा ही दुस्तर कार्य है . मैं तो चंद मिनटों में ही थक जाती थी . 
                    सावन के दिनों में नरेले में बाहर बरामदे में एक खाट पर चादर बिछाकर माँ जवे(vermicelli) तोडती थी . मैदा को बहुत सख्त गूंध कर  गीले कपडे से ढक देती थी . फिर थोड़ी मैदा की गोली को दोनों हथेलियों के बीच दबाते हुए  लम्बी सी लड़ी बनती और फिर उस लड़ी को एक हथेली में पकड़कर दूसरे हाथ की बीच वाली अंगुली और अंगूठे की मदद से जवे तोडती जाती . माँ के जवे बहुत बढ़िया टूटते थे . सबकी एकसी मोटाई और एकसी लम्बाई होती थी . मैंने तो कई बार प्रयत्न किया . परन्तु मेरे जवे कोई मोटे कोई छोटे और विकृत ही बनते हैं . मेरी तो अंगुली और अंगूठा चिपक जाते हैं जवे बनाने में . परन्तु माँ तो बिना अंगुलियाँ चिपकाए चुस्ती से जवे बनाती थीं   
                        शाम तक जवे सूख जाते थे .तो उन्हें इकट्ठा करके रख लेते थे . उन्हें कढाई में सूखा भूनकर संग्रहित कर लेते थे . रक्षाबंधन की पूर्वसंध्या पर मुख्य द्वारों पर परमात्मा के प्रतीक चिन्ह बनाते ; जैसे राम -राम , ओउम या स्वास्तिक का चिन्ह . रक्षाबंधन की सुबह सबसे  पहले प्रभु के प्रतीक चिह्नों पर तिलक करके उनको नए बने हुए जवों का भोग लगाया जाता था . उसके बाद भगवान के प्रतीक चिन्हों पर, प्रथम राखी जो कि मौली की होती थी ; चिपका दी जाती थी . उसके बाद रक्षाबंधन का उत्सव मनाते और जवों की खीर खाते . इस दिन की मुख्य मिठाइयाँ  घेवर और फैनी ही होती थी .


स्लेट और सलेटी



 नरेले के स्कूल में हम बच्चों का बस्ता हल्का ही होता था. चार छोटी कापियाँ, चार छोटी पुस्तकें और एक स्लेट हुआ करती थी . साथ में तख्ती हाथ में ले जाते थे . उस समय कापी और पेपर पर काम कम करवाया जाता था . विद्यालय में ज्यादातर काम स्लेट और सलेटी की मदद से होता था . चाहे गणित के प्रश्न करने हों , या श्रुतलेख लिखना हो , या प्रश्नों का उत्तर लिखकर दिखाना हो ; सभी काम स्लेट पर ही करते थे . साथ में एक स्पंज का टुकड़ा गीला करके अपने पास रखते थे . अध्यापिका को स्लेट पर काम करके दिखाते और तुरंत स्पंज से मिटा देते . खाली समय में स्लेट पर चित्र भी बनाते रहते थे . या स्लेट पर जीरो , काटा खेलते रहते थे .
             स्लेट काले रंग का पतला सपाट चोकोर आयताकार पत्थर होता था जिसके चारों तरफ लकड़ी का चोखटा बना हुआ होता था . सलेटी सफ़ेद रंग का पतला सा लिखने के लिए होता था . जैसे चाक, जिससे ब्लैक बोर्ड पर लिखते हैं , मोटा होता है और भुरभुरा होता है . सलेटी काफी पतली और सख्त होती थी . तभी तो स्लेट पर कटाकट चलती थी . लिखते समय टक टक की आवाज भी आती थी . अगर आजकल भी स्लेट और सलेटी का प्रयोग हो तो पेपर बनाने के लिए इतने पेड़ न काटने पड़ें .

Friday, July 29, 2011

करेला !(bitter gourd)

करेला  कड़वा भले ही हो ; लेकिन दिव्य गुणों से परिपूर्ण है . 
सिरदर्द में इसकी पत्तियों को पीसकर  माथे पर लगायें . मुंह के छालों के लिए पत्तियों का रस छालों पर लगाकर लार बाहर निकाल दें . करेले का रस भी यही काम करेगा .इससे मुंह के छाले ठीक हो जायेंगे. कब्ज़ के लिए करेले की सब्जी खाएं . 
बहुत छोटे बच्चे के  पेट में अफारा हो तो इसकी एक बूँद रस बच्चे की जीभ पर डालें ; इसमें शहद भी मिला सकते हैं . 

पेट के कीड़ों  के लिए 50 से  100 मि० ली० करेले का रस सवेरे खाली पेट लें. यह देखा गया है कि कीड़े मारने की दवाइयाँ खाने से साइड इफैक्ट्स तो होते ही हैं ; कई बार पेट के कीड़े भी पूरी तरह समाप्त नहीं होते . लेकिन 50 मी० ली० करेले का रस चार पांच दिन खाली पेट सवेरे सवेरे ले लिया जाए ,तो पेट के कीड़े तो मर ही जाते हैं ;कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता .
हाँ इसकी मात्रा इससे ज्यादा नहीं लेनी चाहिए . ज्यादा मात्रा में इसका रस दस्त लगा सकता है. इसके  रस से बवासीर की शिकायत भी दूर होती है . 
मधुमेह के लिए एक खीरा एक टमाटर और एक करेला और  दो चार नीम दो चार सदाबहार के पत्ते व फूल का जूस निकालें  और सवेरे खाली  पेट लें . 
अगर  सोंठ, पीपल,और  काली मिर्च को करेले के जूस के साथ मिलकर लिया जाए तो लीवर ठीक होता है  पीलिया भी ठीक होता है . इसका थोडा सा रस खाली पेट ले लिया जाए तो त्वचा सम्बन्धी विकार भी नहीं होते 
 खाज व खुजली में  नीम का रस और करेले का रस  मिलाकर खाल पर मालिश की जाए तो आशातीत सफलता मिलती है . 

करेले के सब्जी नियमित रूप से लेने पर  नई माताओं को भरपूर दूध आता है ; साथ ही गर्भाशय की सूजन और संक्रमण से छुटकारा मिलता है . इसकी सब्जी खाने से इससे जोड़ों के  दर्द में भी लाभ होता है . फोड़ा न पके तो इसकी जड़ घिसकर फोड़े पर लगा दें . फोड़े की पस निकल जाएगी .  
पथरी के लिए भी इसका थोड़ी मात्रा में रस खाली पेट लिया जा सकता है .कच्चा करेला भूनकर यदि घुटनों पर बांधा जाए तो जोड़ों के दर्द से आराम मिलता है 
    करेला कड़वा है ; परन्तु इसके सभी गुण मीठे हैं !   

Wednesday, July 27, 2011

नरेले के वो दिन (4)

पन्द्रह अगस्त के दिन विद्यालय में होने वाले समारोह के लिए जोर शोर से तैयारियां हो रही थी . ग्यारहवीं कक्षा की छात्राएं " कौमी तिरंगे झंडे , ऊंचे रहो जहाँ में . हो तेरी सर बुलंदी ,ज्यों चाँद आसमाँ में ." नामक देशभक्ति गीत की तैयारी कर रही थीं। 
मेरा मन था कि में भी इसमें हिस्सा लूं . मैं तृतीय कक्षा में प्रथम आई थी . कक्षाध्यापिका मुझे बहुत प्यार करती थी . मैंने उनसे यह इच्छा ज़ाहिर की। उन्होंने सुझाव दिया कि "हंस किसका" नामक नाटक का मंचन करें, तो समारोह में हिस्सा लिया जा सकता है। मैं उसमें सिद्धार्थ बनी और एक और लड़की देवदत्त.
              अध्यापिका ने खूब अभ्यास कराया . माँ ने मेरे लिए एक नई पोशाक सिली ; जिससे की मैं सिद्धार्थ नज़र आऊँ . परन्तु  निश्चित दिन से एक दिन पहले ही संयोजक ने हमारी अध्यापिका को बताया की कार्यक्रम बहुत अधिक हो गए हैं . अत: हमारा कार्क्रम रद्द करना पड़ेगा . 
                  उस दिन बहुत मायूसी हुई . यद्यपि अध्यापिका ने पूरा विश्वास दिलाया कि इसे फिर कभी प्रस्तुत करेंगे ; फिर भी उस दिन मैं उदास ही रही . बाद में तो मैं सब भूल गई थी .
          मेरी कक्षा में पंजाबी लड़कियां तो थी ही ; कुमाऊँ की भी पांच या छ: लड़कियां थी . किसी समारोह में उन्होंने इस गाने पर नृत्य किया ,"बेडू पाको बारो मासा ; नारेन काफल पाके चैता मेरी छैला".
 पता नहीं क्यों ; यह गाना मुझे तभी याद हो गया और अच्छा भी बहुत लगता है . कुछ लोग कहते है कि मैं भी कुमाऊँनी  लगती हूँ .  मैं सोचती हूँ कि शायद यह कोई पुनर्जन्म का चक्कर हो . 
कई वर्षों बाद मुझे बैंगलोर में एक कुमाऊँनी महिला मिली जो कि अपनी डाक्टर बहू की परीक्षा हेतु वहां आई हुई थी . तब मैंने उनसे यह पूरा गीत लिखवाया . उस समय उनके मुख से भी ये बोल मुझे बहुत अच्छे लगे थे।
            हम सभी बच्चों का एक कालांश तख्ती लिखने के लिए होता था . हम सभी सुन्दर सुन्दर लेख लिखते थे . घर आकर भीगी हुई मुल्तानी मिटटी से तख्ती को अच्छी तरह पोतते थे . फिर उसे हाथ में पकड़कर हवा में हिलाते थे। तख्ती हिलाते हुए एक गाना भी गाते थे ;" सूख सूख पट्टी " जब तख्ती सूख जाती तो पेंसिल से उस पर एक तरफ खड़ी लाइनें खींचते और दूसरी तरफ पड़ी लाइनें. खड़ी लाइनों में पहाड़े लिखते थे और पड़ी लाइनों में सुलेख लिखते थे . 
यह रोज़ का काम होता था . एक टिन की छोटी दवात में "राज रोशनाई" की काली स्याही की पुडिया डालते . फिर उसमें थोडा सा पानी डालते . फिर उसमें कलम को दोनों हाथों से पकड़कर गोल गोल घुमाते और गाना गाते " कौआ कौआ ढोल बजा ; चार आने की स्याही ला. आधी तेरी आधी मेरी. तू नहीं ले तो सारी मेरी "  
गाना पूरा होने पर निरीक्षण करते कि स्याही पूरी तरह से गाढ़ी हुई या नहीं. अगर स्याही फीकी हुई तो दोबारा यही प्रक्रिया दोहराई जाती थी. एक बार गाढ़ी स्याही हो जाती, तो लिखने का मज़ा ही आ जाता था।



Monday, July 25, 2011

नरेले के वो दिन ! (3)


             

मैं नरेले के विद्यालय में पढ़ती थी . परन्तु दोनों भाई पढने के लिए दिल्ली में ही आते थे . तब शायद वे नवीं और दसवीं कक्षा में होंगे . बड़े सवेरे माँ उठकर नाश्ता और लंच बनाती. कोई गैस के चूल्हे की सुविधा तो थी नहीं . सर्दियों की कड़कती ठण्ड में माँ अंगीठी जलाती होंगी . उसमें भी वक्त लगता होगा . फिर दूध नाश्ता तैयार करना होता था . और फिर बाउजी दोनों भाइयों को भोर होने से बहुत पहले रेलवे स्टेशन जाकर ट्रेन में चढ़ाकर वापिस आते . ट्रेन में बहुत धक्का -मुक्की होती थी ; ऐसा बाउजी बताते थे . कितना कठिन होता होगा ट्रेन से दिल्ली जाना दोनों भाइयों के लिए ! और उसके बाद दिल्ली स्टेशन से अपने विद्यालय तक सात बजे तक पहुँचना भी कोई आसान न होता होगा . 
         भाइयों को स्टेशन पर छोड़ने के बाद बाउजी अपने जाने की तैयारी करते . माँ मुझे तैयार करके स्कूल भेजती . बाउजी भी ट्रेन से दिल्ली ही आते थे . दिल्ली से वापिस नरेले आकर कितना थक जाते होंगे भाई ! और फिर पूरा पढाई का जोर होता था . जो बच्चे कक्षा में  हमेशा प्रथम श्रेणी में ही सफलता पाते हैं ; उनसे अभिभावक व शिक्षक दोनों ही भरपूर आशा और अपेक्षाएँ रखते हैं . एक बार तो बड़े भाई इतना थक गए कि दिल्ली से वापिस आते समय ट्रेन में उनकी आँख लग गई . जब आँख खुली तो अपने को नरेले से दूर किसी स्टेशन  पर पाया . वहां काफी देर बैठने के बाद वापसी की ट्रेन मिली . उस समय तो फोन की सुविधा भी बहुत ही कम थी . तो जब तक भाई वापिस नहीं लौटे , तब तक माँ और बाउजी कितने चिंतित हुए होंगे, यह समझा जा सकता है 
         मैं तो विद्यालय से वापिस आकर खाना खाती और अपनी चाची की बेटियों के साथ खूब खेलती . घर घर खेलने के लिए छोटे बर्तनों में कच्चे प्याज के बारीक टुकड़े काटकर रख देते . फिर सब्जी पकाने की एक्टिंग करते और सबको दो दो या तीन छोटे प्याज़ के  टुकड़े मिल जाते . सब इसी में ही खुश हो जाते थे . उस समय छोटे बच्चे खेल खेल में जो गाने गाते थे ; वे या तो पुस्तकों की कविताएँ होती थी , या फिर देशभक्ति के गीत . मुझे याद है एक गाना हम बच्चे अक्सर गाते रहते थे ,"छोटे छोटे घूँघरू , बजाने वाला कौन ? धरती माता सो गई जगाने वाला कौन ?" कभी कभी जब महिला मंडल भी इकट्ठा बैठता , तो या तो वे भजन गाती थी ; या भी देशभक्ति का लोक गीत . एक गीत जो मैंने कई बार सुना ,"भारत के वीर, बताऊँ सजनी ! मेरा पी लिया खून, बताऊँ सजनी !" इसका भाव मुझे थोडा बड़ा होने पर समझ में आया की यह बात एक पाकिस्तानी सैनिक अपनी पत्नी से कह रहा है. यह बात मन में आश्चर्य और प्रसन्नता का एक साथ संचार कर देती है कि उस वक्त  हमारा समाज काफी ईश्वरभक्त और राष्ट्रभक्त था. आज के समाज में राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ चली गई , परन्तु ईश्वरभक्ति जरूर विद्यमान है . यह अलग बात है कि मन से ईश्वरभक्ति न रहकर आडम्बर अधिक हो गया है 
              बरसात के दिनों में बहुत मज़े होते थे . छोटे छोटे मखमली लाल रंग के सुन्दर से मक्खी जितने कीट अचानक ही दिखने शुरू हो जाते थे . बरसात में मशहूर तीज का त्यौहार भी आता है . इसलिए इन कीटों को तीज का नाम दिया गया . हम सब सोचते थे कि बरसात में तीज बरसती हैं . हम उनसे खेलते थे . तीज से दस पन्द्रह दिन पहले से ही घरों में झूले डल जाते थे. सब लडकियां खूब झूला झूलती . साथ साथ सावन के गीत भी गाती थी . एक गीत था ,"काले पानी में लम्बी खजूर ; बिजली चम- चम करे " इस गीत के बोल का क्या अर्थ है ; मुझे आज तक समझ नहीं आया . हो सकता है कि यहाँ रूपक अलंकार बाँधा गया हो . खैर सावन की ठंडी सुहावनी हवा में झूले पर जो आनंद आता था, वह कहते नहीं बनता
                                    .और तीज वाले दिन की तो बात ही क्या थी ! सबके हाथों में सुन्दर मेंहदी होती थी . बाज़ार में घेवर और फेनी नाम की विशेष मिठाई इन्ही दिनों मिलती थी .घरों में मीठे गुलगुले और विभिन्न पकवान बनते थे. सभी पेड़ों पर झूले डल जाते थे . और सुन्दर रंग बिरंगी पोशाकों में सजी हुई स्त्रियाँ नई चूड़ियाँ पहनकर झूला झूलती थी . झूलते झूलते मधुर कंठ से वे सुन्दर सुन्दर गीत भी गाती थी . हम बच्चों को भी पेड़ के झूलों पर बैठने का अवसर मिलता पेड़ के ऊपर डला झूला ज्यादा लचकदार होता है . इसलिए ज्यादा लुत्फ़ देता है . नरेले में तो तीज के त्यौहार के बाद भी हम बच्चे हर रोज़ स्कूल से वापिस  आने के बाद ज़रूर झूलते थे .
    



Sunday, July 24, 2011

नरेले के वो दिन !(2)



नरेले में लड़कियों का सरकारी विद्यालय बहुत बड़ा था . प्रथम कक्षा से ग्यारहवीं कक्षा तक की छात्राएं वहां पढ़ती  थी . में अपने चाचाजी की लड़कियों  के साथ स्कूल में जाती थी . चाचाजी की तीन बेटियाँ उसी स्कूल में पढ़ती थी . उनकी दो छोटी बेटियाँ घर पर ही रहती थी . कई बार हम सब बहनें बड़ी मस्ती करते थे . 
                      आधी छुट्टी में लंच खाने के बाद हम सभी विद्यालय से बाहर आ गए . बाहर कीकर का एक बहुत बड़ा पेड़ था . उस पर हरी फलियाँ  पक कर पीलेपन की ओर अग्रसर हो रही थी . ऐसी पकी फलियों में थोडा मिठास आना प्रारम्भ हो जाता है . हम बच्चे इन फलियों के बहुत शौकीन थे . बस हममें से एक चढ़ गई पेड़ पर और तोड़ने  लगी पकी पकी फलियाँ . हम सभी नें खूब कीकर की फलियाँ खाई . तभी मेरी चाची की  बेटी शकुन्तला बोली ,"स्कूल नहीं जाना क्या ? आधी छुट्टी तो ख़तम भी हो गई होगी ." हम सभी स्कूल की तरफ मुड़े तो पाया की कक्षाओं में अध्यापिकाएं आ चुकी हैं . अब तो हम सब बहुत घबराए . अगर कक्षा में गए तो बहुत डांट पड़ेगी . परन्तु हमारे बस्ते तो कक्षाओं में ही थे . अब करें तो क्या करें ? मेरी चाची की बड़ी बेटी बाला नें एक टोटका बताया . उसे भी किसी और बच्चे ने बताया था , या उसने खुद ईजाद किया था ये तो पता नहीं , परन्तु निकला बड़ा कारगर ! उसने कहा सब एक एक छोटी कंकड़ उठाओ और अपने सिर के ऊपर से ले जाकर पीछे की तरफ ड़ाल दो तो डांट नहीं पड़ती . 
             हम सभी ने ऐसा ही किया . जब पूरी छुट्टी की घंटी बजी तो हम भागे भागे अपनी कक्षाओं में गए . हमारे बस्ते वहीँ पड़े थे . हम ख़ुशी ख़ुशी अपने बस्ते उठा लाए. हमें किसी ने डांट नहीं लगाई. किसी का ध्यान हमारे बस्तों की ओर गया ही नहीं ! तब से मैं तो बाला की कायल हो गई .मैंने सोचा कि वह तो टोटकों की एक्सपर्ट है . फिर कोई समस्या आती तो बाला से ही मैं समाधान पूछती थी .