Friday, December 6, 2013
Sunday, May 26, 2013
नन्हें का शब्दकोश !
सवेरे उठते ही बिस्तर के कोने पर जोर की गुहार लगती है " मम्में ". जब बार बार पुकारने पर कोई उत्तर नहीं आता तो पुकार आती है "नान्नें ".
अनन्या को "नन्या " पुकारता नन्हा शिशु अपनी दोनों हथेलियाँ मलते हुए उसे हाथ धोने का इशारा करता है ।फिर उसे बुलाते हुए कहता है ,"आईदा " । नाचती कूदती हुई अनन्या जब घर पर आती है तो "बईटा " बोलते हुए गोद से नीचे उतरना चाहता है । " बो बो " करते हुए वह बाहर इशारा करके बता देता है कि बाहर कुत्ता भोंक रहा है । कबूतर को देखकर नन्हा " क -क " का शोर मचाता है । "कौवा कैसे बोलता है ?" यह प्रश्न सुनकर उसका जवाब होता है "का -का " ।
अचानक बिल्ली सामने से गुजरने लगी तो "माउ -माउ" की कोमल आवाज करता हुआ वह बिल्ली को पास आने का इशारा कर रहा होता है । अब तो नन्हें मुन्ने को प्यास लग आई और "मम -मम " का शोर शुरू हो गया ।पानी की बोतल को देखते ही नन्हा प्रसन्नता से बोल उठा ,"बोटअ "
नहाने के लिए बाथरूम की ओर ले जाने पर नन्हा बहुत प्रसन्न होता है वह "न्याई - न्याई " का शोर मचा देता है । लेकिन बाथरूम से बाहर आने पर रोंना शुरू कर देता है । तब वह बोलता है नैइ -नैइ" । वास्तव में वह पानी से खेलते ही रहना चाहता है । उसे चुप करने के लिए कूलर चलाया जाता है । तब वह खुश होकर बोलता है "कूअ - कूअ" । Room cooler के साथ खड़े होकर वह सभी स्विच घुमा देता है और फिर हमें निहारता हुआ हथेलियाँ गोल गोल घुमाता है । इसका मतलब होता है ; "वाह ! क्या बात है !"
बच्चों को पार्क में खेलते देखकर वह बाहर जाना चाहता है । तर्जनी को बाहर निकालकर वह दरवाज़े की और संकेत करता हुआ कहता है "बा" और फिर बोल उठता है "बत्ते" अर्थात बच्चे ! गोद में बैठा-बैठा वह नन्हें हाथ दायें बाएँ हिलाता हुआ बोलता है ,"बए -बए "।
तरबूज को देखते ही सलोना सा कोमल चेहरा खिल उठा और "बुज -बुज " की फरमाइश होने लगी । आम शब्द बोलना तो बहुत आसान है और नन्हें उस्ताद का मनचाहा फल भी है , तो " अम -अम " की आवाज़ तो पूरा आम खत्म होने पर ही बन्द होती हैं । केला खाने के लिए आतुर नन्हा " केआ " पुकारकर काम चला लेता है । दाल तो उसे बेहद पसंद है । "डाअ" कहता हुआ वह दाल को चम्मच से स्वयं खाना चाहता है । नतीजतन , उसकी प्यारी सी टी शर्ट पर दाल के पीले रंग बिखर जाते हैं ।
किताब बंद करनी है , या खोलनी है ; बोतल बंद करनी है या खोलनी है ; कोई खिलौना बंद करना है या चलाना है ; इन सभी क्रियाओं के लिए नन्हें शिशु के पास एक ही शब्द है " बन्न " । Turtle का खिलौना देखते ही वह कहता है ,"टअटअ" । कहीं टी वी पर कोई डांस का गाना आया नहीं कि "डन डन " और "ड्रीन ड्रीन" के साथ नन्हे मुन्ने का डांस शुरू हो जाता है । दोनों हाथों की मुट्ठी बंद करके, तर्जनी को ऊपर अलग से निकालकर, खूब थिरकता है वह !
" माम्मा , नान्ना, बाब्बा " ये सभी शब्द बड़ी आसानी से बोलता है प्यारा सा नन्हा मुन्ना ! और पापा के कंधे पर सिर रखकर बड़ी कोमल आवाज़ में धीमे धीमे वह बोला करता है "पा -पा " !
और जब सोने से पहले जब उसे good night बोलने के लिए कहा जाता है , तब वह बड़े लाड से बोलता है ,"'गुद नइ " ।
Thursday, May 16, 2013
uric acid बढने पर .......
शरीर में uric acid की मात्रा बढने पर इसे कम करना आसान नहीं होता । लेकिन शतावर (asparagus) की जड़ का चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन दूध या पानी के साथ लिया जाए , तो uric acid घटना प्रारम्भ हो जाता है और शरीर की कमजोरी भी दूर होती है ।
साथ ही गाजर और चुकन्दर का जूस भी पीते रहें इससे और भी जल्दी लाभ होगा ।
साथ ही गाजर और चुकन्दर का जूस भी पीते रहें इससे और भी जल्दी लाभ होगा ।
Sunday, May 5, 2013
मेहमान या मेज़बान !
लम्बी प्रतीक्षा के बाद वह समय भी आया जब मुदित और ज्योति का हमारे घर पदार्पण हुआ !
बात यह है कि ऋचा से इंदुजी का विशेष स्नेह है । अत: इंदुजी के अनुग्रह को ऋचा टाल न सकी । छोले - भटूरे की फरमाइश के साथ ही रविवार को इंदुजी के यहाँ लंच का कार्यक्रम निश्चित हो गया । सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात की भी थी की मुदित और ज्योति भी रविवार को मिलने वाले थे ।
इंदुजी ने फोन पर बताया, "सब कुछ तैयार है बस मुदित तुम्हें लेने आ जाएगा ; कार में आराम से नन्हें नटखट के साथ आ जाना ।"
"मुदित लेने आएगा ! अरे , फिर तो ज्योति और आप लोग भी साथ ही यहीं पर आ जाओ । यहीं पर लंच कर लेते हैं । आपके घर खाना खाया या यहाँ पर ; कोई फर्क थोड़े ही है ।" मैं सब कुछ चुस्ती से एक साथ ही बोल गई ।
इंदुजी ने सहमति जताई । वे बोलीं ," ठीक है । तो तुम थोड़े से आलू उबाल लेना । बाकी सभी सामान हम कार में रखकर ले आयेंगे । आने से पहले हम फोन कर लेंगे ।"
ऋचा ने नन्हें नटखट को नहलाया , स्वयम भी स्नान किया और तुरंत बाज़ार जाकर कुछ छुटपुट सामान ले आई । मैंने भी थोडा बहुत घर को व्यवस्थित किया । वास्तव में नन्हें बच्चों के साथ घर के अस्त व्यस्त होने की सम्भावना अधिक होती हैं । पूरे घर में नन्हें के नन्हें नन्हें खिलौने ही साधिकार विश्राम कर रहे होते हैं । सभी खिलौने एक बड़े से कार्टन में भरकर हमने कुछ चैन की सांस ली ।
मैंने ऋचा को कहा , " यह तो अच्छा नहीं लगता कि ज्योति और मुदित पहली बार हमारे घर आएँ और हम उनके लिए अपनी तरफ से कुछ भी खातिरदारी न करें। क्यों न पिज़्ज़ा मँगवा लिया जाए ?"
ऋचा ने भी स्वीकृति दे दी । बस पिज़्ज़ा आर्डर हो गया ।
दरवाजे की घंटी बजते ही नन्हा नटखट फुर्तीला हो गया । ज्योति और मुदित पहली बार हमारे घर आए थे । मेरी प्रसन्नता द्विगुणित हो गई थी । सब आत्मीय एकत्र हो जाएँ तो घर भी भरा - भरा लगता है और मन भी हरा भरा हो उठता है ।
थोड़ी देर बार पिज़्ज़ा भी घर पहुँच गया । इंदुजी पिज़्ज़ा पसंद नहीं करती । उन्होंने तो कह भी दिया ," अरे ! पिज़्ज़ा क्यों मँगवाया है ? पिज़्ज़ा खाने के बाद छोले भटूरे का तो आनन्द कम हो जाएगा ।"
" इंदुजी ! ऋचा का बहुत मन था । आप भी लीजिए न थोडा !"
" आंटी दोनों ही व्यंजनों का मज़ा लेना है । पहले पिज़्ज़ा और फिर छोले भटूरे । आप भी थोडा लीजिए न !"
वास्तव में इंदुजी इतने स्वादिष्ट पकवान घर में ही बना लेती हैं कि बाज़ार के बने व्यंजन उन्हें अधिक पसंद नहीं आते । उन्होंने फटाफट बूंदी का रायता बनाया , सूखे आलू भूने ; और कढाई में तेल चढ़ाकर भटूरे बेलने की तैयारी कर ली । बने बनाए छोले और गुंधा हुआ भटूरे का आटा वे घर से ही लाई थी । और सब तो छोडिए; वे मिष्ठान्न के लिए खीर भी घर से ही ले आईं थी ।
ज्योति सबको खाना परोसने में लग गई । मुझे तो ज्योति भी बहुत फुर्तीली लगती है । पता ही नहीं चला कि उसने चुपके-चुपके क्या क्या काम कर दिए । इंदुजी तो सब कुछ समेटकर भोजन के लिए बैठीं ।
नन्हां चुनमुन तो मुदित के साथ ही खेलता रहा । उसे मुदित इतना अधिक भा गया कि वह मुदित की गोद से हमारे पास आने को तैयार ही नहीं था । उसने तो हमे बाय - बाय भी कह दिया । इस परिस्थिति में बच्चे को वापिस लेना कठिन हो सकता है । बच्चा रो - रो कर खूब शोर मचाता, उससे पहले ही ऋचा ने उसे दूर ले जाकर बहलाना फुसलाना शुरू कर दिया । नन्हें नटखट के ध्यान भटकते ही मुदित ने कार स्टार्ट कर दी ।
पता ही न चला कि कुछ घंटे पल भर में कैसे बीत गए ? परन्तु सबसे बड़ा प्रश्न मेरे मन में अभी तक है ; इंदुजी हमारी मेहमान थीं या मेजबान ?
बात यह है कि ऋचा से इंदुजी का विशेष स्नेह है । अत: इंदुजी के अनुग्रह को ऋचा टाल न सकी । छोले - भटूरे की फरमाइश के साथ ही रविवार को इंदुजी के यहाँ लंच का कार्यक्रम निश्चित हो गया । सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात की भी थी की मुदित और ज्योति भी रविवार को मिलने वाले थे ।
इंदुजी ने फोन पर बताया, "सब कुछ तैयार है बस मुदित तुम्हें लेने आ जाएगा ; कार में आराम से नन्हें नटखट के साथ आ जाना ।"
"मुदित लेने आएगा ! अरे , फिर तो ज्योति और आप लोग भी साथ ही यहीं पर आ जाओ । यहीं पर लंच कर लेते हैं । आपके घर खाना खाया या यहाँ पर ; कोई फर्क थोड़े ही है ।" मैं सब कुछ चुस्ती से एक साथ ही बोल गई ।
इंदुजी ने सहमति जताई । वे बोलीं ," ठीक है । तो तुम थोड़े से आलू उबाल लेना । बाकी सभी सामान हम कार में रखकर ले आयेंगे । आने से पहले हम फोन कर लेंगे ।"
ऋचा ने नन्हें नटखट को नहलाया , स्वयम भी स्नान किया और तुरंत बाज़ार जाकर कुछ छुटपुट सामान ले आई । मैंने भी थोडा बहुत घर को व्यवस्थित किया । वास्तव में नन्हें बच्चों के साथ घर के अस्त व्यस्त होने की सम्भावना अधिक होती हैं । पूरे घर में नन्हें के नन्हें नन्हें खिलौने ही साधिकार विश्राम कर रहे होते हैं । सभी खिलौने एक बड़े से कार्टन में भरकर हमने कुछ चैन की सांस ली ।
मैंने ऋचा को कहा , " यह तो अच्छा नहीं लगता कि ज्योति और मुदित पहली बार हमारे घर आएँ और हम उनके लिए अपनी तरफ से कुछ भी खातिरदारी न करें। क्यों न पिज़्ज़ा मँगवा लिया जाए ?"
ऋचा ने भी स्वीकृति दे दी । बस पिज़्ज़ा आर्डर हो गया ।
दरवाजे की घंटी बजते ही नन्हा नटखट फुर्तीला हो गया । ज्योति और मुदित पहली बार हमारे घर आए थे । मेरी प्रसन्नता द्विगुणित हो गई थी । सब आत्मीय एकत्र हो जाएँ तो घर भी भरा - भरा लगता है और मन भी हरा भरा हो उठता है ।
थोड़ी देर बार पिज़्ज़ा भी घर पहुँच गया । इंदुजी पिज़्ज़ा पसंद नहीं करती । उन्होंने तो कह भी दिया ," अरे ! पिज़्ज़ा क्यों मँगवाया है ? पिज़्ज़ा खाने के बाद छोले भटूरे का तो आनन्द कम हो जाएगा ।"
" इंदुजी ! ऋचा का बहुत मन था । आप भी लीजिए न थोडा !"
" आंटी दोनों ही व्यंजनों का मज़ा लेना है । पहले पिज़्ज़ा और फिर छोले भटूरे । आप भी थोडा लीजिए न !"
वास्तव में इंदुजी इतने स्वादिष्ट पकवान घर में ही बना लेती हैं कि बाज़ार के बने व्यंजन उन्हें अधिक पसंद नहीं आते । उन्होंने फटाफट बूंदी का रायता बनाया , सूखे आलू भूने ; और कढाई में तेल चढ़ाकर भटूरे बेलने की तैयारी कर ली । बने बनाए छोले और गुंधा हुआ भटूरे का आटा वे घर से ही लाई थी । और सब तो छोडिए; वे मिष्ठान्न के लिए खीर भी घर से ही ले आईं थी ।
ज्योति सबको खाना परोसने में लग गई । मुझे तो ज्योति भी बहुत फुर्तीली लगती है । पता ही नहीं चला कि उसने चुपके-चुपके क्या क्या काम कर दिए । इंदुजी तो सब कुछ समेटकर भोजन के लिए बैठीं ।
नन्हां चुनमुन तो मुदित के साथ ही खेलता रहा । उसे मुदित इतना अधिक भा गया कि वह मुदित की गोद से हमारे पास आने को तैयार ही नहीं था । उसने तो हमे बाय - बाय भी कह दिया । इस परिस्थिति में बच्चे को वापिस लेना कठिन हो सकता है । बच्चा रो - रो कर खूब शोर मचाता, उससे पहले ही ऋचा ने उसे दूर ले जाकर बहलाना फुसलाना शुरू कर दिया । नन्हें नटखट के ध्यान भटकते ही मुदित ने कार स्टार्ट कर दी ।
पता ही न चला कि कुछ घंटे पल भर में कैसे बीत गए ? परन्तु सबसे बड़ा प्रश्न मेरे मन में अभी तक है ; इंदुजी हमारी मेहमान थीं या मेजबान ?
Monday, February 11, 2013
स्वाइन फ्लू
स्वाइन फ्लू बुखार में फेफड़े कमजोर हो जाते हैं । इससे खांसी , बुखार, bleeding आदि होते हैं।
6-7 इंच लम्बी ताज़ी गिलोय की डंडी ( या सूखी गिलोय का पावडर 5-6 ग्राम ) +तुलसी के 5-6 पत्ते +4-5 काली मिर्च +3-4 लौंग +2-3 ग्राम हल्दी +3-4 ग्राम मुलेठी ; इन सबको मिलाकर काढ़ा बनाकर, सवेरे शाम लेने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और बुखार भी ठीक होता है ।
गले और खांसी को ठीक करने के लिए काली मिर्च और बादाम चबाकर चूसते रहना चाहिए । इससे फेफड़ों को भी शक्ति मिलती है । काली मिर्च, मुलेठी और मिश्री चूसने से भी गला ठीक रहता है ।
स्वाइन फ्लू होने पर कपालभाति प्राणायाम बिलकुल न करें । इसको करने से कमजोर हुए फेफड़ों की कोमल रक्तवाहिनी नलिकाएं फट सकती हैं ।
भर्स्तिका(deep breathing ) प्राणायाम करें । बहुत धीरे धीरे श्वास अंदर खींचें और धीरे धीरे ही श्वास बाहर छोड़ें । अनुलोम विलोम प्राणायाम धीरे धीरे करें । शीतली और सीत्कारी प्राणायाम करने से bleeding की समस्या नहीं होगी और बुखार भी कम होगा ।
शीतली प्राणायाम के लिए जीभ को गोल करते हुए मुंह से बाहर निकालें और धीरे धीरे हवा अंदर लें । फिर नाक के द्वारा वायु बाहर निकल दें । इससे ठंडक का आभास होगा । यह प्राणायाम 5-7 बार कर सकते हैं ।
सीत्कारी प्राणायाम के लिए दांतों को भींचकर, होठों को खोल लें । तत्पश्चात दांतों के बीच में से वायु को अंदर लें । फिर मुंह बंद करके नाक द्वारा वायु बाहर निकाल दें । ऐसा 5-7 बार करें । इससे भी ठंडक का आभास होगा ।
शरीर में बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अंजीर और मुनक्का का सेवन अवश्य करें । इससे स्वाइन फ्लू बुखार जल्दी ठीक होगा ।
6-7 इंच लम्बी ताज़ी गिलोय की डंडी ( या सूखी गिलोय का पावडर 5-6 ग्राम ) +तुलसी के 5-6 पत्ते +4-5 काली मिर्च +3-4 लौंग +2-3 ग्राम हल्दी +3-4 ग्राम मुलेठी ; इन सबको मिलाकर काढ़ा बनाकर, सवेरे शाम लेने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और बुखार भी ठीक होता है ।
गले और खांसी को ठीक करने के लिए काली मिर्च और बादाम चबाकर चूसते रहना चाहिए । इससे फेफड़ों को भी शक्ति मिलती है । काली मिर्च, मुलेठी और मिश्री चूसने से भी गला ठीक रहता है ।
स्वाइन फ्लू होने पर कपालभाति प्राणायाम बिलकुल न करें । इसको करने से कमजोर हुए फेफड़ों की कोमल रक्तवाहिनी नलिकाएं फट सकती हैं ।
भर्स्तिका(deep breathing ) प्राणायाम करें । बहुत धीरे धीरे श्वास अंदर खींचें और धीरे धीरे ही श्वास बाहर छोड़ें । अनुलोम विलोम प्राणायाम धीरे धीरे करें । शीतली और सीत्कारी प्राणायाम करने से bleeding की समस्या नहीं होगी और बुखार भी कम होगा ।
शीतली प्राणायाम के लिए जीभ को गोल करते हुए मुंह से बाहर निकालें और धीरे धीरे हवा अंदर लें । फिर नाक के द्वारा वायु बाहर निकल दें । इससे ठंडक का आभास होगा । यह प्राणायाम 5-7 बार कर सकते हैं ।
सीत्कारी प्राणायाम के लिए दांतों को भींचकर, होठों को खोल लें । तत्पश्चात दांतों के बीच में से वायु को अंदर लें । फिर मुंह बंद करके नाक द्वारा वायु बाहर निकाल दें । ऐसा 5-7 बार करें । इससे भी ठंडक का आभास होगा ।
शरीर में बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अंजीर और मुनक्का का सेवन अवश्य करें । इससे स्वाइन फ्लू बुखार जल्दी ठीक होगा ।
Sunday, February 10, 2013
स्तन में गाँठ
स्तन में गाँठ होना बहुत आम समस्या होती जा रही है । यह चिंता का विषय भी है । अगर 1-2 ग्राम हल्दी के पावडर को सवेरे खाली पेट प्रतिदिन ले लिया जाए तो हर प्रकार की गांठें घुलनी प्रारम्भ हो जाती हैं । काचनार गुग्गल का प्रयोग भी गांठों को खत्म करने में सहायक है । कुछ पौधों का प्रयोग गाँठ पर लगाने के लिए किया जा सकता है । इससे गाँठ घुलनी शुरू हो जाती हैं :
~ अरंड अरंड के पत्ते पर थोडा सा सरसों का तेल लगाकर , हल्का सा गर्म करके स्तन पर नियमित रूप से बांधें । अरंड के तेल की मालिश करने से स्तन की गांठ भी घुलती हैं और स्तन में मुलायमी भी आती है जिससे गाँठ होने की सम्भावना कम हो जाती है । अरंड के पत्तों को उबालकर भी बाँध सकते हैं । अरंड के बीजों की गिरी को पीसकर उसका पेस्ट भी लगाया जा सकता है । अरंड के एक बड़े पत्ते को 200 ग्राम पानी में उबालकर, काढ़ा बनाकर, पीने से हार्मोन्स की गडबडी ठीक होती है, periods ठीक आते हैं ; इससे स्तन में गाँठ होने की सम्भावना भी कम हो जाती है । स्तन के nipple में crack हो या त्वचा फट जाए तो अरंड का तेल लगाना चाहिए । स्तन कैंसर में अरंड के तेल की मालिश करने से फायदा होता है । स्तन की गाँठ पर इसका पत्ता बांधें । एक पत्ता 200 ग्राम पानी में उबालें जब 50 ग्राम बचे तो पीयें । यह सवेरे खाली पेट लें । इससे स्तन कैंसर ठीक होता है ।
~ गेंदा गेंदे के पौधे की पत्तियों को पीसकर , लुगदी बनाकर गाँठ पर नियमित रूप से बांधें ।
~ पुनर्नवा पुनर्नवा (साठी ) की जड़ को घिसकर गाँठ पर लगाते रहें ।
~ सेमल सेमल की जड़ की छाल को को पीसकर लगाएँ या सेमल के तने पर उभरे मोटे कांटो को घिसकर लगाएँ ।
~ भुई आंवला इसके पत्ते पीसकर, लुगदी बनाकर लगाएँ । स्तन में सूजन या गाँठ हो तो इसके पत्तों का पेस्ट लगा लें पूरा आराम होगा ।
~ धतूरा पत्ते को हल्का गर्म करके बांधें ।
~ छुईमुई केवल जड़ घिसकर लगाएँ या फिर ;
अश्वगंधा की जड़ +छुईमुई की जड़ + छुईमुई की पत्तियां , इन सबको पीसकर स्तन की गाँठ पर लगाएँ। इससे स्तन का ढीलापन भी ठीक हो जाता है और दर्द और सूजन में भी आराम आता है ।
~ शीशम शीशम के पत्तों की लुगदी गाँठ पर लगाने से गाँठ घुलती है । इसके पत्तों को गर्म करके थोडा तेल मलकर बाँधने से गाँठ तो घुलती ही है साथ ही दर्द और सूजन हो तो उसमें भी आराम आता है ।
~ पत्थरचटा इसके पत्ते पर सरसों का तेल मलकर, पत्ते को हल्का गर्म करके गाँठ पर बांधते रहें ।.
~ धतूरा (prickly poppy) स्तन में गांठ होने पर इसका पत्ता बाँध सकते हैं ।
~ घृतकुमारी (aloe vera ) स्तन में गाँठ होने पर इसको एक तरफ से छीलकर गर्म करके बाँध लें ।
इसके साथ ही प्राणायाम तो अवश्य ही करते रहें ; विशेषकर कपालभाति प्राणायाम ।
~ अरंड अरंड के पत्ते पर थोडा सा सरसों का तेल लगाकर , हल्का सा गर्म करके स्तन पर नियमित रूप से बांधें । अरंड के तेल की मालिश करने से स्तन की गांठ भी घुलती हैं और स्तन में मुलायमी भी आती है जिससे गाँठ होने की सम्भावना कम हो जाती है । अरंड के पत्तों को उबालकर भी बाँध सकते हैं । अरंड के बीजों की गिरी को पीसकर उसका पेस्ट भी लगाया जा सकता है । अरंड के एक बड़े पत्ते को 200 ग्राम पानी में उबालकर, काढ़ा बनाकर, पीने से हार्मोन्स की गडबडी ठीक होती है, periods ठीक आते हैं ; इससे स्तन में गाँठ होने की सम्भावना भी कम हो जाती है । स्तन के nipple में crack हो या त्वचा फट जाए तो अरंड का तेल लगाना चाहिए । स्तन कैंसर में अरंड के तेल की मालिश करने से फायदा होता है । स्तन की गाँठ पर इसका पत्ता बांधें । एक पत्ता 200 ग्राम पानी में उबालें जब 50 ग्राम बचे तो पीयें । यह सवेरे खाली पेट लें । इससे स्तन कैंसर ठीक होता है ।
~ गेंदा गेंदे के पौधे की पत्तियों को पीसकर , लुगदी बनाकर गाँठ पर नियमित रूप से बांधें ।
~ पुनर्नवा पुनर्नवा (साठी ) की जड़ को घिसकर गाँठ पर लगाते रहें ।
~ सेमल सेमल की जड़ की छाल को को पीसकर लगाएँ या सेमल के तने पर उभरे मोटे कांटो को घिसकर लगाएँ ।
~ भुई आंवला इसके पत्ते पीसकर, लुगदी बनाकर लगाएँ । स्तन में सूजन या गाँठ हो तो इसके पत्तों का पेस्ट लगा लें पूरा आराम होगा ।
~ धतूरा पत्ते को हल्का गर्म करके बांधें ।
~ छुईमुई केवल जड़ घिसकर लगाएँ या फिर ;
अश्वगंधा की जड़ +छुईमुई की जड़ + छुईमुई की पत्तियां , इन सबको पीसकर स्तन की गाँठ पर लगाएँ। इससे स्तन का ढीलापन भी ठीक हो जाता है और दर्द और सूजन में भी आराम आता है ।
~ शीशम शीशम के पत्तों की लुगदी गाँठ पर लगाने से गाँठ घुलती है । इसके पत्तों को गर्म करके थोडा तेल मलकर बाँधने से गाँठ तो घुलती ही है साथ ही दर्द और सूजन हो तो उसमें भी आराम आता है ।
~ पत्थरचटा इसके पत्ते पर सरसों का तेल मलकर, पत्ते को हल्का गर्म करके गाँठ पर बांधते रहें ।.
~ धतूरा (prickly poppy) स्तन में गांठ होने पर इसका पत्ता बाँध सकते हैं ।
~ घृतकुमारी (aloe vera ) स्तन में गाँठ होने पर इसको एक तरफ से छीलकर गर्म करके बाँध लें ।
इसके साथ ही प्राणायाम तो अवश्य ही करते रहें ; विशेषकर कपालभाति प्राणायाम ।
Friday, February 8, 2013
एक अनोखी मुलाकात !
जीवन में कुछ अलग और अपने ही बल बूते पर करने का, मुझे हमेशा से ही चाव रहा है । फिर चाहे उस कार्य में सामाजिक मान्यताएँ , परम्पराएँ और औपचारिकताएं भी ताक पर रखनी पडें, तो मैं अक्सर परवाह नहीं करती । बस जो ठान लिया वह करके ही रहती हूँ । यद्यपि कई बार अच्छे परिणाम भी हाथ नहीं लगते , परन्तु मन की संतुष्टि अवश्य होती है ।
जैसे ही पता चला कि भाई का रिश्ता पक्का हो गया है ; मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । बात यह थी की भाई तो विवाह के लिए तैयार ही नहीं थे । बाउजी के आग्रह पर वे भाभी को पसन्द करने के लिए उनके साथ भी चले गए ; लेकिन उनका कहना था कि वे केवल बाउजी की बात रखने के लिए ही वहाँ जा रहे हैं और अधिक संभावना इस बात की थी कि वे इनकार ही करेंगे । इसीलिए हममे से और कोई तो वहाँ गया ही नहीं ! जब भाई वापिस घर आए और हमसे विचार विमर्श किया तो इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इनकार करना तो ठीक नहीं रहेगा । इनकार करने का कोई कारण भी नहीं था । भाभी ग्रेजुएट थीं और सुन्दर भी । वास्तव में तो भाभी के चमचमाते सुन्दर दांतों वाली मुस्कुराहट ने भाई का मन मोह लिया था ! कारण जो भी हो; पर बात पक्की हो गई ।
उस समय तो मैं भाभी को देखने नहीं गई ; परन्तु अब तो बड़ी उत्सुकता थी कि भाभी कैसी दिखती है । उनकी सुन्दरता के विषय में पता तो चल गया पर रूप को निहारने का अवसर तो मिला ही नहीं ! अब यह तो कहा जा नहीं सकता था कि जल्दी ही भाभी से मिलवा दो । औपचारिकताएं कितनी होती ! भाभी के परिवार वालों पर कितना भार पड़ता ! वे कितने परेशान होते ! शायद भाभी को भी अटपटा लगता ; बार बार सकुचा कर ससुराल वालों के सामने बैठना !
भाभी को देखने की मन में बहुत ही तीव्र इच्छा थी । आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है । Social anthropology की पढ़ाई करते समय कुछ प्रोजेक्ट work होते थे । उसमे survey करने होते थे । वैयक्तिक तौर पर पूरी जानकारी के लिए हमे स्वयं व्यक्तियों से मिलकर जानकारियाँ प्राप्त करनी होती थी । इसी को ध्यान में रखकर मैंने भाभी से मिलने की एक युक्ति सोची और उसे कार्यान्वित करने का पक्का इरादा बना लिया । किसी को बता तो सकती नही थी । इस कार्य को तो सभी मना ही करते ; यहाँ तक कि भाई भी !
मैंने सोचा , मिलने के बाद भाई को बताउंगी तो भाई हैरान भी हो जाएँगे और रोमांच से भरपूर किस्सा सुनकर खुश भी होंगे । शादी होने के बाद जब वे भाभी को बतायेंगे तो खूब मज़ा आएगा । उनके परिवार वाले भी अचरज में पड़ जाएँगे कि ये कैसी ननद है जो चुपके से भाभी से मिल गई और किसी को पता भी नहीं चला !
भाभी के घर का पता तो मालूम पड़ ही गया था । Survey के लिए पूरा खाका एक रजिस्टर पर तैयार करके मैंने एक बैग में डाला और जाने के लिए बस पकड ली । जिस बस स्टाप पर मुझे उतरना चाहिए था , उससे पहले वाले स्टाप पर मैं उतर गई । कारण ये था कि मुझे पूरी तरह तो पता ही नहीं था कि कहाँ पर उतरना है ; और चुपके चुपके यह काम करना था , तो घर में पूछती भी किससे ? खैर ! जैसे तैसे वहाँ पर लोगों की सहायता लेते हुए मैं दरवाजे तक जा ही पहुँची ।
मुख्य द्वार खुला था और आँगन में एक कम उम्र की महिला अपनी दो छोटी बच्चियों के साथ चारपाई पर बैठी कुछ काम कर रही थी । पहले तो कुछ क्षण मैं चुपचाप खडी रही । मैंने सोचा ये शायद भाभी की भाभी हैं । अगर मैं अपनी भाभी का नाम लेकर इनसे कुछ पूछूँ , तो पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी ? कहीं ये मुझ पर शक करें और भाभी को न बुलाएँ ? फिर तो आना ही व्यर्थ हो जाएगा । कहीं कुछ गडबड न हो जाए । कुछ गलत हो गया तो बाउजी बहुत गुस्सा करेंगे । मुझे लगा की मैं व्यर्थ में ही यहाँ आ गई ; चुपचाप वापिस चले जाना चाहिए । तभी कान में आवाज़ आई ," हाँ ! किससे मिलना है ? "
मैं भी जल्दी से बोल गई ,"कृष्णा से ।"
"आओ बैठो । अभी बुलाती हूँ ।"
मैं अंदर आँगन में बिछी चारपाई पर बैठ गई । मुझे यह कल्पना ही नहीं थी कि इतने सरल तरीके से एक आगन्तुक को कोई अपने आँगन में बिठा सकता है । मैंने सोचा कि इनकी भाभी बहुत सरल और सीधी है । नहीं तो मुझसे तरह तरह के प्रश्न पूछती । उसके बाद शायद घर के अन्दर आने देती ।
उन्होंने नीचे से ही आवाज़ लगाई ,"गुड्डी को नीचे भेज दो ।"
ऊपर से किसी स्त्री ने मुझे देखा और पूछा ," हाँ ! क्या काम है ? "
मैंने कहा ," मैं सर्वे के लिए आई हूँ । कृष्णा का सर्वे करना है । प्लीज़ उन्हें भेज दीजिए ।"
मैं कुछ देर तो सांस रोके बैठी रही । सोचा ,"पता नहीं क्या होगा ? अब जो हो देखा जाएगा । जब ऊखल में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना !"
थोड़ी देर में सलवार कमीज़ पहने एक सौम्य व्यक्तित्व सीढियों से नीचे उतरता हुआ दृष्टिगोचर हुआ । मैं पल भर के लिए तो मूर्तिवत हो गई । सोचा ही न था कि इतनी सरलता से दर्शन हो जाएँगे । तभी भाभी की आवाज़ सुनाई दी ," हाँ ! क्या पूछना है ?"
एकदम मेरी तन्द्रा टूटी ," आपके educational और दूसरे details का सर्वे है । आप प्लीज बैठ कर बता दीजिए ।"
भाभी ने सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और मैं लिखती गई । कनखियों से भाभी को बार बार देखती भी जाती थी । मन कह रहा था , " भाभी हैं तो बहुत सुन्दर ; और सरल भी हैं । भाई का चुनाव तो वाकई काबिले तारीफ़ है ।"
उन्होंने पूछा ,"और क्या प्रश्न है ?"
मैंने कहा ," और कुछ नहीं पूछना । अब आप नीचे साइन कर दीजिए ।"
भाभी ने मेरे हाथ से पैन लिया और अपने हस्ताक्षर कर दिए । अब तो मैं और भी खुश हो गई । मैंने सोचा ," इस हस्ताक्षर को संभाल कर रखूँगी । यह तो अमूल्य पूंजी है ।"
मैंने खड़े होते हुए कहा ," अब मैं चलती हूँ ।" भाभी ने गर्दन हिलाकर सहमति भी दे दी ; परन्तु मन तो वहां कुछ देर और रुकने का कर रहा था । भाभी की ओर मुस्कुराकर देखते हुए मैं धीरे धीरे दरवाजे की तरफ आई और भाभी ऊपर वापिस चली गई ।
मैं जल्दी से बस स्टाप पर आई । घर वापिस आने की बस पकड़ी । भाई अभी आफिस से घर वापिस आए नहीं थे । मैं बड़ी बेसब्री से घड़ी देखते हुए भाई का इन्तजार कर रही थी । ऐसा लग रहा था कि घड़ी रूक गई है । छह बजने के बाद जब भाई घर आए तो मैंने माँ और बाउजी से छिपकर सारी बात भाई को बताई और भाभी के साइन भी दिखाए । मैंने कहा ," भाई ! शादी के बाद जब भाभी को यह सब बताएँगे तो कितना मज़ा आएगा !" मैंने सोचा था कि भाई बहुत खुश और रोमांचित होंगे और यह टॉप secret शादी तक नहीं खुल पाएगा । परन्तु भाई तो कुछ चिंतित दिखाई दिए । वे बोले ," नहीं ; ऐसे तो अच्छा नहीं लगता । शादी से पहले ही बता देना चाहिए ।"
मेरा तो चेहरा उतर गया । मुझे तो अपना सारा adventure व्यर्थ होता नजर आ रहा था । लेकिन मैं कुछ कर भी तो नहीं सकती थी । उनका निर्णय स्वीकार्य न होने का तो प्रश्न ही नहीं था । दो तीन दिन बाद जब उन्होंने अपने ससुराल वालों को यह सब बताया तो वे सब हैरान हो गए । विवाह के दिन तो सब मुझसे मजाक भी कर रहे थे ; " आज भी कोई सर्वे है क्या ?"
एक राज़ की बात बताऊँ ; पहली मुलाकात के भाभी के वो साइन, मैंने अपने विवाह तक बहुत संभाल कर रखे थे । मुझे वो अपनी अमूल्य निधि लगते थे ।
जैसे ही पता चला कि भाई का रिश्ता पक्का हो गया है ; मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । बात यह थी की भाई तो विवाह के लिए तैयार ही नहीं थे । बाउजी के आग्रह पर वे भाभी को पसन्द करने के लिए उनके साथ भी चले गए ; लेकिन उनका कहना था कि वे केवल बाउजी की बात रखने के लिए ही वहाँ जा रहे हैं और अधिक संभावना इस बात की थी कि वे इनकार ही करेंगे । इसीलिए हममे से और कोई तो वहाँ गया ही नहीं ! जब भाई वापिस घर आए और हमसे विचार विमर्श किया तो इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इनकार करना तो ठीक नहीं रहेगा । इनकार करने का कोई कारण भी नहीं था । भाभी ग्रेजुएट थीं और सुन्दर भी । वास्तव में तो भाभी के चमचमाते सुन्दर दांतों वाली मुस्कुराहट ने भाई का मन मोह लिया था ! कारण जो भी हो; पर बात पक्की हो गई ।
उस समय तो मैं भाभी को देखने नहीं गई ; परन्तु अब तो बड़ी उत्सुकता थी कि भाभी कैसी दिखती है । उनकी सुन्दरता के विषय में पता तो चल गया पर रूप को निहारने का अवसर तो मिला ही नहीं ! अब यह तो कहा जा नहीं सकता था कि जल्दी ही भाभी से मिलवा दो । औपचारिकताएं कितनी होती ! भाभी के परिवार वालों पर कितना भार पड़ता ! वे कितने परेशान होते ! शायद भाभी को भी अटपटा लगता ; बार बार सकुचा कर ससुराल वालों के सामने बैठना !
भाभी को देखने की मन में बहुत ही तीव्र इच्छा थी । आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है । Social anthropology की पढ़ाई करते समय कुछ प्रोजेक्ट work होते थे । उसमे survey करने होते थे । वैयक्तिक तौर पर पूरी जानकारी के लिए हमे स्वयं व्यक्तियों से मिलकर जानकारियाँ प्राप्त करनी होती थी । इसी को ध्यान में रखकर मैंने भाभी से मिलने की एक युक्ति सोची और उसे कार्यान्वित करने का पक्का इरादा बना लिया । किसी को बता तो सकती नही थी । इस कार्य को तो सभी मना ही करते ; यहाँ तक कि भाई भी !
मैंने सोचा , मिलने के बाद भाई को बताउंगी तो भाई हैरान भी हो जाएँगे और रोमांच से भरपूर किस्सा सुनकर खुश भी होंगे । शादी होने के बाद जब वे भाभी को बतायेंगे तो खूब मज़ा आएगा । उनके परिवार वाले भी अचरज में पड़ जाएँगे कि ये कैसी ननद है जो चुपके से भाभी से मिल गई और किसी को पता भी नहीं चला !
भाभी के घर का पता तो मालूम पड़ ही गया था । Survey के लिए पूरा खाका एक रजिस्टर पर तैयार करके मैंने एक बैग में डाला और जाने के लिए बस पकड ली । जिस बस स्टाप पर मुझे उतरना चाहिए था , उससे पहले वाले स्टाप पर मैं उतर गई । कारण ये था कि मुझे पूरी तरह तो पता ही नहीं था कि कहाँ पर उतरना है ; और चुपके चुपके यह काम करना था , तो घर में पूछती भी किससे ? खैर ! जैसे तैसे वहाँ पर लोगों की सहायता लेते हुए मैं दरवाजे तक जा ही पहुँची ।
मुख्य द्वार खुला था और आँगन में एक कम उम्र की महिला अपनी दो छोटी बच्चियों के साथ चारपाई पर बैठी कुछ काम कर रही थी । पहले तो कुछ क्षण मैं चुपचाप खडी रही । मैंने सोचा ये शायद भाभी की भाभी हैं । अगर मैं अपनी भाभी का नाम लेकर इनसे कुछ पूछूँ , तो पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी ? कहीं ये मुझ पर शक करें और भाभी को न बुलाएँ ? फिर तो आना ही व्यर्थ हो जाएगा । कहीं कुछ गडबड न हो जाए । कुछ गलत हो गया तो बाउजी बहुत गुस्सा करेंगे । मुझे लगा की मैं व्यर्थ में ही यहाँ आ गई ; चुपचाप वापिस चले जाना चाहिए । तभी कान में आवाज़ आई ," हाँ ! किससे मिलना है ? "
मैं भी जल्दी से बोल गई ,"कृष्णा से ।"
"आओ बैठो । अभी बुलाती हूँ ।"
मैं अंदर आँगन में बिछी चारपाई पर बैठ गई । मुझे यह कल्पना ही नहीं थी कि इतने सरल तरीके से एक आगन्तुक को कोई अपने आँगन में बिठा सकता है । मैंने सोचा कि इनकी भाभी बहुत सरल और सीधी है । नहीं तो मुझसे तरह तरह के प्रश्न पूछती । उसके बाद शायद घर के अन्दर आने देती ।
उन्होंने नीचे से ही आवाज़ लगाई ,"गुड्डी को नीचे भेज दो ।"
ऊपर से किसी स्त्री ने मुझे देखा और पूछा ," हाँ ! क्या काम है ? "
मैंने कहा ," मैं सर्वे के लिए आई हूँ । कृष्णा का सर्वे करना है । प्लीज़ उन्हें भेज दीजिए ।"
मैं कुछ देर तो सांस रोके बैठी रही । सोचा ,"पता नहीं क्या होगा ? अब जो हो देखा जाएगा । जब ऊखल में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना !"
थोड़ी देर में सलवार कमीज़ पहने एक सौम्य व्यक्तित्व सीढियों से नीचे उतरता हुआ दृष्टिगोचर हुआ । मैं पल भर के लिए तो मूर्तिवत हो गई । सोचा ही न था कि इतनी सरलता से दर्शन हो जाएँगे । तभी भाभी की आवाज़ सुनाई दी ," हाँ ! क्या पूछना है ?"
एकदम मेरी तन्द्रा टूटी ," आपके educational और दूसरे details का सर्वे है । आप प्लीज बैठ कर बता दीजिए ।"
भाभी ने सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और मैं लिखती गई । कनखियों से भाभी को बार बार देखती भी जाती थी । मन कह रहा था , " भाभी हैं तो बहुत सुन्दर ; और सरल भी हैं । भाई का चुनाव तो वाकई काबिले तारीफ़ है ।"
उन्होंने पूछा ,"और क्या प्रश्न है ?"
मैंने कहा ," और कुछ नहीं पूछना । अब आप नीचे साइन कर दीजिए ।"
भाभी ने मेरे हाथ से पैन लिया और अपने हस्ताक्षर कर दिए । अब तो मैं और भी खुश हो गई । मैंने सोचा ," इस हस्ताक्षर को संभाल कर रखूँगी । यह तो अमूल्य पूंजी है ।"
मैंने खड़े होते हुए कहा ," अब मैं चलती हूँ ।" भाभी ने गर्दन हिलाकर सहमति भी दे दी ; परन्तु मन तो वहां कुछ देर और रुकने का कर रहा था । भाभी की ओर मुस्कुराकर देखते हुए मैं धीरे धीरे दरवाजे की तरफ आई और भाभी ऊपर वापिस चली गई ।
मैं जल्दी से बस स्टाप पर आई । घर वापिस आने की बस पकड़ी । भाई अभी आफिस से घर वापिस आए नहीं थे । मैं बड़ी बेसब्री से घड़ी देखते हुए भाई का इन्तजार कर रही थी । ऐसा लग रहा था कि घड़ी रूक गई है । छह बजने के बाद जब भाई घर आए तो मैंने माँ और बाउजी से छिपकर सारी बात भाई को बताई और भाभी के साइन भी दिखाए । मैंने कहा ," भाई ! शादी के बाद जब भाभी को यह सब बताएँगे तो कितना मज़ा आएगा !" मैंने सोचा था कि भाई बहुत खुश और रोमांचित होंगे और यह टॉप secret शादी तक नहीं खुल पाएगा । परन्तु भाई तो कुछ चिंतित दिखाई दिए । वे बोले ," नहीं ; ऐसे तो अच्छा नहीं लगता । शादी से पहले ही बता देना चाहिए ।"
मेरा तो चेहरा उतर गया । मुझे तो अपना सारा adventure व्यर्थ होता नजर आ रहा था । लेकिन मैं कुछ कर भी तो नहीं सकती थी । उनका निर्णय स्वीकार्य न होने का तो प्रश्न ही नहीं था । दो तीन दिन बाद जब उन्होंने अपने ससुराल वालों को यह सब बताया तो वे सब हैरान हो गए । विवाह के दिन तो सब मुझसे मजाक भी कर रहे थे ; " आज भी कोई सर्वे है क्या ?"
एक राज़ की बात बताऊँ ; पहली मुलाकात के भाभी के वो साइन, मैंने अपने विवाह तक बहुत संभाल कर रखे थे । मुझे वो अपनी अमूल्य निधि लगते थे ।
Saturday, February 2, 2013
गाजर (carrot)
गाजर का हलवा सर्दियों में सर्वाधिक प्रिय मिष्ठान्न होता है । गाजर का जूस और गाजर का मुरब्बा बहुत पौष्टिक माने जाते हैं । नियमित रूप से इन्हें लेने रहने से अनीमिया ठीक हो जाता है और खून की कमी नहीं होती । दूध में शहद मिलाकर गाजर के मुरब्बे के साथ सेवन करने से शरीर में शक्ति आती है ।
यह पित्तनाशक होता है । अगर भूख कम लगे तो इसका अचार खाने से भूख बढ़ती है । यूरोप के देशों में पीलिया होने पर गाजर का रस पिलाया जाता है । आँत में कीड़े हो जाएँ तो गाजर का रस पीएँ और इसकी सब्जी खाएँ । White Discharge की शिकायत हो तो गाजर के रस में आंवला और पुदीना मिलाकर सेवन करें ।
शरीर में सूजन हो या कहीं पर फोड़े हों तो गाजर के पत्ते पीसकर पुल्टिस बांधें । गाजर को उबालकर नमक मिलाकर पुल्टिस बाँधने से भी सूजन ठीक होती है । माइग्रेन या sinus की समस्या हो तो इसकी पत्तियों को सेककर उनका 4-4 बूँद रस नाक में डालें । कहीं पर शरीर जल जाए तो तुरंत गाजर काटकर और घिसकर लगाएं ।
Periods में दर्द होता हो या समय पर न आते हों तो नियमित रूप से गाजर की सब्जी खानी चाहिए । इससे हारमोन की सभी गडबडी दूर होती हैं । Delivery के बाद अजवायन और गाजर के बीजों का काढ़ा लिया जाए तो uterus की ठीक प्रकार शुद्धि होती है और infections नहीं होते ।
पेट में अफ़ारा हो तो अजवायन ,जीरा और गाजर के बीज मिलाकर लिया जा सकता है । किडनी की समस्या हो तो गाजर के बीज और धनिया मिलाकर सेवन करें ।
फिर बुलाइए ना !
बालकोनी में कपड़े सुखाते हुए जैसे ही इंदुजी ने मुझे देखा , वैसे ही तुरंत उन्होंने गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया । दरवाजे पर मेरे पहुंचने पर वे बहुत आत्मीयता से गले मिलीं । मन कितना हर्षित और तृप्त हुआ ; बताया नहीं जा सकता !
अमेरिका से उन्हें आए कुछ दिन बीत चुके थे , लेकिन मिलना नहीं हो पाया था । "चलो धूप में बाहर बालकोनी में बैठते हैं ।" कहते हुए वे मेरे लिए मिष्ठान्न भी ले आई थीं । उनकी फुर्ती देखते बनती है । मैं सच कहती हूँ; मैं हो ही नहीं सकती इतनी अधिक फुर्तीली ! मसालेदार चाय की चुस्कियां लेते हुए हमारी गप्पबाज़ी होने लगी । आई पैड पर उनकी दक्षता देखकर मुझे बहुत हर्ष का अनुभव हुआ . "अब ये जरूर ब्लॉग लिखना शुरू कर सकती हैं ; बस इन्हें प्रेरित करते रहना पड़ेगा ।" मैंने मन में सोचा ।
" दोपहर के भोजन का समय हो गया है ; चलो खाना खाया जाए ।" उन्होंने पूछा तो मैंने सहर्ष सहमति जताई .
"गेहूँ की रोटी खाओगी , बाजरे की या मक्का की ?"
"वाह ! कितनी चॉइस है । इंदुजी का भी जवाब नहीं ।" मैंने सोचा । कोई औपचारिकता तो निभानी थी नहीं । मैंने कहा ," बाजरे की रोटी खानी है । सालों-साल साल बीत गए, बाजरे की रोटी खाए !"
तुरंत बाजरे का आटा गूंधकर , इंदुजी ने मुझे दही में जीरा पावडर डालने का निर्देश दिया और थाली में बेसन के चीले की सब्जी रख दी । एक सूखी सब्जी भी थी । अब रसोईघर में ही गर्मागर्म पतली पतली बाजरे की रोटियों का लुत्फ़ मैं उठाने लगी । वाह ! क्या बाजरे की रोटियाँ थीं । पेट में ही नहीं वे तो सीधे आत्मा में उतर गईँ ! स्नेहसिक्त आटे में भावविभोर हृदय का प्रेम समा गया था । इंदुजी ने भी खाना खाते हुए कहा , " इतनी स्वादिष्ट बाजरे की रोटी तो कभी कभी ही बन पाती हैं ।"
इंदुजी ! मुझे दोबारा फिर आना पड़ेगा, आपके हाथ की बाजरे की रोटी खाने के लिए।
अमेरिका से उन्हें आए कुछ दिन बीत चुके थे , लेकिन मिलना नहीं हो पाया था । "चलो धूप में बाहर बालकोनी में बैठते हैं ।" कहते हुए वे मेरे लिए मिष्ठान्न भी ले आई थीं । उनकी फुर्ती देखते बनती है । मैं सच कहती हूँ; मैं हो ही नहीं सकती इतनी अधिक फुर्तीली ! मसालेदार चाय की चुस्कियां लेते हुए हमारी गप्पबाज़ी होने लगी । आई पैड पर उनकी दक्षता देखकर मुझे बहुत हर्ष का अनुभव हुआ . "अब ये जरूर ब्लॉग लिखना शुरू कर सकती हैं ; बस इन्हें प्रेरित करते रहना पड़ेगा ।" मैंने मन में सोचा ।
" दोपहर के भोजन का समय हो गया है ; चलो खाना खाया जाए ।" उन्होंने पूछा तो मैंने सहर्ष सहमति जताई .
"गेहूँ की रोटी खाओगी , बाजरे की या मक्का की ?"
"वाह ! कितनी चॉइस है । इंदुजी का भी जवाब नहीं ।" मैंने सोचा । कोई औपचारिकता तो निभानी थी नहीं । मैंने कहा ," बाजरे की रोटी खानी है । सालों-साल साल बीत गए, बाजरे की रोटी खाए !"
तुरंत बाजरे का आटा गूंधकर , इंदुजी ने मुझे दही में जीरा पावडर डालने का निर्देश दिया और थाली में बेसन के चीले की सब्जी रख दी । एक सूखी सब्जी भी थी । अब रसोईघर में ही गर्मागर्म पतली पतली बाजरे की रोटियों का लुत्फ़ मैं उठाने लगी । वाह ! क्या बाजरे की रोटियाँ थीं । पेट में ही नहीं वे तो सीधे आत्मा में उतर गईँ ! स्नेहसिक्त आटे में भावविभोर हृदय का प्रेम समा गया था । इंदुजी ने भी खाना खाते हुए कहा , " इतनी स्वादिष्ट बाजरे की रोटी तो कभी कभी ही बन पाती हैं ।"
इंदुजी ! मुझे दोबारा फिर आना पड़ेगा, आपके हाथ की बाजरे की रोटी खाने के लिए।
तैयार हैं न आप ?
Sunday, January 27, 2013
प्रतीक्षा !
मेरा आँगन सूना है ।
बिल्ली उपालम्भ देकर ,
धीरे से खिसक जाती है ।
कुक्कुर की भौं भौं ,
व्यर्थ चली जाती है ।
चिडिया कनखियों से देखती
चुपचाप दाने चुगती है ।
अब चूँ चूँ कौन कहेगा ?
उनको देखकर इशारा कर,
"ओऊ ओऊ " कौन करेगा ?
पवन हैरान है .........
"नन्हे नन्हे वस्त्रों को,
झूला कैसे झुलाऊँ ?
कहाँ विलुप्त हो गये वस्त्र ?
दिखते क्यों नहीं ? "
सोचकर परेशान है !
पार्क में बच्चों का खेलता हुजूम ,
बार बार बरामदे को निहारता है .
नन्हे की झलक पाने को आतुर आँखें
निराश होकर दोबारा क्रिकेट बैट पर,
टिक जाती हैं ।
अचानक एक नन्हीं आवाज,
कानों में पडती है ;
"आंटी , वह कब आएगा ?
उसको "पाली पाली" करनी है "
दो भोली आँखें प्रश्न कर रही हैं ।
मैं सिहर जाती हूँ !
सूनेपन में डूबे दो मौन अश्रु ,
मेरे हृदय को बींधते हुए लुढक जाते हैं ।
अस्फुट उत्तर निकलता है ;
"दादी भेजेगी, तब आएगा "
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