नदी ने इठलाकर कुएं से पूछा, "तू जानता है, तेरी क्या औकात है? तुझ में और मुझ में क्या अंतर है?"
कुएं ने हाथ जोड़कर कहा, "हां मैं जानता हूं कि मेरी क्या औकात है।
तुम जगह-जगह जाती हो और मैं यहीं रहता हूं। आखिर भटकाव और ठहराव में तो फर्क होता ही है।
तुम घूम-घूम कर प्यासों के पास जाती हो और मैं यहीं रहता हूं। प्यासे मेरे पास आते हैं।
तुम ऊपर से नीचे जाती हो। इससे तुम्हारा मीठा पानी धीरे-धीरे खारा हो जाता है। मेरा पानी नित्य प्रति नीचे से ऊपर चढ़ता ही रहता है; इसीलिए वह मीठा का मीठा ही बना रहता है।"
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