Saturday, March 28, 2026

वासनाएं (desires)

 न जातु काम: कामानाम उपभोगेन शाम्यति

 हविषा कृष्णवर्तमा इव भूय एव अभिवर्धते

विभिन्न प्रकार की इच्छाएं अथवा वासनाएं भोगने से शांत नहीं होती। बल्कि अग्नि में घी डालने के समान बढ़ती ही चली जाती हैं। इन्हें नियंत्रित करने के लिए आत्म संयम की आवश्यकता है। यद्यपि आत्म संयम बहुत दुष्कर कार्य है। लेकिन निरंतर अभ्यास करते रहने पर, हम अपनी कामनाओं पर विजय पा सकते हैं।

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