Tuesday, July 12, 2011

अपराध बोध

अचानक किसी आवश्यक कार्य से मेरा पिछले महाविद्यालय में जाने का मौका मिला . मुख्य द्वार से अन्दर जाते ही मेरी सबसे प्रिय प्राध्यापिका मुझे दिखाई दी . बड़े उत्साह के साथ मैंने उन्हें नमस्कार किया . "बहुत प्रसन्न लग रही हो . कोई विशेष खबर है तो सुनाओ ." उन्होंने बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में पूछा .
     "हाँ मैम. मेरी नियुक्ति राजकीय विद्यालय में अध्यापिका के पद पर हो गई है "
     "भई वाह ! अपने पढाए हुए बच्चे जब ऐसे समाचार सुनते हैं ; तो मज़ा ही आ जाता है "
     "मैम ! आपका ही आशीर्वाद है ." मैंने बहुत विनम्रता से कहा . वे मुझे अपने साथ स्टाफ रूम में ले गई और सबको यह खबर सुनाई. सभी ने मुझे बहुत शाबाशी दी . तभी अंग्रेजी कि प्राध्यापिका को कुछ याद आया . वे बोली " अगर इस इतवार को तुम्हे कुछ काम न हो तो कालेज आ जाओ ."
     मैंने कहा ,"अवश्य मैम !क्या काम है?"
     वे बोली ,"कम्पार्टमेंट बच्चों की परीक्षा में निरीक्षण का काम करना है . तीन घंटे की परीक्षा है . दस रूपये निरीक्षण भत्ते के रूप में मिलेगा . अगर पक्के तौर पर बताओ तो तुम्हारी ड्यूटी लगा दूं ?"
     एक तो उनके द्वारा दिए गए कार्य को मना नहीं कर सकती थी . दूसरी बात थी कि कालेज की परीक्षा में निरीक्षण का कार्य करना आकर्षक प्रतीत हो रहा था .मैंने तुरंत कहा ,"हाँ मैम ! मैं ज़रूर आ जाऊँगी.'
               निश्चित रविवार को परीक्षा हाल में मेरे साथ एक और भी निरीक्षिका नियुक्त थी . हमने सभी परीक्षार्थियों को उत्तर पुस्तिकाएं दी . फिर घंटी बजने पर प्रश्न पत्र बांटे . इसके बाद सबके हस्ताक्षर एक निश्चित फार्म पर लेने थे . एक छात्र से हस्ताक्षर करते समय मुझे लगा कि वह मेरे सामने सकुचा सी रही थी . मैंने उसे बड़े गौर से देखा . "अरे!" मैंने मन में सोचा ,"यह तो नीलम है . यह मेरे साथ आठवीं कक्षा में पढ़ती थी . क्या ये इतनी बार फेल हो गयी ,जो कि अब बी. ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा दे रही है ."
     नीलम झेंपी हुई सी हस्ताक्षर कर रही थी . मुझे समझ में नहीं आया कि उसे पहचान की स्वीकृति भरी मुस्कान दूं , या यह दिखाऊँ कि उसे पहचानती ही नहीं . उससे पहचान दिखाती तो वह मुझसे मदद की आशा अवश्य करती . यह सब मेरे लिए असमंजस का विषय हो जाता . मैं पूरे तीन घंटे इसी उहापोह में रही . परीक्षा समाप्ति की घंटी बजी . सभी से उत्तर पुस्तिकाएं इकट्ठी की गई. उससे उत्तर पुस्तिका वापिस लेते हुए मैं उससे नज़रें न मिला पाई. मुझे अपराध बोध हो रहा था . मैं उसकी मदद कर सकती थी .शायद वह पास हो जाती . लेकिन मैंने तो उसे इतना भी नहीं जताया कि मैं उसे पहचानती भी हूँ .
       वह चुपचाप परीक्षा भवन से बाहर चली गई . मैं कनखियों से उसे जाते हुए देखती रही . आज भी वह अपराध बोध मुझे कभी कभी कुरेदता है . फिर यह भी सोचती हूँ कि शायद उसकी मदद करना भी तो एक गलत काम होता. फिर भी पता नहीं क्यों ; आज भी मैं स्वयं को अपराधी ही मानती हूँ .



Saturday, July 9, 2011

No One Knows

Will there be;
 one more day in my life?
enjoying every happy moment,
laughing and cracking jokes,
seeing beauty of nature,
being appreciated
 by nears and dears
getting everything
 that one craves for,
and life seems bliss
then" Tomorrow" is
never cared for
not for a moment
this question
 strikes the mind
BUT; when the Sun dies
all hopes pass by
deep dark night
entraps you
no outlet is to be seen
dying embers chill down
signs of life start getting dull
then all of a sudden
you wake up
asking yourself
will there be,
one more day in my life ?
when a thing is
in your hand
you never value it
whenever it starts
slipping by
you want to
hold it tight.
till when can you hold it?
no one knows...........

Tuesday, July 5, 2011

सत्य होगा स्वप्न भी !

मैंने कब चाहा देखूँ सपना ?       
खुरदरी सतह पर, 
घिसते घिसते, 
पांव जब बने पत्थर .
संवेदना से रिक्त हुई, 
एक एक सिसकती कोशिका, 
तब शून्य चेतना लिए, 
बोझिल सा मस्तिष्क ,
यूं ही लुढ़क गया ,
पथरीले वीराने में .
आँख की अश्रुहीन पलकें, 
परस्पर  बनी संबल . 
और उस एक पल ;
जन्म हुआ अनायास ,
भोले से स्वप्न का.   
भविष्य के महलों में, 
सुंदर सी सेज सजा। 
मन गुदगुदाता सा, 
कोमल स्पर्श की, 
षडरस व्यंजनों की, 
मादक सुगंध की,
स्वर्णिम अनुभूति दे,
पल भर हंसा गया।
ओ मेरे भोले सपने, 
मैंने चाहा नहीं तुझे देखना।
तू स्वयं चला आया।
पर उपालंभ न दूँगी ,
कि तूने मुझे छला। 
मैं तो आभारी हूँ।
तिमिर के इस बीहड़ में ,
प्रकाश की किरण का, 
आभास तो हो पाया. 
कौन जाने कब, किस पल;
ये धुंधला आभास,
भर दे प्रकाश,
मेरी सुप्त चेतना में।
थक कर टूट चुकी थी जो, 
गहन वेदना में।
चेतना जागृत कर ,
प्रेरणा प्रदान कर ,
ओ नन्हे स्वप्न!
तूने मुझे जगा दिया।
नींद से उठा दिया।
मैंने कब चाहा देखूँ सपना ?
पर सच  को पाने का, 
चेतना जगाने का, 
प्रेरणा पाने का,
आधार तो है कल्पना।
अब तो चाहती हूँ मैं, 
देखना; एक और सपना!  


Sunday, July 3, 2011

इंदुजी के साथ एक सुबह

    




   मित्रों और सहेलियों से मिलने के बाद कुछ ऐसा प्रतीत होता होता है , मानो कि ऊर्जा का स्तर ऊर्ध्वगामी हो रहा हो . परन्तु किसी-किसी मित्र परिवार से इतनी आत्मीयता प्राप्त होती है , कि कहते नहीं बनता . इंदुजी का परिवार उसी में से एक परिवार है . 
       रविवार की सुबह जब मैं उनके घर पहुंची , तो मुदित ने मुख्य द्वार पर स्नेहपूर्ण अगवानी की. बिलकुल नहीं बदला मुदित! आठ वर्ष पहले जैसे मुदित को बंगलौर के बैनरघाटा रोड पर मैंने देखा था ; हूबहू वही छवि मेरे सामने उपस्थित थी . लगता ही नहीं कि आई .आई एम् अहमदाबाद से प्रबंधन में निष्णात होने के पश्चात्  विवाह भी कर चुका है . वही भोलेपन से परिपूर्ण मुखमंडल पर, गौरवपूर्ण आभा, ज्यों की त्यों विद्यमान है .
              घर के अन्दर प्रवेश किया तो इंदुजी और उनकी पुत्रवधू ज्योति फ्रूट चाट बना रहे थे; नाश्ते के लिए .   प्राची विवाह के पश्चात् अमेरिका से तीन सप्ताह के लिए दिल्ली आई हुई थी . विशेष तौर पर उसी से तो मिलने के लिए मैं वहां गई थी . हम खूब गले मिले . विवाह के बाद प्राची और भी अधिक सुंदर लग रही थी . वह केलिफोर्निया में गूगल के पास ही रहती है . हमने खूब गप्पें मारी . फ्रूट चाट खाई . ज्योति ने बहुत स्वादिष्ट चाय पिलाई . 
                       ऐसा लगा ही नहीं कि किसी और घर में बैठी हूँ . सबने ऋचा और अंकित के बारे में पूछा . उनके पति ने भाई के हाल चाल पूछे . उसके बाद तो मैं और प्राची कम्प्यूटर लेकर बैठ गए . प्राची ने मेरे ब्लाग देखे . उसने इंदुजी को भी दिखाए . मैं और प्राची इंदुजी से बार बार आग्रह करने लगे कि वो भी ब्लाग लिखें . इंदुजी की पाक शास्त्र में तो रूचि है ही साथ ही अन्य कलात्मक वस्तुएं बनाकर घर को सजाने सँवारने में भी उनकी पूर्ण निपुणता है . हमने उन्हें प्रेरित किया कि वे इसी प्रकार के ब्लाग लिखने प्रारम्भ करें . 
                  तभी ज्योति ने मेरे लिए बहुत स्वादिष्ट सैंडविच बनाया . मुदित से मैंने कहा ," बेटे एक सैंडविच और खिलाओ।" वह तुरंत ज्योति से एक और सैंडविच बनवा लाया . इंदुजी और बच्चे लंच तक वहीँ पर रुकने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे। इतने स्नेहपूर्ण वातावरण से हिलने का भी मन नहीं कर रहा था ; परन्तु रविवार एक था और काम अनेक . बोझिल मन से सबसे विदा लेती हुई मैं जब नीचे आ रही थी, तो घर के बाहर मुझे ज्योति मिली, जो कि बुटीक जा रही थी . मैंने उसे बहुत प्यार किया और वापिस अपने घर आ गई।

Thursday, June 23, 2011

कितनी आत्मीयता !





बस में चढ़ते ही टिकट के लिए दस रूपये का नोट बढ़ते हुए मैंने कहा ,"ज़रा अशोका पार्क तक की टिकट देना ." कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा ,"ये बस अशोका पार्क नहीं जायेगी . पांच रूपये की टिकट मुझसे लो और अग्रसेन अस्पताल से पांच रुपये में दूसरी बस पकड़ लेना . वैसे भी आपके दस रूपये ही लगने थे ."
            कभी कभी इतना अच्छा व्यवहार पाकर मन बहुत प्रसन्न होता है . अगर हर बार ही इतने अच्छे लोग मिल जाएँ तो कहना ही क्या ! पांच महीने के बाद एक मदर डेयरी बूथ पर दूध लेने गई तो पाया कि बटुए में केवल पांच सौ के ही नोट हैं . "तीन टोकन देना भैया ." पांच सौ का नोट बढ़ाते हुए मैं बोली . "मेरे पास खुले पैसे नहीं हैं . आप छोटा नोट दीजिए."
 " मेरे पास केवल पांच सौ वाले ही नोट हैं ."
" तो आप को जितने टोकन चाहिए ले लीजिये ;पैसे बाद में आ जायेंगे. "
              कितना अच्छा लगा कि इतना विश्वास कर रहा है यह व्यक्ति ! साथ ही शालीनता से बात भी कर रहा है . अगर धोखेबाजी न हो समाज में , तो शायद सभी एक दूसरे पर विश्वास कर सकते है . तब कितना बढ़िया समाज हो सकता है हमारा !
           अशोका पार्क का पोस्टमास्टर वहाँ पहुँचने पर दराज़ से चैक निकलता हुआ कहता है , "हमारी पब्लिक डीलिंग तो एक बजे ही खत्म हो जाती है . लेकिन कल हम दो बजे तक आपका इंतज़ार करते रहे ."
" हाँ आना तो कल ही था . लेकिन annual confidential report भरवाने के लिए स्कूल में जाना था . और कम्प्यूटर का server down था तो बहुत देर हो गई थी ." मैंने पूरी बात बताते हुए कहा .
  " आप ठीक कहती हैं . कम्प्यूटर तो हर डिपार्टमेंट में शुरू कर दिए गए हैं . लेकिन कुछ न कुछ समस्या ही आई रहती है ."  मुझसे राष्ट्रीय बचत पत्र लेते हुए पोस्टमास्टर ने कहा .
       चैक लेकर मैंने उसे धन्यवाद दिया . तब उसका कहना था," धन्यवाद किस बात का ? ये तो हमारी ड्यूटी  है. और कोई सेवा हो तो बताओ ."
      मेरे पास एक और सेवा मौजूद थी . मैंने कहा ,"इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से लैटर आया हुआ है कि टैक्स कम दिया गया है . फार्म नंबर 16 के साथ covering letter स्पीड पोस्ट कराना है . यह काम कृपया कर दें ."
                 उसने कहा ,"हमारा पोस्ट ऑफिस छोटा है . यहाँ यह नहीं हो सकता . आप रिक्शा ले लीजिये . वह दस रूपये लेगा और आपको पंजाबी बाग़ डाकखाने तक पहुंचा देगा . वहां पर आप स्पीड पोस्ट करा दीजिए ."
            भले मानस ने पूरा तरीका ही नहीं बताया बल्कि कहाँ से काम करवाना है, रिक्शावाला कितने रूपये लेगा आदि सब जानकारियाँ दे डाली . कितनी आत्मीयता दिखाते हैं यहाँ लोग !
             काम पूरा करने के बाद मुझे रिक्शा से बस स्टाप तक जाना था . " आपको कहाँ तक जाना है ?"  पीछे से आते हुए एक रिक्शाचालक ने पूछा . " बस स्टाप तक. "  मैंने कहा. 
    रिक्शावाला बोला, " आप मेरे रिक्शा में बैठ जाइए."   मैंने कहा,"दस रूपये दूँगी ."
       " हाँ हाँ . कुछ भी दीजिए.  मेरी अभी बोहनी नहीं हुई " वह बुज़ुर्ग रिक्शाचालक बोला .
     मैं रिक्शा पर बैठ गयी . चलते चलते वह बता रहा था कि वह नदी में नहा कर आया है ; केवल पांच रूपये किराया देकर.  वह बहुत खुश लग रहा था .  बस स्टाप मेरी आशा से अधिक दूरी पर था . अत: मैंने उसे पन्द्रह रूपये दे दिए . फिर तो वह बहुत अधिक प्रसन्न हो गया . जाते जाते बोला ," मैं ब्राह्मण हूँ .  आपको खूब खूब आशीर्वाद देता हूँ ." 
        मैं काफी हैरान हुई. अक्सर दिल्ली के रिक्शावाले थोड़े बदतमीज़ और बदमिजाज़ होते हैं . परन्तु यह तो निहायत ही शरीफ़ था . मैं सोच रही थी अगर हर दिन ही इतनी आत्मीयता से परिपूर्ण हो, तो जीवन जीने का मज़ा ही आ जाए !  

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Friday, June 17, 2011

गर्मी की छुट्टियाँ (5)

     छुट्टियों में कभी कभी कोई मेहमान आते तो खूब मज़े होते . घर में फ्रिज तो होते नहीं थे . माँ चार आने देकर बाज़ार भेजती . मैं दो आने के नीम्बू लाती और दो आने की बर्फ .उस समय बाज़ार में बर्फ की बड़ी बड़ी सिल्ली लेकर उसे बड़े जूट के बोरे से ढक दिया जाता था . पटरी पर बैठे बर्फ बेचने वाले लोग, इस सिल्ली मैं से ; एक नोकदार पेचकस की मदद से, निश्चित मात्रा में बर्फ को काटकर,ग्राहक को बेचते थे.घर आकर नीम्बू और बर्फ मैं माँ को पकड़ा देती . माँ बड़े से भिगोने में चीनी घोलती , उसमें नीम्बू डालकर अच्छे से मिलाती और फिर बर्फ डालकर बन जाता नीम्बू पानी . हम इसे शिकंजी कहते थे . मेहमान के साथ साथ हम बच्चों को भी गिलास भर भर कर शिकंजी मिलती थी . 
                                    एक बार गाँव से मेरी बुआ हमारे घर छुट्टियों में रहने के लिए आई . वे अपने साथ बहुत सी चीजें लाई थी . परन्तु मुझे सबसे अधिक पसंद आई , एक छोटी सी डलिया .गेंहू की फसल पकने पर गेंहू निकलने के बाद जो लम्बी लम्बी सींखें(तीलियाँ) बच जाती हैं ; ग्रामीण लोग उससे छोटी छोटी टोकरियाँ और डलिया बना लेते हैं . मैंने वह डलिया लेकर कहा,"बुआ! इसमें मैं अपने खिलौने रखूंगी."  बुआ ने ख़ुशी ख़ुशी वह डलिया मुझे दे दी .
                                                  घर के चौंके बर्तन या घर की सफाई आदि के काम माँ बुआ को नहीं करने देती थी . माँ कहती थी, "आप अपने में घर खूब घर के काम निपटाती हो . यहाँ पर तो बस आप आराम करो .परन्तु बुआ भी माँ की तरह ही थी . वे भी खाली बैठे वक्त नहीं गुज़ार सकती थी . वे माँ से बोली ,"भाभी! मुझे कुछ काम चाहिए . मैं खाली नहीं बैठ सकती ." माँ को याद आया ; ऊपर एक पुराना लकड़ी का चरखा पड़ा था और एक संदूक में रजाई से उधेडी हुई रुई भी पड़ी थी . माँ ने बुआ को चरखा और रुई दे दी . जितने दिन बुआ हमारे साथ रही तब तक खाली समय में उन्होंने खूब सारा सूत काट लिया था . माँ ने भी अपनी एक साडी में सुन्दर सुन्दर बूटे काढ लिए थे . और मेरा भी काफी सारा गृह कार्य निपट चुका था .
                                                            जब बुआ अपने गाँव वापिस जाने लगी तो हम सभी को बहुत दु:ख हुआ . बुआ भी उदास थी . माँ ने सुन्दर साड़ी रूपये और फल देकर उन्हें विदा किया . मैंने माँ से पूछा ,"माँ ! बुआ को साड़ी और रूपये क्यों देते हैं ?" माँ ने समझाया," घर की बहनों और बेटियों को बहुत सम्मान देना चाहिए . वे सर्वदा हमारे परिवार की शुभचिंतक होती हैं .इसीलिए उन्हें आदरपूर्वक कुछ न कुछ उपहार अवश्य दिया जाता है . जिससे कि वे हमसे हमेशा प्रसन्न रहे."
                                       पहले घरों में पीतल के बर्तन होते थे. उनमें खाना बनाने के लिए यह आवश्यक था की उनमें पहले कलई कराइ जाए . गली में अक्सर फेरीवाले आवाज़ लगते थे ,"बर्तन कलई करा लो! भांडे कलई करा लो !" माँ को स्वयं बर्तनों पर कलई करनी आती थी . इसलिए वे फेरीवालों से कलई नहीं कराती थी . मुझे पैसे देकर भेजती और कलई और नौशादर मंगवाती . फिर तेज़ जलती हुई अंगीठी पर बर्तन को तेज़ गर्म करके उसके अन्दर थोड़ी सी कलई लगाती . उसके बाद एक बड़े से रूई के टुकड़े में नौशादर का महीन चूरा लगाकर वे पूरे बर्तन के अन्दर कलई की परत चढ़ा देती . फिर तपते हुए बर्तन को एकदम ठन्डे पानी में डुबा देती थी . एकदम छन्न की आवाज़ होती और पानी से बाहर निकलने पर चमकदार कलई वाला बर्तन तैयार होता था .
                                                                इस प्रकार माँ रसोईघर के सभी बर्तनों को कलईदार बनाकर चमका देती थी . शाम को बाउजी ऑफिस से घर आते तो मैं बाउजी  को बताती,"बाउजी! आज माँ ने सब बर्तनों पर कलई चढ़ा दी है . " तब बाउजी बहुत प्रसन्न होते थे . हो सकता है, ये सुनकर उनकी सारी थकान भी मिट जाती हो!

Thursday, June 16, 2011

गर्मी की छुट्टियाँ (4)

             नए सत्र की पुस्तकें गर्मी की छुट्टियों तक खरीदी जा चुकी होती थी . हिंदी की पूरी पुस्तक मैं दो ही दिन में पढ़ डालती थी . बाकी पुस्तकें भी गाया बगाया पढ़ती ही रहती थी . पुस्तकों पर जिल्द चढाने का काम भी ज़रूरी होता था . बाउजी हम बच्चों से बाज़ार से अबरी मंगवाते . माँ से मैदा की लेई बनवाते ; जिसमे नीला थोथा भी डलवाते थे ताकि चूहे पुस्तकें न कुतर लें . फिर हम सब बच्चों के साथ बैठकर वे सभी पुस्तकों की जिल्द चढ़वाया करते थे . बाद में सभी पुस्तकों को ऊपर नीचे रखकर उन सब पर भारी वज़न रख दिया जाता , जिससे कि पुस्तकों पर चढ़े गत्ते बिलकुल सीधे रहें . अगले दिन सवेरे सभी किताबें की बढ़िया जिल्द बंध चुकी होती थी . 
                              छुट्टियों में कभी कभी सवेरे सवेरे ही माँ मूंग की दाल की पिट्ठी पीसती . मैं भी उसमें मदद करती थी . फिर हम दोनों उस पिट्ठी की मंगोड़ी बनाकर छत पर रख देते , तो शाम तक बिलकुल सूखी मंगोड़ीया मिलती थी कभी कभी माँ चावल के कुरकुरे और आलू के चिप्स भी सवेरे ही बनवा लेती . दिन में कड़ी धूप लगने पर शाम तक सभी चीजें शाम तक सूख जाती . फिर इनको कढ़ाई में तलकर खाने में बड़ा मज़ा आता था . गर्मी की छुट्टियों में बच्चों का कुछ न कुछ खाने का मन करता रहता . इसके लिए माँ पूरा कनस्तर भरकर आटे के बिस्कुट बनवा कर लाती . बिस्कुट की फैक्ट्री में अपना आटा, मक्खन , चीनी और दूध ले जाना होता था . फिर वहां बिस्कुट बनाकर दे दिए जाते और हम अपने कनस्तर में भर लाते . इसके बाद तो हमारी मौज होती थी . जब दिल आए, बिस्कुट निकालो और खाओ . जो स्वाद उन बिस्कुटों में था ,वैसा कहीं और नहीं मिल पाया . कभी कभी माँ मुझे एक किलो कच्चे चने भी देती थी , भुनवाने के लिए . मैं भाड़ पर जाती , जो कि पास में ही था . भाड़वाली स्त्री पहले भाड़ मैं आग जलाती. उस पर रेत से भरा बड़ा सा कढ़ाव रखती . जब वह रेत खूब गर्म हो जाता , तो उसमें कच्चे चने डालकर लकड़ी की डंडीयों से खूब हिलाती . चने खूब चटर पटर करते और खिल खिल जाते .फिर एक बड़ी सी छलनी में वह उन सभी को डालकर रेत छानकर अलग कर देती और चने मेरे थैले में ड़ाल देती . उन फूले भुने हुए चनों को लेकर मैं घर वापिस आती . माँ मुझे एक मुट्ठी गरम गरम चने तो तभी मुझे खाने के लिए दे देती थी .
             कभी कभी किसी चारपाई का बुना हुआ हिस्सा कमज़ोर होकर टूट जाता . तब प्रोग्राम बनता चारपाई बुनने का . मूंज घास की पतली रस्सियाँ लाई जाती . बाउजी और भाई मिलकर खाट बुनते . मैं चारपाई के एक पाए के पास बैठती और दूसरी ओर से बुनकर लाई हुई रस्सी पाए के नीचे से निकालती . कितनी कसी हुई और सुन्दर बुनाई होती थी चारपाई की ! बाद में अदवायन से खींचकर बुनाई को पूरा कस दिया जाता था . और इस तरह चारपाई दोबारा तैयार हो जाती थी इस्तेमाल के लिए .
          मैं कभी कभी सोचती हूँ की घर से दूर लाहौर में हॉस्टल में रहते हुए पढाई करके  बाउजी विज्ञान के स्नातक बने . फिर इतने सारे तरह तरह के काम उन्होंने कब और कहाँ सीखे ? डी ए वी कालेज के विज्ञान के  स्नातक थे तो अंग्रेजी भाषा पर तो पूरा अधिकार था. परन्तु उर्दू भाषा पर भी वे समान अधिकार रखते थे ; ये एक आश्चर्य का विषय है . जितने उन्हें शेक्सपीयर पसंद थे ,उतने ही ग़ालिब भी . रात को कभी कभी छत पर हमारा पूरा परिवार सोने से पहले गप शप करता . तब भाई भी अपने अपने तरह तरह के किस्से सुनाते और बाउजी भी . मैं रुचिपूर्वक सारे वार्तालाप का लुत्फ़ उठाती . बाउजी बहुत से शेर सुनाते  थे . उनमें से एक मुझे अब भी याद है :
     "दिल मत टपक नज़र से ,कि पाया न जाएगा .
     ज्यों अश्क फिर ज़मीं से , उठाया न जाएगा "