बांसुरी स्वयं नहीं बजती;
प्रयास अपेक्षित है।
मधुर सृजन हेतु वांछित है,
अधरों का कंपन;
सधी हुई वायु का स्पंदन;
और दक्ष तर्जनी का प्रबन्धन;
तभी निस्सृत होगी सप्तस्वरी सरगम।
चेष्टा व्यर्थ नहीं जाती
अकर्मण्य रहकर,
आनंद रस की आकांक्षा करना,
दिवास्वप्न की भांति छलावा भर है।
पुरुषार्थ भरता है,
जीवन में रस और माधुर्य।
बांसुरी के स्वर को साधती है,
ऐसी सतत साधना,
जिसमें तल्लीनता का पूर्ण भाव हो।
और स्वयं को खो देने का साहस हो।
पूर्ण रस में निमग्न होकर,
डूबने का चाव हो।
आह्लादित कर दे जो प्राण प्राण को,
सुरों की सरिता में गोते लगा ले।
बांसुरी ऐसी बजे कि स्वयं को भी भुला दे।
गहन सप्तसुरों में डूबा आनंद,
जीवन को मदमस्त कर दे।
शिखर तक पहुंच पाएं प्राण;
तब विस्मृत हो भाव जग का।
ऐसी बजे बांसुरी कि,
निष्प्राण तन चहक उठे।
बांसुरी के स्वर फूटें,
तो सोए वाद्य हो उठें झंकृत,
पूर्ण अस्तित्व हो उठे पुलकित।
एक-एक छिद्र से निस्सृत कंपन,
विलीन कर दे तन, मन का आभास।
और प्राणों में संचरित हो,
सजगता, स्फूर्ति और विश्वास।
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