Monday, January 26, 2026

याचना

इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए 

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए


जीवन की टेढ़ी राहों में, 

चलकर न तुझको जान सका

आशाओं की झोली भर जाए, इक तेरा द्वारा मिल जाए 


मैं दीन हूं, दीन दयाल है तू

अल्पज्ञ हूं मैं, सर्वज्ञ है तू 

अज्ञान का पर्दा हट जाए, तेरा उजियारा मिल जाए


मैं नर हूं, तुम नारायण हो 

इतना तो भेद ज़रूरी है 

यदि शरण तेरी मैं आ न सका, नर तन तो दोबारा मिल जाए 


इक तेरी दया का दान मिले, इक तेरा सहारा मिल जाए

भवसागर में बहती मेरी, नैया को किनारा मिल जाए

Friday, January 23, 2026

कटहल का कमाल!

 देवदत्त एक कॉलेज में प्रोफेसर था। उसका कॉलेज बहुत दूरी पर था। सवेरे जब भी वह अपने कॉलेज के लिए जाता तो रास्ते में उसके प्रिंसिपल अभिषेक भी उसके साथ ही बैठकर कॉलेज तक चले जाते। प्रिंसिपल अभिषेक का घर बीच रास्ते में ही था। इसीलिए वे लगभग प्रतिदिन देवदत्त के साथ ही कॉलेज में जाते थे। देवदत्त को भी इसमें कोई आपत्ति न थी। उसे तो कॉलेज जाना ही होता था।

 देवदत्त का बहुत बड़ा सा घर था। उसमें तरह-तरह के पेड़ भी लगे हुए थे। नारियल के, नींबू के, आम के, केले के और एक बड़ा सा कटहल का पेड़ भी था। कटहल के पेड़ में बहुत कटहल आते थे; जिन्हें देवदत्त की मां कल्पना आस पड़ोस में बांट देती थी। लेकिन कोई कल्पना की मर्ज़ी के बिना कटहल ले जाए, तो उसे बहुत बुरा लगता था।

 एक बार ऐसा हुआ कि देवदत्त के पिता श्यामा प्रसाद बहुत बीमार हो गए। उनका बहुत इलाज़ कराया, लेकिन श्यामा प्रसाद बच न सके। उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए देवदत्त के कॉलेज से भी सभी प्रोफेसर आए। प्रिंसिपल अभिषेक भी साथ ही आए। थोड़ी देर के बाद सभी प्रोफेसर चले गए। 

प्रिंसिपल साहब कुछ अधिक देर तक वहीं बैठे रहे। उन्होंने देवदत्त के घर में सभी पेड़ों को देखा। उन्हें कटहल का पेड़ विशेष रूप से बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद प्रिंसिपल साहब भी अपने घर चले गए।

 एक दिन ऐसे ही कार में साथ-साथ जाते समय प्रिंसिपल साहब ने देवदत्त से पूछा, "इस कटहल के पेड़ में तो बहुत कटहल आते होंगे?"

 देवदूत ने कहा, "हां। जब मौसम होता है तो यह कटहल से भर जाता है।"

 प्रिंसिपल साहब कुछ अलग मिजाज़ के ही व्यक्ति थे। वे कंजूस भी थे और थोड़े लालची भी! तभी तो वे रोज देवदत्त के साथ ही कार में अपने कॉलेज जाया करते थे। अब उन्हें यह पता चल गया था कि देवदत्त के घर कटहल का पेड़ है। उन्हें कटहल पसंद भी बहुत थी।

 उन्होंने कहा, "देवदत्त! जब भी तुम्हारे पेड़ में कटहल आए तो मुझे अवश्य देना।" देवदत्त ने सहर्ष सहमति दे दी। 

 कटहल का मौसम आने पर देवदत्त एक बोरा भरकर कटहल प्रिंसिपल साहब के लिए ले आया। देवदत्त की मां कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे तो प्रिंसिपल साहब वैसे भी बहुत पसंद नहीं थे। इस पर उन्होंने जबरदस्ती ही कटहल भी मांग लिए थे। देवदत्त ने भी पूरा बोरा भरकर उन्हें कटहल दे दिए थे।  वह इस बात से बहुत परेशान थी। 

 कल्पना को यह समझते देर न लगी, कि अब प्रिंसिपल साहब के पास, हर बार ही कटहल का एक बोरा ज़रूर जाया करेगा। कल्पना ने सोचा, कि देवदत्त को अगर मना किया गया, तो भी वह रुकेगा नहीं। वह प्रोफेसर साहब को कटहल अवश्य देगा। वह उनको कटहल न दे, इसके लिए प्रिंसिपल साहब से देवदत्त के मन की दूरी बनाना आवश्यक था। इसीलिए उसने देवदत्त को प्राय: यह कहना शुरू कर दिया, कि ये प्रिंसिपल साहब अपनी गाड़ी में क्यों नहीं जाते? यह रोज़ तुम्हारे साथ ही क्यों कॉलेज जाते हैं? 

पहले तो देवदत्त ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपनी मां की बात प्रतिदिन सुनते-सुनते, धीरे-धीरे उसे स्वयं भी लगने लगा, कि प्रोफेसर साहब हर रोज़ उसके साथ जबरदस्ती ही जाते हैं। उसे भी यह बात खटकने लगी। अब रोज़-रोज़ प्रोफेसर साहब को अपने साथ ले जाना उसे भार की तरह लगने लगा। 

अब उनसे पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे? उन्हें मना तो किया नहीं जा सकता था। उसे एक तरकीब सूझी। उसके घर से कॉलेज बहुत दूर पड़ता था। पेट्रोल का भी काफी खर्च आता था। इसीलिए उसने सोचा कि कॉलेज के अंदर ही जो सरकारी क्वार्टर हैं; उसी में वह रहना शुरू कर देगा। इससे पेट्रोल का खर्चा भी बचेगा और प्रिंसिपल से भी छुटकारा मिलेगा। जितना उसका मकान किराया भत्ता कटेगा, उतने का तो पेट्रोल ही खर्च हो जाता था।

 उसने तुरंत सरकारी क्वार्टर के लिए आवेदन कर दिया। उसको मकान मिल भी गया। उसने घर जाकर प्रसन्नता से अपनी मां कल्पना को बताया कि अब हम सरकारी क्वार्टर में रहेंगे। प्रिंसिपल अब मेरे साथ नहीं जाया करेंगे। यह झंझट खत्म हुआ। 

लेकिन मां कल्पना को यह बात सुनकर, तनिक भी खुशी नहीं हुई। उसे तो अपने मकान में ही रहना था। उसे सरकारी मकान में नहीं जाना था। 

उसने कहा,"नहीं। हम अपने मकान में ही रहेंगे। सरकारी मकान में क्या करेंगे जाकर? जब अपना मकान इतना अच्छा है। तो इसे क्यों छोड़ेंगे?"

 लेकिन देवदत्त ने कहा, "मां! एक तो प्रिंसिपल साहब से छुटकारा मिल जाएगा। और दूसरा मकान से कॉलेज की बहुत अधिक दूरी है। तो समय भी बचेगा और पेट्रोल भी। इसीलिए हम सरकारी मकान में ही रहेंगे।"

 घर का सामान शिफ्ट होते समय कल्पना सोच रही थी, "इससे अच्छा तो यह था कि भले ही प्रोफेसर साहब हर साल एक बोरा कटहल ले लेते, लेकिन कम से कम हम अपने मकान में तो रहते!"

केवल कटहल के कारण कितना बडा कमाल हो जाएगा; यह तो कल्पना की कल्पना में भी नहीं था!

Saturday, December 27, 2025

सिर की खुश्की

 सर्दियों के मौसम में प्रायः सिर में खुश्की हो जाती है। इसके कारण सिर में खुजली भी होती रहती है। सिर की खुश्की को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय है, एलोवेरा का जैल! एलोवेरा का जैल सिर में लगाने से सिर की खुश्की पूरी तरह से दूर हो जाती है।

 एलोवेरा जेल में एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टी होती है। यह सिर की त्वचा के संक्रमण को पूरी तरह नष्ट कर देता है और साथ ही यह सिर में नमी भी बनाए रखता है। 

एलोवेरा जैल को सिर में मलकर पन्द्रह मिनट तक रहने दें। इसके बाद सादे पानी से सिर को अच्छी तरह से धो लें। इससे सिर की खुश्की दूर हो जाएगी और बाल भी मुलायम रहेंगे।

Saturday, December 6, 2025

सत्तर का सुख

 सत्तर मधुमास ही बीते हैं; 

यह जीवन, अब उपवन जैसा।

फूलों से लदी, सभी क्यारी,

यह जीवन; मधु मधुबन जैसा।

 

प्रसुप्त चेतना जगी अभी;

थिरका अब सांसों में प्रवाह।

भूले भूले से जीवन में,

चेतनता जागी बन उछाह।


अब गाती वसुधा मंगल धुन, 

यह जलधि हिलोरे लेता है।  

नभ बरसाता, उद्दीप्त तेज;

तब पवन ऊर्जा भरता है।


पुलकित प्राणों में मंद-मंद, 

सद्भाव संचरित होता है।

नव आशाओं की सरगम में, 

उल्लास प्रस्फुटित होता है।


जीवन अब अधिक स्पष्ट हुआ; 

अब मौन प्रेरणा आती हैं।

निज जीवन है, बहुमूल्य बहुत;

यह सोच, स्फुरित कर जाती है। 


 सोया जीवन अब जागा है। 

 भीतर माधुर्य, भरा है अब।

 जंजाल व्यर्थ थे, पल-पल के,

 अंतर्आलोक जगा है सब। 


पाथेय बना पिछला जीवन,

अनजाने, मूक, अग्रपथ का।

दृढ़ निश्चय संबल होगा अब,

नित जर्जर होते इस रथ का।


मन बने सबल, क्या और चाह?

जीवन से अधिक अपेक्षा क्यों?

पूरे हों सब कर्तव्य तो फिर,

धर दें ये चदरिया, ज्यों की त्यों!






Tuesday, December 2, 2025

श्वान संरक्षण

 बंगाल के नवद्वीप शहर में एक सार्वजनिक शौचालय के बाहर नवजात शिशु पडा हुआ था। उसके चारों तरफ एक सुरक्षा चक्र था। जानते हैं किसका? सड़क के कुत्तों का। जी हां! उन कुत्तों ने उस नवजात शिशु के चारों ओर घेरा बनाकर उसे सुरक्षा प्रदान की हुई थी। ऐसा लग रहा था, मानो वह उन्हीं का अपना बच्चा हो! पूरी रात वे ऐसे ही खड़े रहे; जब तक कि वहां कोई व्यक्ति नहीं आ गया।

रात भर लोगों को किसी नन्हे शिशु के क्रंदन की आवाज आती रही। लेकिन सभी ने सोचा कि किसी घर के अंदर ही कोई बच्चा रो रहा है।

 भोर होने से पहले ही राधा भौमिक, सार्वजनिक शौचालय में निवृत्त होने के लिए गई। वह हैरान हुई यह देखकर, कि वहां कुत्तों का घेरा था। जब उसने घेरे के बीच में से झांका; तो एक नन्हा शिशु वहां लेटा हुआ था। उसने आगे बढ़कर वह बच्चा अपनी गोद में उठा लिया। कुत्तों ने भी उसे वह बच्चा उठाने दिया। जब वह बच्चा उठा चुकी और कुत्तों ने देखा कि वह सुरक्षित है तो वे वहां से चले गए। 

राधा ने अपनी बहू प्रीति को बुलाया और उसे वह बच्चा पकड़ा दिया। प्रीति तुरंत उसे पास के महेश गंज अस्पताल में ले गई। वहां के डॉक्टरों ने उस शिशु को कृष्णा नगर सदर अस्पताल में पहुंचा दिया। बच्चे के माथे पर थोड़ा खून था। परंतु डॉक्टर ने कहा कि वह जन्म के समय ही रहा होगा। बच्चे को जन्म के एक-दो घंटे के अंदर ही बेसहारा छोड़ दिया गया था। पुलिस वालों ने आसपास पूछताछ भी की। लेकिन कुछ पता न चला। उन्होंने उस बच्चे को बाल कल्याण समिति की सुरक्षा में भेज दिया।

वहां के लोग इस घटना से बहुत हैरान थे। लेकिन तभी उन्हें नौ वर्ष पहले कोलकाता में हुआ एक और किस्सा याद आ गया।  तब भी गली के कुत्तों ने एक नवजात कन्या शिशु को कौवों से बचाया था। उन्होंने तब तक उस शिशु को बचाए रखा, जब तक कि लोग उस कन्या को अपनी सुरक्षा में लेने के लिए नहीं आ गए।

ये घटनाएं वास्तव में बहुत विस्मय और उत्सुकता से भरी हुई हैं। 

गली के आवारा कुत्तों को हम परेशानी का कारण मानते हैं। हम यही मानकर चलते हैं कि यह कुत्ते अचानक काट सकते हैं। यह तो हम कल्पना ही नहीं कर सकते कि वे किसी नवजात मानव शिशु को ऐसे ही छोड़ देंगे। ऐसा लगता है कि सद्योजात मानव शिशु को तो शायद वे खा ही जाएंगे। यह बहुत अधिक आश्चर्य का विषय है कि उन मूक प्राणियों में सामूहिक रूप से, इतनी अधिक दया, करुणा और ममता एक इंसान के बच्चे के लिए विद्यमान थी। प्रकृति में जीव-जंतुओं का व्यवहार कभी-कभी तर्क और बुद्धि के परे होता है।

Monday, December 1, 2025

जीवन का आस्वादन

 यह जीवन पुष्प सुकोमल है 

 मानव मधुकर, मकरंद तू पी

 ले आश्रय सुखद सुगंधि में

 इस जीवन का पल-पल तू जी 


 है मूल्यवान यह कोमल रस,

 तुझको लगता है सुलभ प्राप्य?

 तूने तप किया कई जन्मों;

 तब पाया जीवन, अहोभाग्य!


 यह कुसुम नहीं मुरझाएगा;

 यह सत्य नहीं, यह मिथ्या है

 मुकुलित कब तक रह पाएगा?

 यह तुझ पर निर्भर करता है 


 तू एक घूंट में ही लेकर 

 पूरा रस ही पी डालेगा

 तो जीवन रूपी प्रिय प्रसून

 कैसे अस्तित्व संभालेगा?


 धीरे-धीरे इसके रस का, 

अंतर्मन से आस्वादन कर

 कुछ तर्क लगा, कुछ रख विवेक

 चंचल मन में परिवर्तन कर 


 यह पुष्प मिला वरदान तुझे 

 इसके रस का अमृत तू चख।

 पर खिला रहे यह चिर वेला,

 यह सोच। हृदय में धैर्य भी रख।


 जल्दी क्यों है? क्या और काम?

 तुझको जाना किस और ठान?

 यह सुंदर पुष्प मिला तुझको

 कर धीरज से मकरंद पान  


अब धीरज रखकर ही पीना,

जीवन का मधुर सुधा रस तुम

 नादानी होगी आतुरता,

 सत्वर कुम्हलेगा सौम्य कुसुम


नींद की समस्या

 किसी किसी को यह समस्या आ जाती है कि रात को नींद नहीं आती। रात को नींद अच्छी आए, इसके लिए ज़रूरी है कि दिन में बिल्कुल भी न सोया जाए। दिन में यथाशक्ति शारीरिक श्रम किया जाए। सवेरे जल्दी उठना और रात को जल्दी सोना भी नींद न आने की समस्या को दूर करता है।

 सवेरे उठने के बाद एक गिलास पानी पिएं। उसके बाद नित्य कर्म से निवृत्त होकर हल्का-फुल्का व्यायाम और प्राणायाम करें। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी; ये दो प्राणायाम तो अवश्य ही करें। प्राणायाम करने से पहले नाक में एक-एक बूंद बादाम का तेल डाल लें। हल्का सा बादाम का तेल माथे पर भी लगा लें।

 सवेरे का नाश्ता भारी नहीं होना चाहिए। दोपहर के भोजन में दो कच्ची प्याज अवश्य ही खाएं। कच्ची प्याज में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनसे शरीर में मेलाटोनिन की मात्रा बढ़ जाती है। यह नींद लाने के लिए एक आवश्यक हार्मोन होता है।

 दोपहर के भोजन के कुछ देर बाद, द्राक्षासव का सेवन करें। रात को खाने में प्याज की सब्जी हो, तो बहुत अच्छा रहेगा। रात का भोजन, सोने से लगभग दो घंटे पहले कर लें। रात का भोजन भी हल्का-फुल्का ही रखें। 

रात को खाने के बाद बहुत अधिक पानी न पिएं, न ही कोई अन्य तरल पदार्थ लें। इसके अलावा रात के भोजन के बाद किसी भी प्रकार की मिठास वाले पदार्थ, कॉफी, चाय इत्यादि भी नहीं लेनी चाहिए। यह सब नींद में व्यवधान डालने वाले कारक होते हैं। आशावादी दृष्टिकोण रखें। मन में नकारात्मकता न आने दें। सोने से पहले, दस-पन्द्रह मिनट अनुलोम विलोम प्राणायाम कर लें। इससे नींद अच्छी आती है।

सुबह नाश्ते के आधा घंटा बाद और रात के खाने के आधा घंटा बाद, एक-एक मेधावटी का सेवन करें।