देवदत्त एक कॉलेज में प्रोफेसर था। उसका कॉलेज बहुत दूरी पर था। सवेरे जब भी वह अपने कॉलेज के लिए जाता तो रास्ते में उसके प्रिंसिपल अभिषेक भी उसके साथ ही बैठकर कॉलेज तक चले जाते। प्रिंसिपल अभिषेक का घर बीच रास्ते में ही था। इसीलिए वे लगभग प्रतिदिन देवदत्त के साथ ही कॉलेज में जाते थे। देवदत्त को भी इसमें कोई आपत्ति न थी। उसे तो कॉलेज जाना ही होता था।
देवदत्त का बहुत बड़ा सा घर था। उसमें तरह-तरह के पेड़ भी लगे हुए थे। नारियल के, नींबू के, आम के, केले के और एक बड़ा सा कटहल का पेड़ भी था। कटहल के पेड़ में बहुत कटहल आते थे; जिन्हें देवदत्त की मां कल्पना आस पड़ोस में बांट देती थी। लेकिन कोई कल्पना की मर्ज़ी के बिना कटहल ले जाए, तो उसे बहुत बुरा लगता था।
एक बार ऐसा हुआ कि देवदत्त के पिता श्यामा प्रसाद बहुत बीमार हो गए। उनका बहुत इलाज़ कराया, लेकिन श्यामा प्रसाद बच न सके। उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए देवदत्त के कॉलेज से भी सभी प्रोफेसर आए। प्रिंसिपल अभिषेक भी साथ ही आए। थोड़ी देर के बाद सभी प्रोफेसर चले गए।
प्रिंसिपल साहब कुछ अधिक देर तक वहीं बैठे रहे। उन्होंने देवदत्त के घर में सभी पेड़ों को देखा। उन्हें कटहल का पेड़ विशेष रूप से बहुत अच्छा लगा। थोड़ी देर रुकने के बाद प्रिंसिपल साहब भी अपने घर चले गए।
एक दिन ऐसे ही कार में साथ-साथ जाते समय प्रिंसिपल साहब ने देवदत्त से पूछा, "इस कटहल के पेड़ में तो बहुत कटहल आते होंगे?"
देवदूत ने कहा, "हां। जब मौसम होता है तो यह कटहल से भर जाता है।"
प्रिंसिपल साहब कुछ अलग मिजाज़ के ही व्यक्ति थे। वे कंजूस भी थे और थोड़े लालची भी! तभी तो वे रोज देवदत्त के साथ ही कार में अपने कॉलेज जाया करते थे। अब उन्हें यह पता चल गया था कि देवदत्त के घर कटहल का पेड़ है। उन्हें कटहल पसंद भी बहुत थी।
उन्होंने कहा, "देवदत्त! जब भी तुम्हारे पेड़ में कटहल आए तो मुझे अवश्य देना।" देवदत्त ने सहर्ष सहमति दे दी।
कटहल का मौसम आने पर देवदत्त एक बोरा भरकर कटहल प्रिंसिपल साहब के लिए ले आया। देवदत्त की मां कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी। उसे तो प्रिंसिपल साहब वैसे भी बहुत पसंद नहीं थे। इस पर उन्होंने जबरदस्ती ही कटहल भी मांग लिए थे। देवदत्त ने भी पूरा बोरा भरकर उन्हें कटहल दे दिए थे। वह इस बात से बहुत परेशान थी।
कल्पना को यह समझते देर न लगी, कि अब प्रिंसिपल साहब के पास, हर बार ही कटहल का एक बोरा ज़रूर जाया करेगा। कल्पना ने सोचा, कि देवदत्त को अगर मना किया गया तो भी वह रुकेगा नहीं। वह प्रोफेसर साहब को कटहल अवश्य देगा। इसीलिए उसने देवदत्त को प्राय: यह कहना शुरू कर दिया, कि ये प्रिंसिपल साहब अपनी गाड़ी में क्यों नहीं जाते? यह रोज़ तुम्हारे साथ ही क्यों कॉलेज जाते हैं?
पहले तो देवदूत ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन धीरे-धीरे उसे स्वयं भी लगने लगा, कि प्रोफेसर साहब हर रोज़ उसके साथ जबरदस्ती ही जाते हैं। उसे भी यह बात खटकने लगी। अब रोज़-रोज़ प्रोफेसर साहब को ले जाना उसे भार की तरह लगने लगा।
अब उनसे पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे? उसने एक तरकीब सोची। उसके घर से कॉलेज बहुत दूर पड़ता था। पेट्रोल का भी काफी खर्च आता था। इसीलिए उसने सोचा कि कॉलेज के अंदर ही जो सरकारी क्वार्टर हैं; उसी में वह रहना शुरू कर देगा। इससे पेट्रोल का खर्चा भी बचेगा और प्रिंसिपल से भी छुटकारा मिलेगा। जितना उसका मकान किराया भत्ता कटेगा, उतने का तो पेट्रोल ही खर्च हो जाता था।
उसने तुरंत सरकारी क्वार्टर के लिए आवेदन कर दिया। उसको मकान मिल भी गया। उसने घर जाकर प्रसन्नता से अपनी मां कल्पना को बताया कि अब हम सरकारी क्वार्टर में रहेंगे। प्रिंसिपल अब मेरे साथ नहीं जाया करेंगे। यह झंझट खत्म हुआ।
लेकिन मां कल्पना को यह बात सुनकर, तनिक भी खुशी नहीं हुई। उसे तो अपने मकान में ही रहना था। उसे सरकारी मकान में नहीं जाना था।
उसने कहा,"नहीं। हम अपने मकान में ही रहेंगे। सरकारी मकान में क्या करेंगे जाकर? जब अपना मकान इतना अच्छा है। तो इसे क्यों छोड़ेंगे?"
लेकिन देवदत्त ने कहा, "मां! एक तो प्रिंसिपल साहब से छुटकारा मिल जाएगा। और दूसरा मकान से कॉलेज की बहुत अधिक दूरी है। तो समय भी बचेगा और पेट्रोल भी। इसीलिए हम सरकारी मकान में ही रहेंगे।"
घर का सामान शिफ्ट होते समय कल्पना सोच रही थी, "इससे अच्छा तो यह था कि भले ही प्रोफेसर साहब हर साल एक बोरा कटहल ले लेते, लेकिन कम से कम हम अपने मकान में तो रहते!"
एक कटहल के कारण कितना बडा कमाल हो जाएगा; यह तो कल्पना की कल्पना में भी नहीं था!