Friday, August 5, 2016

तुम बदल गए

तुम तो सरल थे
आज गांठों से भर गए
तुम्हारी हंसी जो गुदगुदा जाती थी,
आज चिंतित कर देती है।
आदर्श पर अवलंबित हो,
सम्मान के स्वाभिमान थे तुम।
आज छिछोरी दिखावट के बाज़ार में,
तुम भी एक नमूना बनकर  रह गए।
निर्मल अपेक्षाओं को धूमिल कर,
निर्मम कटु स्वार्थ संजोने में तल्लीन हो गए।
करोड़ों की भीड़ से अलग,
जगमगाते सितारे को,
भोगवाद का भयंकर,
गुरुत्वाकर्षण निगल गया।
आज मेरी नज़रों में,
तुम एक शून्य हो।
अस्तित्वहीन "ब्लैक होल"!