Sunday, August 24, 2025

'राही' सर; प्रेरणा के स्रोत!

तृतीय कालांश में दसवीं कक्षा को पढ़ाने के बाद में नीचे स्टाफ रूम में आई, तो पता चला कि डॉक्टर राकेश 'राही' ने हमारे विद्यालय में नए प्रिंसिपल का पदभार संभाला है। उनकी नियुक्ति पदोन्नति की वजह से नहीं; बल्कि सीधे ही इसी पद पर हो गई थी। वे स्टाफ रूम में सबसे परिचय करने के लिए आए, तो बड़े ही हंसमुख व गरिमामय व्यक्तित्व के धनी प्रतीत हो रहे थे।

 यद्यपि कई बार प्रतीत कुछ और होता है; और वास्तविकता कुछ और होती है। लेकिन 'राही' सर के संदर्भ में ऐसा नहीं है। उचित मार्गदर्शन देते हुए वे सर्वदा सभी को प्रोत्साहित ही करते रहे हैं। कार्य क्षेत्र में कोई भी कठिनाई आने पर वे उचित समाधान बताते हुए पूरी तरह सहयोग देते रहे।

 जहां अच्छे कार्य की उन्होंने हमेशा सराहना की; वहां किसी भी गलत परिस्थिति से कभी समझौता नहीं किया। निडरता के साथ संवेदनशील होना भी उनकी एक अनूठी विशेषता है। मुश्किल की घड़ियों मे उनके एक वाक्य ने ही मुझे बहुत प्रोत्साहित किया था; "कौन कहता है, आसमान में छेद नहीं होता? एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।" 

 वे उप शिक्षानिदेशक के पद से सेवानिवृत हो रहे हैं। इन क्षणों में उनके लिए कुछ भावभीनी पंक्तियां मेरी ओर से समर्पित है:


आपके व्यक्तित्व में,

ठहराव है; समर्पण है। 

कुछ ठोस, संकल्प क्रियान्वन का प्रण है।


उचित सम्मान देते हुए, 

अपनी छत्रछाया में, 

सबको जोड़ लेते हैं। 

बाधाएं आई तो,

त्वरित मोड़ देते हैं। 


आभामय मुख मंडल पर 

चिर परिचित मुस्कान;

लंबी थकान को भी 

कर दे तुरत निष्प्राण।


 स्फूर्ति युक्त, सरल हृदय; 

निडरतापूर्ण, विविध निर्णय;

अनुप्रेरित करते पल-पल, 

कहीं नहीं, किंचित संशय।


नव प्रेरणा से अनुप्राणित करती,

उर्ध्व चेतना का विस्तार।

अपने वितरित किया, 

सहकर्मियों में साहस अपार।


छत्रछाया में आपकी,

विविध दक्षताएं हुईं ग्रहण।

आपके कृतित्व को, 

उदार व्यक्तित्व को, 

वंदन! नमन! अभिनंदन!!

Wednesday, August 20, 2025

ओम प्रकाश सर; एक सरल व्यक्तित्व

  ओमप्रकाश सर के स्वभाव की सरलता किसी से छिपी हुई नहीं है। कर्मयोगी ओमप्रकाश सर को इधर-उधर की बातों से कोई मतलब नहीं। बस वे अपना कर्तव्य निभाने में हमेशा तत्पर रहते हैं। उनका जन्मदिन का अवसर भी है; और सेवानिवृत्ति भी समीप है। इन क्षणों में हृदय से कुछ पंक्तियां उनके लिए समर्पित है;


कोई गीता पढ़ता है। 

कोई गीता सुनाता है।

लेकिन आप तो गीता को जीते हैं।


 "मा कर्मफल हेतु: भू:"

 आपने अक्षरश: अपनाया है।

 और "मा ते संगो अस्तु अवकर्मणि" 

 में आपका पूर्णतया विश्वास है।

 इसके कार्यान्वयन हेतु,

 मैंने आपको सर्वदा ही कार्यरत पाया है।


 "सुखे दु:खे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ"

 के मंत्र का स्पष्ट अर्थ आपमें ही समाया है।

 घटित कुछ भी हो जीवन में, 

आपको मुस्काते हुए ही पाया है। 


नि:स्वार्थ सेवा भाव की प्रतिमूर्ति,

 आपके व्यक्तित्व में समाई है।

 न अधिक प्रसन्न, न अधिक खिन्न;

 योगी की सी परिभाषा आप में स्वयं चली आई है। 


समाहित है परोपकार, जिस व्यक्तित्व में अनुपम; 

उसे क्यों न नमन करें यह कृतज्ञ अंतर्मन।।

Wednesday, August 6, 2025

महेश पंत; निडर एवं मुखर

 मेरे सहकर्मी महेश पंत सेवानिवृत हो रहे हैं; विश्वास ही नहीं हुआ। निर्भीक एवं स्वतंत्र विचारों से परिपूर्ण उनका व्यक्तित्व अपने में ढेर सा साहस बटोरे हुए है। लकीर के फकीर होना उन्हें स्वीकार्य नहीं। रूढ़िवादिता से वे कभी सहमत नहीं हुए। नित्य नए प्रयोग करते हुए अपने विद्यार्थियों को वे बहुत रोचक ढंग से पढ़ाते रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व से सम्मोहित, उनके विद्यार्थी उनकी भूरी भूरी प्रशंसा न करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। सभी विद्यार्थियों और सहकर्मियों में प्रशंसनीय इस व्यक्तित्व को कुछ पंक्तियां समर्पित है:


मौन शब्दों से नहीं होता व्यक्त, 

हृदय का भाव उन्मुक्त।


भावों की गहराई, 

शब्दों की सतह पर कब समाई?


समय की शिला पर,

आपने छोड़ी है अमिट छाप;

अनेकों मानस पटल पर अंकित हैं आप।


सदाचार, सद्व्यवहार और सद् कृत्य,

परोपकार से भरा जीवन नित नित्य।


ज्ञान अर्जित और वितरित करने की आकांक्षा,

नूतन अन्वेषण, ज्ञान संग्रहण की चिर अभिलाषा। 


 सरल अभिव्यक्ति निडर व्यक्तित्व की परिभाषा, 

कठोर आदर्श, फिर भी अधरों पर मृदु भाषा! 


आपके व्यक्तित्व को प्रणाम बारंबार;

 पाएं आप प्रभु से, समृद्धि और हर्ष अपार!!

दही में सोना!

 कान की लौंग मैली हो गई थीं। सोचा कि इनको साफ कर लेती हूं। उन्हें धोकर और सुखाकर मेज पर रखा। कान में पहनने के लिए पेच खोलकर कान में लौंग पहनी। जैसे ही पीछे से पेच बंद करने लगी कि, पेच छूटकर मेरे हाथ से जा गिरा। 

 मैं डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठी थी। आसपास सब जगह पेच को ढूंढा। डाइनिंग टेबल पर, कुर्सी के नीचे, नीचे का फर्श आदि सब चीज हिला हिला कर अच्छी तरह से देख लिया। अपनी साड़ी को भी झाड़ कर देखा। और यहां तक की पूरे फर्श की झाड़ू भी लगा कर देखा। लेकिन पेच कहीं भी नहीं मिला। डाइनिंग टेबल के ऊपर भी बहुत ध्यान से देखा। परन्तु सोने का पेच तो, चमकता हुआ दिख ही जाता। 

 कहीं भी नजर न आने पर, मैंने सोचा कि अगर यहां पेच नहीं मिल रहा तो और कहां जा सकता है? और कोई तो घर में आया या गया नहीं। वह घर में मिल ही जाएगा। इसीलिए मैंने उसे ढूंढने का प्रयास छोड़ दिया। सोचा, कि अगर मिलना होगा तो यूं ही मिल जाएगा। अन्यथा दूसरा पेच खरीद लूंगी। उसके बाद मैने उन लौंगों को उठाकर एक डिब्बी में डाल दिया  और अलमारी में रख दिया। मैं दूसरे काम-काज में व्यस्त हो गई। 

दोपहर को रुद्रांश वापिस स्कूल से आया तो हम सब लंच के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। फ्रिज में से दही निकाल कर मैंने सब की कटोरियों में पहले से ही डाल रखी थी; जिससे कि वह बहुत ठंडी न रहे और सामान्य तापमान पर आ जाए। पूरा खाना परोस कर हम सब डाइनिंग टेबल पर खाने बैठे।

 अभी हमने थोड़ा सा ही खाना खाया था कि अचानक रुद्रांश बोल उठा, "दही में सोना!"

 मैं हैरान हो गई, "दही में सोना!" 

उसने कहा, "हां। मेरी दही में सोना चमक रहा है!"

 मैं तब और भी हैरान हुई कि दही में सोना कैसे चमक सकता है? तभी याद आया, अरे! कहीं मेरी कान की लौंग का पेच तो नहीं? 

मैंने कहा, "निकाल कर देख कि क्या है?"

  रुद्रांश ने उसे निकाला तो वह मेरी लौंग का पेच ही था।  पता नहीं कब, वह मेरे हाथ से छिटक कर, दही की कटोरी में जा गिरा और उसमें छिप गया। मुझे तो लगा था कि अब पेच नहीं  मिलेगा। लेकिन पेच इस तरह मुझसे आंख-मिचौनी खेलता हुआ दही में जा गिरेगा; मैंने सोचा न था।