Sunday, November 30, 2025

सतरंगी अनुभूतियां

 सुबह उठी, तो बहुत थकावट महसूस हो रही थी। लग रहा था कि समय कम है; और काम अनेक! अक्सर एक दिन में एक काम निपटाया जाए; उसी में ही सारा दिन व्यतीत हो जाता है। शरीर की ऊर्जा की भी एक सीमा निश्चित होती है। उससे ज्यादा काम करने पर शरीर प्रतिरोध करता है।

 बात यह थी कि मुझे वार्षिक जीवन प्रमाण पत्र बैंक में देना था। वह भी एक बैंक में नहीं, बल्कि दो बैंकों में। दोनों बैंक काफी दूरी पर हैं। यद्यपि बैंकों में पैदल ही जाया जा सकता है; पर मुझे लग रहा कि थकान बहुत अधिक हो जाएगी। मैंने निर्णय किया कि आवश्यक दस्तावेज लेकर, मैं एक बैंक का काम निपटाकर घर वापस आ जाऊंगी।

 घर से निकली, तो थके-थके से कदम लग रहे थे। मंदी-मंदी धूप थी और हल्की-हल्की ठंड भी। चलना अच्छा तो लग रह रहा था; लेकिन यही महसूस हो रहा था कि एक बैंक का काम ही निपट पाएगा। उसके बाद में घर आ जाऊंगी। 

 जैसे-जैसे बैंक की ओर गई थकान का अनुभव कम होने लगा। रास्ते में एक विद्यालय पड़ता है। वहां एक युवा लड़की ने मुझे रोक लिया। उसने पूछा, "क्या आप बीमा करना चाहती हैं?"

 मैंने कहा, "अभी मैं बता नहीं सकती। पहले बच्चों से बात करूंगी। तब तुम्हें बता सकती हूं।"

 उसने मुझे अपना कार्ड दे दिया और अनुग्रह किया कि मैं उससे ही बीमा कराऊं। मैंने मुस्कुराकर उससे कार्ड ले लिया। अब मैं आगे बढ़ी। मैंने सोचा यह कितना प्रयत्न कर रही है कि इसे कोई ग्राहक मिल जाए और इसका काम आगे बढ़े। प्रयत्नशील तो होना ही चाहिए।

 यही सोचती सोचती आगे चलती गई। आगे चलते-चलते रास्ते में कुछ बुजुर्ग व्यक्ति मिले। जो काफी बड़ी उम्र के लग रहे थे। बहुत  संभ्रांत परिवार के लग रहे थे। वे कार में भी जा सकते थे। लेकिन वे पैदल ही जा रहे थे। मैंने सोचा यह जब ये बुजुर्ग बड़े मजे में हंसते हुए, बातें करते हुए अपने काम के लिए चलकर जा रहे हैं; तो मैं पैदल क्यों नहीं चल सकती? वास्तव में शारीरिक शक्ति तो आवश्यक है ही। लेकिन यदि मन में भी शक्ति का संचार हो जाए तो तन की शक्ति द्विगुणित हो जाती है। जब मेरे तन में शक्ति संचरित हुई, तो मैं रास्ते के तरह-तरह के नज़ारे का मज़ा लेते हुए, धीरे-धीरे अपने बैंक तक पहुंच गई।अब तक शरीर की थकावट काफ़ूर हो चुकी थी।

 मैंने सोचा यह था कि बैंक में काफी भीड़ भड़क्का होगा। घंटा दो घंटा तो बैठना ही पड़ेगा। तब नंबर आएगा। तभी अपना काम निपटा पाऊंगी। लेकिन मैं हैरान हुई देखकर, कि वह बैंक लगभग खाली था। जहां मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना था वह काउंटर तो बिल्कुल ही खाली था। मुस्कुराते हुए वहां के क्लर्क ने मेरा फॉर्म लिया। उसका नंबर अपने कंप्यूटर में डाला। मेरी फोटो अपने फोन से खींची। तुरंत मेरा जीवन प्रमाण पत्र सर्टिफाई हो गया। वाह! क्या स्पीड थी? मज़ा आ गया!

 मैं वहां खड़ी हुई अचंभा कर रही थी; कि कितनी फुर्ती से काम हो गया। तभी मेरे सामने एक महाशय आए। बोले, "आप यहां कैसे?"

 मैंने भी उन्हें पहचानने की कोशिश की। मैंने कहा, "अरे आप मिस्टर वोहरा है?"

वे बोले, "हां! हां! मैं वही हूं।"

 बात यह थी कि उनकी पत्नी संतोष वोहरा मेरे साथ ही अध्यापिका थी। उन्हें देखे मुझे लगभग पंद्रह वर्ष तो हो ही गए होंगे।  आज बड़े दिनों बाद उन्हें देखा तो थोड़ा पहचानने में दिक्कत आई। वे बहुत खुश मिजाज व्यक्ति हैं। परन्तु आज कुछ मायूस से लग रहे थे। मैंने पूछा, "सब ठीक-ठाक तो है न?"

 उन्होंने बताया कि उन्हें ब्लड कैंसर हो गया है। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। उनकी उम्र करीब लगभग 77 वर्ष की होगी। उनका बेटा और बहू डॉक्टर हैं। उनका इलाज बहुत कामयाब डॉक्टर से चल रहा है। लेकिन फिर भी वह कह रहे थे कि बचने की उम्मीद ज्यादा नहीं है। मैंने उनसे अपनी सहकर्मी संतोष वोहरा के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उसकी पैर की हड्डियों में भी दर्द होता है और कई परेशानी चल रही हैं। यह बात सुनकर मुझे बहुत ही अफसोस हुआ। कहां तो मैं प्रसन्न हो रही थी कि मेरा बैंक का काम चुटकियों में निपट गया था; और कहां मुझे दुःख हो रहा था कि मेरी सहकर्मी और उनके उसके पति इतनी परेशानी में हैं। 

खैर! हम वहां बैठ गए। हमने थोड़ी देर बातें की। वे कह रहे थे कि हमारी शादी की पचासवीं सालगिरह है। हमारे पचास साल लड़ाई झगड़े में ही बीते। मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा, "आप बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं। आप तो संतोष को बहुत प्यार करते हैं।  उसके गले में हाथ डालकर, आप कहते थे: "मेरी तोशी! मेरी तोशी! मुझे सब याद है।"

 वे भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, "आप घर क्यों नहीं आती हो? संतोष आपको बहुत याद करती है। आप घर आओ। मैं पकोड़े बनाकर आपको खिलाऊंगा और साथ में चाय भी पिलाऊंगा।"

 मैंने कहा, "हां! मैं जरूर आऊंगी। मुझे संतोष के हाथ के परांठे भी खाने हैं। दिसंबर में तो आप अपनी शादी की पचासवीं वर्षगांठ मना ही रहे हैं। तभी आऊंगी।"

 उन्होंने कहा, "नहीं आपको पहले भी आना है। पता नहीं, वर्षगांठ में मना पाऊंगा कि नहीं।" 

मैंने सांत्वना देते हुए कहा, "आप ऐसा मत बोलिए। आप कम से कम सौ वर्ष तक जिंदा रहेंगे। आप मेरी सलाह मानिए। एक बार ऋषिकेश में पतंजलि अवश्य हो आइए। आगे भगवान की इच्छा पर छोड़ दीजिए।"

  यह बोले, "ठीक है। मैं वहां ज़रूर जाऊंगा।" 

उस बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि वर्षों तक हम नहीं मिले। अचानक ही पता चल रहा है कि इनको कितनी बीमारियां हो गई हैं। मिलते-जुलते न रहो तो किसी का पता ही नहीं चलता। मैं सोच रही थी कि ब्लड कैंसर होते हुए भी वे स्वयं बैंक में आए हैं और अपना कार्य करवा रहे हैं। और किसी को अपने साथ लेकर नहीं आए। इनमें तो बहुत दृढ़ इच्छा शक्ति है। इस बात से मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने निर्णय किया कि मैं दूसरे बैंक में भी यहां से पैदल ही जाऊंगी। 

चलते-चलते मैं अपने दूसरे बैंक तक भी पहुंचने वाली थी कि रास्ते में भूख लगी। मैंने  केले खरीदे। अभी एक केला निकालकर खाने ही वाली थी कि सामने से एक व्यक्ति आ गया उसने कहा, "मैंने आज सवेरे से कुछ नहीं खाया। मैं अपना ठेला लगाने ही वाला था कि मेरे सिलेंडर की गैस खत्म हो गई। लेकिन मुझे भूख बहुत जोर से लगी है और मेरे पास पैसे भी नहीं है। आप कुछ खिला दीजिए।"

 मैंने अपने हाथ का केला उसके हाथ में दे दिया। मैं आगे चल दी। मैंने सोच रही थी कि बेचारे को कितनी परेशानी हो रही होगी। परन्तु मैं कर ही क्या सकती थी। मुझे तो दूसरे बैंक भी जाना था। मैंने दूसरे केले को निकाल कर खाया। जिससे कुछ भूख शांत हुई। 

तभी चलते-चलते बैंक भी आ गया। मैं अंदर गई। बैंक के अंदर घुसते ही मेरे सामने एक हर्ष मिश्रित विस्मय था। मेरे विद्यालय की एक छात्रा वहां काउंटर पर खड़ी थी। मुझे देखते ही उसने मुझे एकदम पहचान लिया। उसने मेरा अभिवादन किया। मुझे उसकी शक्ल थोड़ी बहुत जानी पहचानी लगी; परन्तु नाम बिल्कुल याद नहीं आया। मैंने कहा, "बेटा! तुम तुम्हारा क्या नाम है?"

 उसने कहा, "मैं चंचल हूं। आप मुझे पढ़ाते थे; मुल्तान नगर स्कूल में।"

 मैंने कहा, "हां कुछ-कुछ याद तो आया। लेकिन तुम्हारा नाम याद नहीं आ रहा था"

 मुझे बड़ी खुशी हुई कि उसकी बैंक में परमानेंट जॉब लग गई थी। उसने पूछा, "मैम! आपके लिए क्या कर सकती हूं?" 

मैंने कहा, "मुझे जीवन प्रमाण पत्र देना है।" 

उसने तुरंत मेरे जीवन प्रमाण पत्र के फार्म भरवा कर सबमिट कर दिए। मुझे एक एफडी भी करवानी थी। वह भी काम उसने चटपट कर दिया। मैं तो हैरान ही हो गई कि बैंक में कार्यरत, मेरे द्वारा पढ़ाई गई छात्रा का मुझको कितना अधिक लाभ हुआ! उसने पांच मिनट में ही सारा काम निपटा दिया। 

एक तो मुझे उससे मिलकर ही बड़ी खुशी हुई थी कि मेरी छात्रा इस बैंक में नौकरी पर लगी हुई है। अब उसने मेरे काम को भी पांच मिनट में ही निपटा डाला तो खुशी द्विगुणित हो गई। मैंने बचे हुए केले उसके बैग में डालते हुए कहा, "बेटा! यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए।"

 यह देखकर तो वह बहुत ज्यादा खुश हो गई।  उसने कई बार मुझे थैंक यू मैम, थैंक यू मैम, कहा। उसकी प्रसन्नता ने मेरी प्रसन्नता भी बढा दी। उसने यह भी बताया कि उसकी क्लास के अधिकतर बच्चे बहुत बढ़िया जॉब पर लग गए हैं। दस बारह बच्चे तो सरकारी बैंकों में ही कार्यरत हैं। कोई विद्यार्थी अमेरिका भी चला गया है। कुछ बच्चे दुबई में भी हैं।

 बैंक से बाहर निकलते समय मैं सोच रही थी कि मेरी पढ़ाई हुई छात्रा की अच्छी जॉब लग गई है। कितनी खुश थी वह! मेरा काम भी उसने गजब की स्फूर्ति से कर दिया। मुझे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि उसकी क्लास के बहुत से बच्चों ने काफी अच्छे मुकाम हासिल कर लिए थे। वास्तव में, सरकारी विद्यालयों में, बच्चे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं; उनके लिए ये उपलब्धियां प्राप्त करना सरल नहीं होता।

इस समय मैं दिन की पिछली सब बातें भूल कर प्रसन्नता और गर्व से भर गई। उन बच्चों के बारे में सोचने लगी जो उसकी क्लास में थे। सोचते सोचते आगे बढ़ी तो रास्ते में पतंजलि स्टोर था। मुझे याद आया मुझे हिंग्वाष्टक चूर्ण भी लेना है। पतंजलि स्टोर बेसमेंट में है। मैं नीचे उतरी तो काउंटर वाली लड़की सामने ही खड़ी थी। उसने मुस्कुरा कर मेरा अभिवादन किया और पूछा, "मैम! आप क्या लेना चाहती हैं?" मैंने बताया कि मुझे  हिंग्वाष्टक चूर्ण चाहिए, तो फटाफट काउंटर पर चूर्ण ले आई और  पेमेंट भी करवा दी। वह यह भी लड़की अपनी आत्मीय बन गई है।  मैं गाया बगाया वहां जाती ही रहती हूं। इसीलिए वह मुझे अच्छे से पहचानती थी।

 अब मैं बाहर निकली तो मैंने सोचा कि अभी समय बहुत अधिक नहीं हुआ है। क्यों न मधुजी से मिल दिया जाए। वे मेरे साथ ही एक विद्यालय में पढ़ातीं थीं। उनसे मिले भी काफी समय बीत चुका था। फोन पर ही बातचीत होती थी। कुछ दिनों पहले उन्होंने निर्णय लिया था कि वे बड़ा सत्संग करवायेंगी। जिसमें सभी विद्यालय की सहेलियों को बुलाएंगी। इसके लिए उन्होंने मुझे फोन भी किया था। उनका घर रास्ते में ही पड़ता था इसीलिए मैं तुरंत उनके घर पहुंच गई।

 वे हैरान हो गईं मुझे देखकर! मैं अकस्मात ही जो उनके घर पहुंच गई थी। आलू बैंगन की सब्जी बनाने के लिए वे अभी बैगन काट ही रही थी। मैंने कहा, "चलो मैं आपके साथ-साथ ही सब्जी भी कटवा देती हूं। साथ साथ बातें भी करते रहेंगे।" 

 उन्होंने कहा, "नहीं। तू बैठ। सब्जी तो बनती रहेगी। मैं चाय बनाती हूं। तू चाय पी।"

 उनकी चाय हमेशा प्यार से भरी हुई होती है।  चुस्कियां लेते हुए मैंने नमकीन का आनंद भी उठाया।  खूब गपशप हुई।  कई पुराने किस्से याद आ गए; कुछ खट्टे कुछ मीठे। 

फिर उन्होंने कहा, "तुझे सत्संग में जरूर आना है। सभी सहेलियां मिलेंगी। पहले चाय पकौड़े खाएंगे। फिर खूब सत्संग करेंगे। बाद में जम के खाना खाएंगे। मैंने हलवाई बुला रखा है। जरूर जरूर आना है।" मैंने पक्का वायदा किया कि मैं अवश्य ही आऊंगी। 

उनके साथ बीते सभी खट्टे मीठे अनुभव याद करते हुए मैं वापस घर पहुंच रही थी। रास्ते में कबाड़ी वाले की दुकान दिखाई दी। यद्यपि अक्सर उसकी दुकान में काफी व्यस्तता नज़र आती है।  लेकिन आज वह कबाड़ी वाला बिल्कुल खाली बैठा था। मैंने सोचा यह अच्छा मौका है। अखबारों की रद्दी तो इकट्ठी हो ही गई है। अभी निपटा देती हूं। 

मैंने उसको कहा, "भैया! जल्दी से मेरे घर रेहडी भेज दो। अखबार की रद्दी देनी है।" 

उसने मेरे साथ ही एक रेहडी वाले को भेज दिया। वह रद्दी उठा ले गया और सारी रद्दी बिक गई। 

 लो, यह काम भी कब से टल रहा था और यह भी आज ही निपट गया। काफी संतुष्टि का अनुभव हुआ। आज मैं आधे दिन में ही कई काम कर पाई थी, और मुझे कोई थकावट भी महसूस नहीं हुई। 

 यकीनन ऐसा कोई दिन कभी-कभी ही आता है; जिसमें इतनी विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों का समावेश एक ही दिन में हो पाता है। इसमें हर्ष, सुख, दुःख, चिंता, गर्व, आश्चर्य, प्रेम, संतुष्टि आदि सभी प्रकार की अनुभूतियाँ शामिल थीं। जीवन की पूर्णता का एहसास कराने वाला, एक अलग ही दिन था यह!

वास्तव में देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन ही विभिन्न प्रकार की सतरंगी अनुभूतियों के रस में आप्लावित है। केवल आवश्यकता है, जीवन में उमंग से परिपूर्ण आशावादी दृष्टि अपनाने की! जब हम सजगता से हर पल को निहारते हैं; तो उस पल में घुली हुई प्रत्येक अनुभूति हमें बहुत कुछ प्रदान कर जाती है।

Sunday, November 23, 2025

लौट आईं स्मृतियां!

 रिखीराम अंबाला जा रहा था। रास्ते में सड़क पर उसका एक्सीडेंट हो गया। वह बच गया। लेकिन उसकी याददाश्त जाती रही। उसके परिवार वालों ने उसको ढूंढने की बहुत कोशिश की। पर उसका कुछ पता न लगा। 

वास्तव में वह जिंदा था। लेकिन अपने परिवार से 1600 किलोमीटर दूर था। वहां किसी ने उसको बचा लिया था। उसे अपनी पिछली जिंदगी की सभी बातें विस्मृत हो गई थी। वह अपना नाम तक नहीं बता पा रहा था। इसीलिए उसे बचाने वाले ने उसका नाम रवि चौधरी रख दिया था। उसने नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू की। वह मुंबई  चला गया वहां उसने कुछ दिनों कुछ काम किया।

 फिर वह नांदेड़ काम के लिए चला गया।उसे एक कॉलेज में  नौकरी मिल गई। उसने एक लड़की संतोषी से विवाह भी कर लिया। उसके तीन बच्चे हुए। उसे अपने पिछले जीवन का कुछ भी याद नहीं था। लेकिन कुछ ही महीने पहले की बात है कि उसका एक और एक्सीडेंट हो गया। उसका सिर टकराया। ज्यादा चोट नहीं आई। लेकिन अचानक उसकी पिछली स्मृतियां वापस आ गई। उसे पिछले समय के बचपन के चित्र देखने लगे। उसे अपने शहर 'सातों' के पहाड़ दिखने लगे। वह बड़ा हैरान और परेशान हुआ। 

 उसने इन चित्रों की स्मृतियों को अपनी पत्नी को बताया। उसकी पत्नी ने सलाह दी कि अपनी कॉलेज के छात्रों से यह बात पूछे। वे शायद खोज कर कुछ बता पाएं। उसने अपने कॉलेज के एक विद्यार्थी को ऑनलाइन 'सातों' गांव को ढूंढने के लिए कहा। जब उस विद्यार्थी ने 'सातों' गांव ढूंढ कर, उसके एक कैफे में फोन घुमाया, तो पता चला कि वह वहां सचमुच ही रहता था। वहां पर उसका नाम रिखी राम था। 

इसके बाद रिखीराम हिमाचल प्रदेश के उसी गांव में वापस आया। वह अपने बच्चों और पत्नी को साथ लेकर आया। उसके माता-पिता की तो मृत्यु हो चुकी थी। लेकिन उसके भाई-बहन उसे पहचान गए। वे अवाक् थे, लेकिन प्रसन्न भी! उनकी आंखों में हर्ष मिश्रित आंसू आ गए। गांव वालों ने माला पहनाकर उसका स्वागत किया। यह बहुत ही भावुक मिलन था। 

यह अद्भुत बात है, कि जो घटनाएं हम फिल्मों में पर्दे पर देखकर काल्पनिक समझते हैं; वह जीवन में प्रत्यक्ष रूप से घटित हुई।

Saturday, November 22, 2025

सरल जीवन; सरल शरीर!

 स्वस्थ रहना है तो सरल जीवन की और चलना होगा। जिस सरलता से हमारे पूर्वज जीवन व्यतीत करते थे; हमें उसी राह पर चलना होगा। उनके खान-पान में बहुत सरलता थी। वह क्षेत्रीय स्तर पर उगे हुए खाद्य पदार्थ ही खाते थे। साथ में मौसमी फल सब्जियां ही खाया करते थे। वे हर समय खाते नहीं रहते थे। खूब शारीरिक परिश्रम किया करते थे।  सोने से काफी देर पहले दिन का आखिरी भोजन कर लेते थे।

 हमें भी ऐसा ही करना होगा। सवेरे का प्रथम भोजन थोड़ा बहुत शारीरिक परिश्रम करने के बाद ही खाना चाहिए; फिर चाहे वह थोड़ा बहुत व्यायाम हो या फिर शारीरिक काम। दिन का आखिरी भोजन सोने के लगभग तीन-चार घंटे पहले हो जाना चाहिए। खाने के बीच में अंतराल भी होना चाहिए। ऐसा नहीं की हर दो घंटे में कुछ भी खा रहे हैं। हमें सब्जियां और सलाद ज्यादा खानी चाहिए। वास्तव में हमें सजग रहकर भोजन करना चाहिए। भोजन करते समय यह अवश्य सोचना चाहिए कि यह भोजन मेरे शरीर को बीमारियां देगा; या फिर यह भोजन मेरे शरीर की बीमारियों से लड़ेगा।

हमारी आंतों में लगभग 30 से 70 ट्रिलियन बैक्टीरिया होते हैं। इनका मुख्य भोजन वही है जो कि हम सलाद और सब्जियों के रूप में खाते है। यदि हम इन बैक्टीरिया का भोजन नहीं खाते तो यह बैक्टीरिया भूखे होने पर पहले आंत की अंदर की  चिकनी परत को खाते हैं। बाद में आंतों को भी अंदर से खाना शुरू कर देते हैं। इससे आंतों में घाव होने शुरू हो जाते हैं। और बुरे टॉक्सिंस हमारे खून में पहुंचने शुरू हो जाते हैं। इस तरह बीमारियों की शुरुआत हो जाती है। यदि हम इन बैक्टीरिया को उचित भोजन देते रहेंगे तो ये  स्वयं भी संतुष्ट रहेंगे और हमारे लिए उचित विटामिनों का निर्माण करते रहेंगे। जिससे हम भी स्वस्थ रहेंगे। है न दोनों के ही फायदे की बात!

 हमें सबसे अधिक सब्जियां और फल खाने चाहिएं, उससे कम दाल और सबसे कम कार्बोहाइड्रेटस्। हमारे शरीर का लीवर अगर ठीक रहेगा तो हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। लीवर को सभी पाचक तंत्र के अवयवों की मां कहा गया है। कारण यह है कि मां सभी को आराम से सुलाकर, बाद में सभी काम निपटाकर, स्वयं आराम करती है। पहले सभी ऑर्गन्स अपना काम कर लेते हैं; और आराम करते हैं। सबसे बाद में लिवर आराम करता है। लिवर को भी कम से कम चार पांच घंटे का आराम अवश्य ही चाहिए। इसीलिए हमें बीच-बीच में नमकीन इत्यादि भी नहीं खाने चाहिए।

 जितना हम घर का बना सादा खाना खाएंगे उतना ही हमारा स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। हमें प्रयत्न करना चाहिए कि बाहर से बना हुआ खाना कम से कम खाएं। बाहर से बने भोजन की विश्वसनीयता इतनी अधिक नहीं हो सकती जितनी कि स्वयं बनाए हुए भोजन की। प्रोसैस्ड फूड तो कतई नहीं खाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त प्रयत्न करना चाहिए कि हर घंटे शारीरिक गतिशीलता भी बनी रहे।  ऐसा न हो कि हम बहुत देर तक आराम से बैठे ही रहे।

 जब हम दो खानों के बीच में अंतराल रखते हैं; तो उससे हमारे शरीर में पहले से संचित खाना भी काम में आता है। जिससे कि दो प्रक्रियाएं बड़ी अच्छी होती हैं। एक का नाम है ऑटो फैजी और दूसरे का नाम है माइटो फैजी। इन प्रक्रियाओं से ऐसी कोशिकाएं  खत्म हो जाती हैं; जो कि अनियंत्रित रूप से बढ़ती है। यदि यह प्रक्रियाएं न हो, तो ये कोशिकाएं नियंत्रण से बाहर चली जाती हैं। इसी से कैंसर होने की भी संभावना भी हो सकती है।

खाने पर नियंत्रण रखने से व स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि रुक जाती है। और कैंसर की संभावना भी न के बराबर होती है। इसीलिए स्वस्थ रहना है तो समय से खाएं। दो आहारों के बीच में उचित अंतराल रखें। सरल आहार ही करें। और हां शरीर को क्रियाशील अवश्य रखें। सरल जीवन शैली अपनाने से शरीर में भी सरलता रहती है। कोई जटिलता नहीं आती।

Wednesday, November 19, 2025

तेंदुआ और बिल्ली

 ख़बर थी कि अब तेंदुआ शिकार करने के लायक नहीं रह गया है। उसका पेट मोटा हो गया है। नाखून कुंद हो गए हैं। दांत भी बहुत तीखे नहीं रह गए हैं। वास्तव में इन तेंदुओं को आराम से शिकार मिल जाता है। वह भी गांव के आसपास ही! वहां ये मंडराते रहते हैं। उन्हें कभी कभार मनुष्य या उनके बच्चों का मांस, बिना मेहनत किए आराम से मिल जाता है। इसीलिए वे शिकार करने में ज्यादा मेहनत नहीं डालते। इसके कारण उनकी शारीरिक संरचना में भी परिवर्तन आ रहा है। 

यह बात मुझे बहुत रुचिकर लगी। क्योंकि तेंदुओं की मौसी जो हमारे आसपास घूमती रहती हैं; उनमें भी मैं परिवर्तन देखती हूं। बिल्लियां मोटी होती जा रही जा रही है। मुझे लगता है उनके दांतों और पंजे में भी परिवर्तन आ चुका होगा; क्योंकि अक्सर वे धूप में बैठी सुस्ताती हुई नजर आती हैं। अपने आगे के पंजों पर मुंह दुबचाए, पूंछ लपेटे हुए वे आराम से सुस्ताती रहती हैं। और चूहा मज़े में उनके सामने से नृत्य करता हुआ गुज़र जाता है। वे उसे कुछ नहीं कहती। 

इसका भी कारण यही है कि उन्हें बड़े आराम से बिना मेहनत के अपना खाना मिल जाता है। कुछ लोग उन्हें कटोरियों में दूध देते हैं।  कुछ दूसरे लोग कैट फूड खरीद कर लाते हैं और उनके लिए जगह-जगह बिखेर देते हैं। बिल्लियां मज़े कर रही हैं। तेंदुए के शिकार जंगल में खुश हैं। इन बिल्लियों के शिकार चूहे भी शहरों में खूब मज़े कर रहे हैं। उन्हें अब कोई भी परेशानी या डर नहीं है। वास्तव में इंसान की वजह से जंगल में तेंदुए और शहरों में  उनकी मौसियां भी खूब मौज में रह रहे हैं।

Saturday, November 15, 2025

सफाई भी! कमाई भी!

केन्द्रीय मंत्रालय के सभी विभागों में ढेर सी फाइलें इकट्ठी हो गई थीं। डिजिटलाइजेशन होने के कारण उनका अब कोई उपयोग भी नहीं रह गया था। निर्णय लिया गया कि इन सभी फाइलों को विभिन्न मंत्रालयों से हटाकर रद्दी के भाव बेच दिया जाए। इससे सभी मंत्रालयों में साफ सफाई भी होगी और इन बेकार फाइलों से कुछ थोड़ी बहुत आय भी हो जाएगी। 

जब सारा सामान निकाल कर बेचा गया और उससे जो आमदनी हुई; उसे देखकर सभी चकित रह गए। यह आमदनी थी 4100 करोड रुपए! इससे भी अच्छी यह बात थी कि उन फाइलों के हटने के कारण बहुत सी जगह खाली हो गई थी। यह आंकड़ा भी हैरान करने वाला है। लगभग 923 लाख फुट जगह घेरे हुए थीं ये फाइलें! फाइलों को बेचने से जो 4100 करोड रुपए की कमाई हुई; उससे भारत अपना एक बड़ा स्पेस सेंटर अंतरिक्ष में स्थापित कर सकता है।

हुआ न फायदे का सौदा! मंत्रालयों की सफाई तो हुई ही; साथ में इतनी बड़ी कमाई भी हो गई!

Thursday, November 13, 2025

अमृत का सरोवर!

 बहुत दिनों से मन में अमित से मिलने की बहुत इच्छा थी। अमित धवन मुझे बेंगलुरु में मिला था। वह वहां रहकर दंत शल्य चिकित्सा में स्नातकोत्तर पढ़ाई कर रहा था। मैं जब छुट्टियों में ऋचा के पास रहने गई, तब वह भी वहां हॉस्टल में रह रहा था। वह ऋचा के बैच से एक वर्ष सीनियर था। उसका हँसमुख स्वभाव सबको बहुत पसंद था।  वह सबको हंसाता तो रहता ही था; साथ ही बहुत सुरीला गाना भी गाता था। कभी अगर वह गाना गा रहा होता, तो दूर से ऐसा लगता था, मानो मोहम्मद रफी ही गाना गा रहे हैं।

 जब भी वह कॉलेज से हॉस्टल की तरफ आता तो उसकी सीटी की आवाज से ही पता चल जाता था कि अमित धवन आ रहा है। हमेशा वह खूब बातें करता था। जब खाने के बाद हम सभी इकट्ठे हो जाते; तो वह खूब मज़ाक करता और फिल्मी गाने सुनाता। सभी अपनी दिन भर की थकान भूल जाते थे। कभी-कभी वह किचन में मेरे साथ खाना बनवाने में भी मदद करता था। और आलू के परांठे की फरमाइश तो वह अक्सर ही करता था। वह ठहरा पंजाब का! और पंजाबी तो परांठे के शौकीन होते ही है। बहुत अच्छा समय गुजरा उसके साथ! इसीलिए उसकी बहुत याद आती थी।

अमित अमृतसर का रहने वाला लड़का था। मेरा बहुत मन था कि अमित से मिलूं। उससे मिले हुए वर्षों बीत चुके थे। अमृतसर जाने का एक और भी आकर्षण था। मैंने स्वर्ण मंदिर के दर्शन नहीं किए थे। मेरी इच्छा थी कि एक बार स्वर्ण मंदिर के भी दर्शन अवश्य ही करूं। लेकिन व्यस्तता के कारण कभी भी ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं बन पाया। बस यह मन मे ही यह अभिलाषा बनी ही रही।

एक दिन शिखा का ऋचा के पास फोन आया। वह भी ऋचा के साथ  चिकित्सा में स्नातकोत्तर की पढ़ाई इस हॉस्टल में रहकर कर रही थी। ऋचा और शिखा एक ही कमरे में रहती थीं। अब इतने वर्ष बाद उसका फोन आया तो पता चला कि वह सोनीपत में रहती है। वही उसका नर्सिंग होम भी है। उसके पति और ससुर भी डॉक्टर थे। शिखा की भी वहां अच्छी प्रैक्टिस चल रही थी। ऋचा को यह सुनकर बहुत अच्छा लगा।

 दोनों सहेलियों ने बहुत गप्पें मारी। आखिर में शिखा ने पूछा, "ऋचा! अमित की कोई खबर है क्या? वह कैसा है?"

  ऋचा ने कहा, "वह अमृतसर में ही प्रेक्टिस कर रहा है।"

शिखा ने कहा, "एक दिन प्रोग्राम बनाते हैं उससे मिलने का।"

 ऋचा बोली, "मन तो मेरा भी बहुत है। पर समय ही नहीं मिल पा रहा।" 

शिखा का कहना था, "समय तो निकालने से निकल ही जाएगा। चलो प्रोग्राम बनाते हैं। हम  अपने-अपने परिवारों के साथ चलते हैं।"

 दस-पन्द्रह दिन बीतते बीतते शिखा ने प्रोग्राम बना ही लिया। उसने जो समय बताया उससे ऋचा भी सहमत हो गई। बच्चों की उसे समय छुट्टियां भी पड़ रही थी। आखिर अमृतसर जाने का प्रोग्राम बन ही गया। 

तय हुआ कि हम शताब्दी में अमृतसर जाएंगे। होटल की बुकिंग पहले ही कर ली थी। एक कमरा शिखा ने अपने लिए बुक कराया और दो कमरे हमारे लिए बुक करा दिए। सब प्रोग्राम निश्चित होने पर हमने जाने की तैयारी शुरू कर दी। 

एक दिन पहले सभी सामान पैक कर लिया। अब मैं बहुत उत्साहित थी कि वह जो मैंने सोचा था अब वह होने जा रहा है। भोर में ही उठकर हम सब स्टेशन जाने के लिए के लिए टैक्सी में बैठे। बिल्कुल ठीक समय पर टैक्सी ने हमें रेलवे स्टेशन पहुंचा दिया। दस मिनट के बाद शताब्दी एक्सप्रेस धीरे-धीरे स्टेशन पर आती दिखाई दी।

 डिब्बे के अंदर चढ़ते ही देखा तो शिखा हमारे स्वागत के लिए खड़ी थी। उसने पतली सी शॉल ओढ़ रखी थी। रेलगाड़ी का डिब्बा वातानुकूलित होने के कारण उसमें में अच्छी खासी ठंडक थी। उसने अपने पति और बच्चों से हमारा परिचय कराया। उसके बाद हम अपने अपने स्थान पर बैठ गए। 

शिखा के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा नवीं कक्षा का छात्र है और छोटा बेटा प्रथम कक्षा में पड़ता है। अपने-अपने स्थान पर बैठने के बाद शिखा और ऋचा तो एक ही सीट पर आ बैठीं और गपशप करने लगीं। शिखा का बेटा एक ड्राइंग की बुक पर पेंसिल से बहुत सुंदर ड्राइंग बना रहा था। मैं भी अपनी सीट पर बैठकर बाहर खिड़की से बाहर दृश्य देखने लगी। मुझे रेलगाड़ी में बैठकर खिड़की से बाहर देखने में बहुत आनंद आता है। बाहर खेत और विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां मेरे दिल को बहुत आकर्षित करती हैं। रेलगाड़ी चलते-चलते कब मुझे झपकी आ गई; मुझे पता ही नहीं चला।

 अचानक नींद खुली तो देखा कि चाय और नाश्ता दिया जा रहा है। मैंने भी चाय के साथ बिस्कुट का आनंद लिया। उधर देखा तो शिखा का बेटा बड़ी सुंदर कलाकृति बना रहा था। ध्यान से देखा तो पता चला वह हिटलर का चित्र बना रहा है। मैं बहुत प्रभावित हुई। छोटा सा बच्चा और इतना सुंदर चित्र! वह बहुत ही सजीव चित्र लग रहा था। शिखा ने मुझे बताया कि यह पेंसिल से चित्र बनाने में बहुत रुचि लेता है और तरह-तरह के चित्र बनाता रहता है।

शिखा आकर मेरे पास बैठ गई और मुझसे बातें करने लगी। उसे पिछली बातें बहुत याद आ रही थी। उसने कहा, "आंटी आपके हाथ के परांठे तो मुझे भूलते नहीं है। मैं कभी आऊंगी आपके पास परांठे खाने के लिए।"

 उसने शिकायत भी की कि आपको कभी मेरी याद नहीं आई।  कभी आप मेरे घर भी नहीं आई हो। मैंने कहा, "जरूर आऊंगी ऋचा के साथ मैं सोनीपत अवश्य आऊंगी।"

 उसके पति भी बड़े सरल स्वभाव के लग रहे थे। थोड़ी देर में ही रेलगाड़ी में लंच दिया गया। बहुत अच्छा खाना था। आलू के परांठे मैंने दही के साथ खाए। मज़ा आ गया। यद्यपि घर जैसे परांठे तो नहीं थे; परंतु फिर भी बहुत स्वादिष्ट थे। धीरे-धीरे आखिरकार हमारी रेलगाड़ी अमृतसर पहुंच ही गई।

उत्कल को अमित ने पहले ही फोन कर दिया था। वह कह रह कह रहा था कि तुम सब होटल पहुंचो। मैं भी अपनी कार लेकर वहीं आ रहा हूं। हमारा होटल रेलवे स्टेशन के बिल्कुल पास था। हम थोड़ी देर में ही अपने होटल पहुंच गए। अपने कमरों में सामान आदि रखने के बाद हम फ्रेश हो गए।

तभी अमित अपनी पत्नी के साथ आता हुआ दिखाई दिया। कितने ही दिनों के बाद देखा था अमित को। बिल्कुल ही वैसा का वैसा लग रहा था जैसा मैंने उसे बेंगलुरु में देखा था। उसने आदरपूर्वक मेरे पैर छुए। वह बोला, "आंटी! आप कमजोर हो गई हो।" 

मैंने कहा, "बेटा! यह उम्र का तकाजा है। यह सब तो चलता ही रहेगा। अपनी पत्नी से तो परिचय करवाओ।"

 अपनी पत्नी को मिलवाते हुए उसने कहा, "मेरी वाइफ है डिंपी और यह मेरा बेटा है।"

 उन दोनों ने भी मेरे पैर छुए और प्यार से गले भी मिले। उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी लग रही थी। उसका बेटा आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था। शिखा, उसके पति, ऋचा और  उत्कल भी बहुत दिनों बाद अमित से मिले थे। बेंगलुरु में अमित, शिखा की बहुत खिंचाई किया करता था। यहां भी वह शुरू हो गया। शिखा भी उसकी बातों से चिढ़ती नहीं, बल्कि मज़े लेती है।

 ऋचा ने हंसते हुए कहा, "तेरी पुरानी आदतें गई नहीं!"

अमित हंस पड़ा। फिर वह बोला, "तुम सब रेडी हो जाओ। मेरे घर चलना है।"

 लेकिन ऋचा ने कहा कि हमें तो बड़ी जोर की भूख लगी हुई है।

 "कोई बात नहीं।" अमित बोला, "मैं तुम्हें बहुत बढ़िया ढाबे में खाना खिलाऊंगा। चलो! मेरी कार और वाइफ की कार बाहर ही खड़ी हैं।"

वह हमें एक ढाबे में ले गया। मैंने ढाबे का नाम देखा, 'केसर दा ढाबा'। मुझे याद आ गया कि एक बार मैंने इस ढाबे का प्रोग्राम टेलीविजन में देखा था। इसमें विनोद दुआ ने वहां के खाने की बहुत तारीफ की थी। मैं अमित से कहा, "यह तो बड़ा मशहूर ढाबा है।"

 अमित ने कहा, "हां आंटी! एक बार विनोद दुआ ने भी यहां खाना खाया था।" 

मैंने कहा, "हां! वही मुझे भी याद आ गया। उसका प्रोग्राम 'ज़ायका इंडिया का'। जिसमें वह कहता था हम अपने लिए नहीं देश के लिए खाते हैं।"

  अमित बोला, "हां आंटी! इस ढाबे के बारे में मशहूर है कि इसकी वही दाल तब से चलती आ रही है जब से ढाबा शुरू हुआ था।"

 मैंने कहा, "मुझे भी वह प्रोग्राम याद आ गया।"

 अमित बोला, "चलो आंटी! आपको यहां की वही दाल खिलाते हैं।"

 हम अंदर गए, तो वहां बड़ी अच्छी व्यवस्था थी। यद्यपि वहां और बहुत से लोग थे लेकिन फिर भी हमारे लिए एक टेबल खाली मिल ही गई। हम सब मेज के चारों तरफ बैठ गए और अपनी पसंद मिलकर व्यंजन मंगवाने प्रारंभ किया। अब जब मेज पर खाना आया तो वह इतना स्वादिष्ट था कि रुका ही नहीं जा रहा था। सभी चटपट खाने के मजे लेने लगे। एक के बाद एक व्यंजन आते गए और सभी व्यंजनों पर हाथ साफ करते गए। 

सबसे आखिर में अमित ने कहा, "अब मीठे में क्या खाना है?"

 सब ने अपनी अपनी पसंद बताई। बच्चों को तो आइसक्रीम ही अच्छी लगती है। अमित ने कहा कि यहां की फिरनी भी बहुत मशहूर है। मुझे याद आ गया। मैंने कभी बचपन में फिरनी खाई थी। मैंने कहा, "भई मुझे तो फिरनी ही खिलाओ।"

 अमित ने फिरनी मंगवाई। छोटे से मिट्टी के सकोरे में फिरनी जमी हुई थी; जिसके ऊपर चांदी का वर्क भी लगा हुआ था। लकड़ी की चम्मच से जब पहले स्कूप मुंह में डाला तो वह मुंह में जाते ही पिघल गया। कितना अनुपम अनुभव था! बहुत ही स्वादिष्ट खिरनी थी। मैंने तो अमित से कहा कि मेरे लिए एक खिरनी का सकोरा और मंगवाओ।

 हम मन भर कर खा पी चुके तो अमित ने कहा चलो अब होटल के बाहर एक ग्रुप फोटोशूट हो जाए। "केसर दा ढाबा" पर हम सभी ने एक फोटो शूट करवाया। एक क्या; कई फोटो ली गई। आखिर, रोज-रोज तो मिलना होता नहीं! अब ये फोटो ही हमारी स्मृतियों में रहने वाली थीं।

 "अब सीधा मेरे घर ही चलना है। चाय वही जाकर ही पियेंगे।" अमित ने अनुग्रह किया। हम सब भी तैयार हो गए। क्योंकि सभी बच्चे अमित की मम्मी से भी मिलना चाहते थे और उसका घर भी देखना चाहते थे। अमित की मम्मी भी इन बच्चों के पास बेंगलुरु में आई थीं। उन्होंने भी बच्चों को बहुत स्वादिष्ट खाने बनाकर खिलाए थे। उनके साथ अमित की चाची भी बेंगलुरु में आई थीं।तो बच्चों का मन था कि उन सभी से मिलें।

 अमित के घर पहुंचने पर उसकी मम्मी और चाची ने हमारा बहुत स्वागत किया।  वह मुझे गले मिली। सभी बच्चों को उन्होंने बहुत प्यार किया वे हमें घर के अंदर ले गई अमित का घर बहुत सुंदर बना हुआ था। वह हमें ड्राइंग रूम में ले गए। बहुत शालीनता के साथ ड्राइंग रूम की साज सज्जा की गई थी। वहां सब आराम से बैठ गए और गपशप करने लगे। तभी अमित की पत्नी डिंपी सबके लिए चाय और नाश्ता ले आई।

 अमित की पत्नी भी बहुत हंसमुख है। वह एक विद्यालय में अध्यापिका है लेकिन उस दिन उसने हमारे लिए छुट्टी ली हुई थी। अमित के पिता की और चाचा की बैंक में अधिकारी पद पर कार्यरत थे। पर अब वे रिटायर हो चुके थे। अमित के पिताजी बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे। और गाते थे। शायद अमित उनसे ही गाना सीखा होगा। हमने अमित के पिता से अनुरोध किया कि वह हारमोनियम पर कुछ सुनाएं। अमित के पिता ने बहुत अच्छा एक भजन हारमोनियम पर सुनाया।

अमित को याद आया कि रुद्रांश भी तो हारमोनियम अच्छा बजाता है। उसने रुद्रांश को हारमोनियम पर कुछ बजाने के लिए कहा।  रुद्रांश ने हारमोनियम पर एक बहुत अच्छा भजन सुनाया। उसे सुनकर अमित सबसे ज्यादा खुश हुआ। उसने कहा, "भाई! मैं तो सिर्फ गाता ही हूं। तुम तो हारमोनियम भी बजाते हो। वाह भई वाह! मजा आ गया!" 

 अमित का गाना सुनने के लिए तो हम सब बेचैन थे ही। अमित भी पूरी तरह तैयार था। उसने  karaoke लगाकर मोहम्मद रफी का एक बेहतरीन गाना हमें सुनाया; 'एहसान तेरा होगा मुझ पर........।' 

वाह! क्या समां बंध गया था! हम सब मंत्र मुग्ध होकर उसका गाना सुनते रहे। उसके बाद उसकी मां ने भी एक बहुत अच्छा गाना सुनाया। वे भी बहुत ही अच्छा गाती है।अमित की चाची ने भी एक सुंदर गीत सुनाया। यानि उनके यहां सबके सब गाने के शौकीन हैं। अमित के बेटा की अगले दिन परीक्षा थी। वह ऊपर पढ़ने के लिए चला गया था। लेकिन डिंपी उसे बुला लाई और उसने भी एक बहुत खूबसूरत गाना सुनाया। बहुत मज़ा आया। वहां पर तो गाने बजाने की महफिल ही लग गई थी। उसके बाद अमित ने सभी को अपना पूरा घर अंदर से दिखाया।

जलपान के  बाद अमित की मां ने पूछा, "आप आपका यहां पर क्या-क्या प्रोग्राम है? 

मैंने कहा, "एक तो मैं अमृतसर में अमित से मिलने आई थी। और दूसरा मुझे स्वर्ण मंदिर देखना है।" 

उन्होंने बताया कि स्वर्ण मंदिर  में अंदर दर्शन करने तो बहुत मुश्किल होते हैं।

 मैंने कहा, "कोई बात नहीं। बाहर की परिक्रमा ही कर लेंगे।" उन्होंने कहा, "यह ठीक रहेगा। तभी अमित का बेटा बोल उठा, "हमने तो अभी तक दर्शन नहीं किया जबकि हम तो यहीं रहते हैं। वहां दर्शन करने बहुत मुश्किल है।"

 मैं हंस पड़ी। मैंने कहा, "ठीक है। हम तो बाहर से ही परिक्रमा करके आ जाएंगे।"

 अमित ने बताया, "यहां पर शाम को बाघा बॉर्डर पर बहुत अच्छा प्रोग्राम होता है। वह तो आपको जरुर देखना चाहिए। बुकिंग में कुछ दिक्कत जरूर होती है; लेकिन वह मैं अरेंज करवा दूंगा।"

  हम वहां पर जलियांवाला बाग भी देखना चाहते थे। अमित ने की मां ने भी सहमति जताई। वे बोलीं,  "हां! यह सब दर्शनीय स्थल तो आपको देखने ही चाहिए। उसके बाद उन्होंने बड़े प्यार से सबको विदा किया। अमित की पत्नी डिंपी ने शिखा और ऋचा को बहुत सुंदर फुलकारी वाले दुपट्टे भी भेंट किए। फुलकारी पंजाब की मशहूर कढ़ाई की एक शैली है। ऋचा तो डिंपी को अपना गिफ्ट पहले ही दे चुकी थी। 

हम होटल वापस आ गए। हमने प्रोग्राम बनाया कि हम सवेरे सवेरे ही स्वर्ण मंदिर के दर्शन के लिए चल देंगे। शायद हमें दर्शन हो ही जाएं।  शिखा इस बात के लिए तैयार नहीं थी। वह कह रही थी कि वह सवेरे सवेरे नहीं उठ पाएगी। वह देर रात को स्वर्ण मंदिर के दर्शन करने के लिए गई।

इसीलिए केवल हम चारों का ही सवेरे जाने का प्रोग्राम बना। हम सुबह 3:00 बजे ही उठ गए।  जल्दी नहा धोकर हम स्वर्ण मंदिर की ओर गए।  वहां पहले ही बहुत लोग आ चुके थे। हम भी लाइन में लग गए। लाइन बहुत धीरे-धीरे आगे खिसक रही थी। हमें उम्मीद थी कि हम दर्शन कर पाएंगे। शायद 1 घंटे के बाद या 2 घंटे के बाद नंबर आ ही जाएगा। धीरे-धीरे हम भी खिसकते खिसकते आगे बढ़ने लगे। 

लेकिन मंदिर के पास आते-आते तक एक और साइडलाइन से लोग अंदर आने लगे। वे हमारी लाइन में नहीं थे। लेकिन अलग ही कोई रास्ता था। जिससे कि वह अंदर चलते जा रहे थे। हमारी लाइन तो आगे खिसकनी ही बंद हो गई ऐसा लगा कि हम तो शायद खड़े ही रहेंगे । लाइन बिल्कुल रुक सी गई थी। थोड़ी देर के बाद रुद्रांश के पेट में दर्द होने लगा। अब हम परेशान हो गए। हम बीच में से ही लाइन से निकलकर बाहर की तरफ आ गए और सरोवर के पास जाकर बैठ गए। हमें लगा कि अंदर जाकर दर्शन करना तो बहुत मुश्किल है। इसीलिए बाहर से ही हमने गुरुद्वारे के दर्शन किए।

 बहुत सुंदर गुरुद्वारा था और उसकी ऊपर का गुम्बद सोने से मढा हुआ था। वह सूरज की रोशनी में जगमगा रहा था। पास ही सरोवर था। सरोवर में स्वर्ण मंदिर के शिखर का प्रतिबिंब बहुत ही दिव्य प्रतीत हो रहा था। शब्द कीर्तन तो लगातार चल ही रहे थे। हम थोड़ी देर उसी भक्तिमय वातावरण का आनंद लेते हुए वहीं बैठे रहे। फिर मैंने ऋचा से कहा कि यहां का प्रसाद तो लेना ही चाहिए। 

ऋचा ने कहा, "अभी उत्कल और रुद्रांश कड़ा प्रसाद ले आएंगे।

 वे दोनों प्रसाद लाने गए। लेकिन तभी एक महिला और उसकी बेटी हमारे पास आए। उन्होंने अपने हाथ से हमें गुरुद्वारे का प्रसाद दिया। उन्होंने कहा कि हमने प्रसाद ज्यादा ले लिया था। उसमें से थोड़ा आप भी ले लो।

 मुझे बहुत खुशी हुई कि प्रसाद मुझे अपने आप ही मिल गया। हमने थोड़ा प्रसाद खाया और थोड़ा शिखा उसके पति और बच्चों के लिए रख दिया। वहां लंगर की भी बहुत सुंदर व्यवस्था थी। लेकिन भीड़ बहुत थी और हमारे पास समय अधिक नहीं था। इसीलिए हमने सोचा कि होटल में जाकर ही नाश्ता कर लेंगे।

 हम जब होटल वापस आए तो ब्रेकफास्ट का समय हो चुका था। शिखा उसके पति और बच्चे वहां पहले ही बैठे हुए थे। होटल में बफे सिस्टम था। बहुत सा ब्रेकफास्ट का सामान रखा था। नॉर्थ इंडियन, साउथ इंडियन, पंजाबी छोले भटूरे आदि सब व्यंजन थे। हमने मन भर के ब्रेकफास्ट किया। उसके बाद मैं देखने गई कि कौन-कौन से पेय पदार्थ वहां उपलब्ध हैं।

वहां ठंडे पेय पदार्थ भी थे और गर्म भी। मुझे नाश्ते में ठंडे पेय पदार्थ ज्यादा पसंद नहीं हैं। मैं एक प्याला चाय लेकर वापस आ रही थी। इधर शिखा का छोटा बेटा गोल-गोल घूम रहा था। मेरी नजर सीधी अपने प्याले पर थी। मैंने उसे देखा ही नहीं और वह मुझे टकरा गया। यह तो अच्छा हुआ कि बच्चे पर चाय नहीं गिरी। चाय मेरी साड़ी पर गिरी। इसके बाद में अपने रूम में साड़ी बदलने के लिए चली गई। ऋचा ने चाय कमरे में ही भिजवा दी। उसके बाद हमने थोड़ा आराम किया।

 तभी अमित का फोन आया कि वह हमारे होटल पर आ रहा है। वह  एक और मशहूर ढाबे का खाना खिलाना चाहता था। हमने उसे मना भी किया।  हम होटल में खा लेंगे पर वह बहुत जोर दे रहा था। थोड़ी देर बाद उसकी पत्नी और अमित कार लेकर आ गए। 

अब वह जिस होटल में ले गया था वह भी बहुत शानदार होटल था। बहुत मजेदार खाना था। खाना खाने के बाद उसने कहा कि अब तुम लोग रेडी हो जाओ। हम वाघा बॉर्डर देखने जाएंगे। वह होटल में हमारे साथ आया। मैंने तो बाघा बॉर्डर जाने से मना कर दिया क्योंकि मुझे थोड़ी थकान महसूस हो रही थी। ये सभी वाघा बॉर्डर चले गए। मैंने कमरे में ही आराम किया।

 वाघा बॉर्डर का कार्यक्रम देखने के बाद जब सभी वापिस आए तो मेरा रात का सोने का टाइम हो गया था। मैं तो सो गई लेकिन इन सब ने एक कमरे में बैठकर पूरी महफिल जमाई। गाने गाए खाने खाए और मजे किए। अमित ने भी उन सबको एक बहुत सुंदर गीत सुनाया; चिट्ठीए चिट्ठीए चिट्ठीए.......। उस गाने को रिकॉर्ड भी गया किया गया। मैंने भीअगले दिन वह रिकॉर्डिड गाना सुना। अमित की तो आवाज में ही जादू है। उसका गाना सुनते समय कोई भी स्वयं को भूल जाता है; और उसके गाने में ही खो सा जाता है। 

बच्चों ने भी रातभर महफिल का पूरा लुत्फ उठाया और मनपसंद खाने मंगवाए और खाए। उसके बाद ये लोग बड़ी देर से सोए। अगले दिन हमें जलियांवाला बाग देखने के लिए जाना था। अमित की पत्नी को छुट्टी नहीं मिली थी। उसे स्कूल जाना था। इसीलिए अमित और उसकी पत्नी अगले दिन नहीं आए। 

अगले दिन सुबह ही नाश्ते के बाद हम जलियांवाला बाग देखने के लिए निकल गए। जलियांवाला बाग देख कर मन सिहर उठता है। वहां अभी भी गोलियों के निशान हैं। उसे देखकर लगता है कि उस समय लोगों की कितनी दुर्दशा हुई होगी! किस प्रकार बेरहमी से उन्हें सभी दरवाजे बंद करके अंदर ही अंदर  गोलियों से भून दिया गया था। वहां एक बड़ा कुआं भी था। जिसके अंदर लोग बचने के लिए जा गिरे थे। हर देशवासी को जलियांवाला बाग तो देखना ही चाहिए। उसे देखकर पता चलता है कि हमारी आजादी के लिए आम लोगों ने भी कितनी मुश्किलें उठाईं। 

इसके बाद हम म्यूजियम देखने गए लेकिन म्यूजियम तो उस दिन बंद था। इसीलिए हम म्यूजियम नहीं देख पाए। वहीं बैठकर हमने आइसक्रीम का मजा लिया और इधर-उधर शॉपिंग करने के लिए चले गए। बाजार में हमने सामान तो कुछ ज्यादा नहीं खरीदा लेकिन इधर-उधर घूमते घूमाते शाम हो चली थी। इसलिए हम वापिस होटल में आ गए और वहीं हमने रात को डिनर किया। खाना बहुत स्वादिष्ट था। अमृतसर के छोले भटूरे बहुत मशहूर हैं।  मैंने तो मन भर कर छोले भटूर खाए। 

हमारी ट्रेन सुबह जल्दी ही दिल्ली के लिए रवाना होनी थी। इसीलिए हम रात को जल्दी ही सो गए। सवेरे उठकर होटल में ही ब्रेकफास्ट किया और जल्दी यह स्टेशन की ओर चल दिए। वहां पर हमारी शताब्दी एक्सप्रेस पहले से ही खड़ी हुई थी। हम ट्रेन में चढ़कर बैठ गए दस मिनट बाद रेल गाड़ी चलना शुरू हुई। धीरे-धीरे गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी। अब हम वापिस दिल्ली की ओर जा रहे थे। थकावट भी थी और रात की नींद भी पूरी नहीं हुई थी। बड़ी जोरों से झपकियां आ रही थीं। 

अभी एक छोटी सी झपकी ली ही थी कि ट्रेन में सवेरे का ब्रेकफास्ट आ गया। ब्रेकफास्ट खत्म हुआ तो शिखा का बड़ा बेटा मेरे पास आकर बैठ गया। उससे बातें करके मुझे बहुत अच्छा लगा। वह बडा ही समझदार और प्रतिभाशाली बच्चा है। थोड़ी देर बाद जब बह गया तो मुझे नींद आ गई और मैं सो गई। जब आंख खुली तो खिड़की से बाहर धान के खेत नजर आ रहे थे। धान पकने को तैयार थी। उसका रंग सुनहरी भूरा हो चला था।

रेलगाड़ी में दोपहर का लंच खाने के बाद मेरे पास शिखा आकर बैठ गई थी। दिल्ली पहुंचने का समय होने वाला था। गाड़ी धीरे-धीरे चलती जा रही थी। शिखा काफी अनुग्रह कर रही थी कि मैं उसके घर अवश्य ही आऊं। मैंने भी उसे अपने घर आने का निमंत्रण दिया। दिल्ली के स्टेशन पर उतरते ही शिखा की कार और ड्राइवर तो पहले ही तैयार खड़े थे। उसके ससुर ने सोनीपत से ही उनके लिए कर भिजवा दी थी। हमने भी बाहर निकल कर टैक्सी ली और घर आ गए। भूख नहीं थी; लेकिन थकान थी।चटपट चाय बनाकर पीयी गई। फिर हम ने बिस्तर में आराम किया।

अमित ने जो गाने गाए, उसकी हमने वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली थी। बार-बार सुनने का मन कर रहा था। स्वर्ण मंदिर की छटा भी हमने फोन के कमरे में कैद कर ली थी। वास्तव में बहुत ही सुंदर और अद्भुत है स्वर्ण मंदिर; और उसका परिसर! अकस्मात् किसी ने आकर स्वर्ण मंदिर का जो प्रसाद हमें अमृत सरोवर के पास दिया था; वह वास्तव में अमृत तुल्य स्वादिष्ट था। अमृतसर का पूरा अनुभव मन को भा गया। हो भी क्यों न? आखिर अमृतसर की ये सभी सुखद स्मृतियां मेरे लिए बहुमूल्य सौगातें हैं!

Wednesday, October 15, 2025

कितने कदम?

 ऐसा माना जाता है कि यदि 8000 या 10000 कदम प्रतिदिन चला जाए तो स्वास्थ्य ठीक रहता है। लेकिन यह बात पूरी तरह ठीक नहीं है। दिन में यदि एक बार इतने सारे कदम चलकर, बाकी दिन यदि हम एक जगह ही बैठे रहें तो स्वास्थ्य शायद इतना अच्छा नहीं रह सकता।

 लेकिन यदि हम हर घंटे लगभग 250 कदम चलने का उद्देश्य रखें, तो इससे हमारे स्वास्थ्य पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसीलिए हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि हम हर घंटे, लगभग 250 कदम चलें। फिर चाहे इकट्ठे 8000 या 10000 कदम न भी चले, तब भी हमारा स्वास्थ्य ठीक रह सकता है।